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अगर आप एन.एल.पी. सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में सीख रहे हों, तो आप आपका पैसा एवं समय दोनों बर्बाद कर रहे हों।
If You Are Learning Meta Model & Milton Model of NLP ONLY in English, You Are Wasting Your Time & Money! Part - 1
अगर आप एन.एल.पी. सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में सीख रहे हों, तो आप अपना पैसा एवं समय दोनों बर्बाद कर रहे हों । भाग – १
आपको शायद पता होगा कि एन.एल.पी. की शुरूआत हुई मेटा मॉडल से, जो व्हरजीनिया सटायर तथा फ्रिटस् पर्ल्स् के भाषा कौशल पर आधारित था । थेरपी जगत में उस समय इन दोनों के नाम बहुत चर्चा में थे । यह दोनों बड़ी सहजतापूर्वक क्लांयट के अंतर्जगत में बदलाहट लाते थें । अंतर्जगत की जो चीजें बदलने में एवं जीवन को रूपांतरित करने में जहाँ दूसरों को सालों लगते थें, वहीं काम यह दोनों कुछ ही पलों में कर देते थें । बहुत बार सिर्फ एक काउंसलिंग सेशन में निराशा, चिंता, दुःख, क्रोध, नकारात्मकता दूर हो जाती थी । एक नई जिंदगी शुरू होती थी । लोग इनके पास रोते हुए आते थे और हँसते हुए जाते थे, निराश होकर आते थे और उत्साहित होकर लौटते थे । यह एक जादू था, कुछ पलों में जिंदगी बदल जाती थी । सालों से चली आयी समस्याएँ मिनिटों में दूर हो जाती थी । अब सवाल था कि सटायर और पर्ल्स् यह जादू करते कैसे थे?
जब रिचर्ड बॅन्डलर एवं जॉन ग्राइंडर ने, जो कि एन.एल.पी. के सह संस्थापक हैं, इन दोनों का निरीक्षण करना शुरू किया, तो उन्हें पता चला कि व्हरजीनिया सटायर और फ्रिटस् पर्ल्स् दोनों ही भाषा का इस्तेमाल इतने सटीकता एवं सहजता से कर रहे हैं कि उनकी भाषा के कुशलतापूर्वक प्रयोग के कारण ही वे अपने क्लाइंट के जीवन में बदलाहट ला रहे हैं । उनकी भाषा के इस विशिष्ट जादूई प्रयोग के गहन अध्ययन के पश्चात् रिचर्ड बॅन्डलर एवं जॉन ग्राइंडर ने उनकी भाषा के उपयोग में कुछ पॅटर्नस् या प्रतिरूप पाये । उन पॅटर्नस् को इकठ्ठा कर जब एन.एल.पी. संस्थापकों ने उनका इस्तेमाल करना शुरू किया, तब उन्हें भी आश्चर्यजनक परिणाम हासिल होने लगे । एन.एल.पी. संस्थापक भी सटायर और पर्ल्स् दोनों के समान थेरपी में परिणाम हासिल करने लगे । बदलाहट इतनी जल्दी हो सकती है, इस पर विश्वास करना कठिन था, पर जीवन रूपांतरित होने के सेंकडो प्रमाण सामने थें । परिणामस्वरूप उन लॅन्ग्वेज पॅटर्नस् को अधार बनाकर एन.एल.पी. पर पहली किताब लिखी गई, जिसका नाम था ‘दि स्ट्रक्चर ऑफ मॅजिक’, जो पूरी तरह से भाषा विज्ञान एवं भाषा के सटीक उपयोग पर आधारित थी । किस प्रकार हम अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हुए स्वयं के तथा दूसरों के जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं, इस के बारे में पुस्तक में बताया गया था ।
मेटा मॉडेल हमें भाषा का इस्तेमाल करते हुए भाषा पर ही किस प्रकार सवाल खड़े किये जा सकते हैं, जिससे स्वयं के और दूसरों के अंतर्जगत को पूरी तरह से कैसे बदला जा सकता है, इसका मार्गदर्शन करता है ।
उदाहरण के तौर पर, जब कभी आपका कोई दोस्त या आपका क्लाइंट आपसे यह कहता है कि ......
"मैं कभी-कभी अलग थलग महसूस करता हूँ...... " अब इस वाक्य के बारे में जरा सोचते हैं ।
यह वाक्य हमें अपने दोस्त या क्लाइंट के अंतर्जगत के बारे में बहुत कुछ बता रहा है, पर बहुत कुछ छुपा भी रहा है, जिसे हम एन.एल.पी. में डिलीशन कहते हैं । यह वाक्य सुनने के बाद हमें लगता है कि हमें समझ में आ गया, कि उसे क्या कहना है । पर मेटा मॉडल कहता है कि आपको यह वाक्य सुनने के बाद जो समझ में आया, वह आपका भ्रम है । अब सवाल यह है कि इस वाक्य में जो डिलीट किया गया है, उसे किस प्रकार से खोजे? तो मेटा मॉडल कहता है कि इस वाक्य को सवाल पूछें । इस प्रकार से सवाल पूछें कि जो डिलीट हुआ है, वह सामने आए । जैसे कि,
मैं कभी-कभी अलग थलग महसूस करता हूँ ।
पहला सवाल - किससे?
दुसरा सवाल - ऐसा क्या है, जिससे आपको अलग-थलग महसूस होता है?
ये दोनों सवाल हमें और ज्यादा जानकारी देंगे । इस से सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जो इस प्रकार से बात कर रहा है, उसे अपने अंतर्जगत की और गहन जानकारी मिलेगी, शायद उसका टूटा हुआ अंतर्जगत सिर्फ एक सवाल द्वारा फिर से पूर्ववत हो सकता है ।

.... एक और उदाहरण देखते हैं ।
“तुम मेरी कभी चिंता या केअर नहीं करते .....” अब इस वाक्य के बारे में जरा सोचते हैं ।
अब हमें लगेगा कि बात समझ में आ गयी । पर क्या सही में हमें समझ में आया है, या समझ का सिर्फ भ्रम है । अब इस वाक्य में जो क्रिया है ‘चिंता करना या केअर करना’ क्या हमें इसका सही अर्थ पता है? शायद नहीं । ‘तुम मेरी कभी चिंता नहीं करते’ यह वाक्य, कहने वाले के अंतर्जगत के बारे में कुछ कह रहा है, शायद कहने वाले को भी ठीक-ठीक अंदाजा नहीं है, कि वह क्या कह रहा है? अब मेटा मॉडल कहता है कि सवाल करे, पर प्रश्न उठता है कैसे?
वाक्य - तुम मेरी कभी चिंता या केअर नहीं करते ।
पहला सवाल - किस विशेष रूप से मैं तुम्हारी चिंता या केअर नहीं करता?
दुसरा सवाल - मैं ऐसा क्या नहीं करता, जिससे तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारी चिंता या केअर नहीं करता?
तिसरा सवाल - मैं ऐसा क्या करता हूँ, जिससे तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारी चिंता या केअर नहीं करता?
हर सवाल पर जरा गौर करें, इन सवालों के जवाब में क्या उत्तर आ सकेंगे, इसके बारे में भी थोड़ा सोचिए ।
जैसे ही आप इस प्रकार इस वाक्य को सवाल करते हो, तो बोलने वाला भी सोचने पर मजबूर हो जाता है, कि सही में चिंता करने का उसका मतलब क्या है? क्या चिंता करने की उसकी व्याख्या सामने वाले को पता है? या चिंता करने की उसने जो व्याख्या बनाई है, वह बुनयादी ढंग से गलत है? इस प्रकार के सवालों से हम दूसरे का टूटा हुआ अंतर्जगत फिर से बुनने में उसकी मदद कर सकते हैं । ये सवाल क्लाइंट को अपने अंतर्जगत के बारे और सटीक जानकारी देंगे और इसप्रकार थोड़े से अभ्यास के पश्चात् भाषा सही इस्तेमाल करते हुए हम अंतर्जगत में बदलाहट ला सकते हैं ।
जब आप यह मेटा मॉडेल, जो कि एन.एल.पी. की बुनयादी नींव है, केवल अंग्रेजी में सीखते हो और रोजमर्रा के जीवन में आप किसी दूसरी भाषा का इस्तेमाल करते हो, तो आप कभी भी मेटा मॉडल का इस्तेमाल ही नहीं कर पाएँगे । मेटा मॉडल के चालीस से ज्यादा पॅटर्नस् हिंदी या दूसरी प्रादेशिक भाषाओं में भाषांतरित करना किसी भी प्रतिभागी जो एन.एल.पी. सीख रहा है, उसके लिए लगभग नामुमकिन है । इससे होता यह है कि ख्यातनाम एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट से एन.एल.पी. सीखने के बावजूद भी कोई भी एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर रोजमर्रा के जीवन में उसका इस्तेमाल नहीं कर पाता है । इससे इन लँग्वेज पॅटर्नस् का इस्तेमाल करते हुए ना वह स्वयं के जीवन को रूपांतरित कर पाता है और ना दूसरों के जीवन में परिवर्तन लाने में सक्षम होता है ।
जब मैं एन.एल.पी. सीख रहा था, तो मैंने अपने ट्रेनर से पूछा कि आपने तो ये ढेर सारे लँग्वेज पॅर्टनस् अंग्रेजी में सिखा दिए, पर अब मेरी रोजमर्रा की भाषा तो हिंदी एवं मराठी है, तो मैं इन लँग्वेज पॅर्टनस् का किस प्रकार से इस्तेमाल करूँ? तो मुझे जवाब मिला कि वह आपकी समस्या है, आप ही उसे हल करें । मेरे साथ उस एन.एल.पी. ट्रेनिंग वर्कशॉप में और भी पच्चीस प्रतिभागी थें, उन पच्चीस में से लगभग सभी एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर्स की यहीं दिक्कत थी । रोजमर्रा के जीवन में इन लँग्वेज पॅर्टनस् का इस्तेमाल आप तभी कर पायेंगे, जब आपने रोजमर्रा की भाषा में उन्हें सीखा होगा । ज्यादातर एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्सेस में यह बुनयादी भूल होती है । इन लँग्वेज पॅर्टनस् को हमें रोजमर्रा की भाषा में सीखना होगा, तभी हम उन्हें अच्छे तरीके से इस्तेमाल कर सकेंगे ।
पर दुर्भाग्य से भारत में जो एन.एल.पी. कोर्सेस कंडक्ट किये जाते हैं, वे एक तो पूरी तरह से अंग्रेजी में होते हैं, या तो पूरी तरह से हिंदी में । इससे प्रतिभागियों का बड़ा नुकसान होता है, पर जब तक उन्हें कुछ समझ में आए, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । अतः आई.बी.एच.एन.एल.पी. में हम ने बहुत सोच विचार के पश्चात् मेटा मॉडल अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी सीखना शुरू किया । यकिन मानिए, ऐसा करने वाली आई.बी.एच.एन.एल.पी. यह पहली एन.एल.पी. ट्रेनिंग संस्था है ।

अगर आप एन.एल.पी. सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में सीख रहे हों, तो आप आपका पैसा एवं समय दोनों बरबाद कर रहे हों, ऐसा जो हम कहते हैं, इसका और भी एक कारण है, जिसे हम अगले ब्लॉग में देखेंगे । तब तक के लिए ......
‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’

एन.एल.पी. सीखने से पूर्व डायरेक्ट हिप्नोसिस सीखना बेहद जरूरी क्यों है ? पार्ट 2
एन.एल.पी. सीखने से पूर्व डायरेक्ट हिप्नोसिस सीखना बेहद जरूरी क्यों है ? पार्ट 2
एक लड़का, जिसे पोलिओ हुआ था, पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो चुका था, साथ ही साथ पूरे तन में हमेशा जलन महसूस होती थी, संपूर्ण कलेवर पीड़ा से संत्रस्त रहता था, उस में सिर्फ देखने और सुनने की क्षमता बची थी । दिन रात वह बिस्तर पर पड़ा रहता था, पूरा शरीर निश्चल था, सिवाय आँखों के । उसका परिवार और वह खलिहान के पास बने सालों पुराने मकान में रहते थें । परिवार में उसके अलावा सात बहनें थीं, एक भाई था और माता-पिता, कभी कभार नर्स भी आया करती थी । बिस्तर पर पड़े-पड़े कुछ काम नहीं होता था, तो स्वयं का मनोरंजन कैसे करे? यह सवाल उसे सताता था । फिर उसने लोगों का एवं आसपास के परिवेश का निरीक्षण करना शुरू किया और उसे जल्द ही समझ में आने लगा कि बहुत बार उसकी बहने मुंह से ‘ना’ कहती है, पर उन्हें असल में ‘हाँ’ कहना होता है और जब वे ‘हाँ’ कहती है, उस समय उन्हें ‘ना’ कहना होता है । बहुत बार एक बहन दूसरी को सेब देना चाहती है, पर वह सेब छोड़ना भी नहीं चाहती । धीरे-धीरे वह लड़का अशाब्दिक भाषा, याने नॉनव्हर्बल लैंग्वेज तथा शारीरिक हावभाव याने ‘बॉडी लैंग्वेज’ पढ़ने में माहिर होने लगा । आगे जाकर यह लड़का दुनिया का सबसे महानतम हिप्नोटिस्ट बना, जिसने हिप्नोसिस को सांइटिफिक प्रोसेसेस् में ढालने की भरसक कोशिश की । इस लड़के का नाम था मिल्टन इरिक्सन ।

इरिक्सनियन हिप्नोसिस को समझने से पूर्व हमें ‘ट्रान्स’ क्या होता है, यह समझना होगा ।
ट्रान्स के बाद अब बात करते हैं मिल्टन इरिक्सन के हिप्नोसिस मॉडेल की ।
उदाहरण के तौर पर....
1. और जब भी कभी .......... सीखना शुरू करते हो ।
2. और मुझे आपको यह बताना ही होगा ..... ना सिर्फ .......पर
3. और मैं चाहता हूँ ..... जिससे ..... सकते हैं ।
4. और आपको इसकी बिल्कुल जरूरत नहीं है...
5. और आपको यह कैसे पता चलेगा, कि...
इस प्रकार के अनेकविध हिप्नोटिक लैंग्वेज पॅटर्न्स् की मदद से हम भाषा का एक ऐसा जाल बुनते हैं, जो ट्रान्स की अवस्था निर्मित करता है । जैसे ही यह ट्रान्स की अवस्था खड़ी होती है, हमारा चेतन मन अपने आप उस भाषा जाल में अटकता चला जाता है और अवचेतन मन जागृत होने लगता है । एक बिंदु पर जैसे ही चेतन मन अटक जाता है, उस समय दिए गए सजेशनस् अवचेतन मन में स्थिर होने लगते हैं, और बदलाहट की पहल होने लगती है । हमारा अवचेतन मन बहुत संवेदनशील एवं ग्रहणशील होता है, एक बार उसने किसी बात को पकड़ लिया, तो धीरे-धीरे बाहरी तौर पर हमें उसके परिणाम दिखने शुरू हो जाते हैं ।
इरिक्सनियन हिप्नोसिस को ही इनडायरेक्ट हिप्नोसिस या कन्वर्सेशनल हिप्नोसिस भी कहा जाता है । यहाँ पर आप संबंधित व्यक्ति को पता चले बग़ैर इन पॅटर्न्स् का इस्तेमाल करते हुए ट्रान्स की अवस्था निर्मित कर सकते हैं, और पूर्व निर्धारित या प्रत्याशित सूचनाएँ अवचेतन मन में सन्निविष्ट कर बदलाहट ला सकते हैं । मिल्टन मॉडेल एन.एल.पी. की सबसे महत्वपूर्ण आधारशीला है । पर बहुत बार एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्सेस में यह मिल्टन मॉडेल ऊपर-ऊपर पढ़ाया जाता है, कहीं-कहीं तो इसे सीखना भी टाल दिया जाता है, क्योंकि यह मिल्टन मॉडेल सीखाने के लिए एन.एल.पी. ट्रेनर का स्वयं भाषा में माहिर होना भी बेहद जरूरी होता है । बहुत सारी एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस् में हमने और एक समस्या देखी । वहाँ मिल्टन मॉडेल सीखाया तो जाता है, पर केवल अंग्रेजी में । आप को तो पता ही है कि भारत एक बहुभाषी देश है । हम अपने घर में मातृभाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो ऑफिस या अन्य जगहों पर हिंदी या अंग्रेजी का । बहुत बार भाषा का उपयोग सामने वाले पर निर्भर करता है कि वह कौन सी भाषा ठीक से समझ पा रहा है । अगर घर, ऑफिस या अन्य जगहों पर आप ज्यादातर हिंदी या प्रादेशिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो ‘मिल्टन मॉडेल’, जो कि एन.एल.पी. की नींव है, उसे ही आप रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल नहीं कर सकते । इसी लिए आई.बी.एच.एन.एल.पी. द्वारा आयोजित एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर ट्रेनिंग कोर्सेस में यह मिल्टन मॉडेल अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों भाषाओं में सीखाया जाता है । हिंदी में मिल्टन मॉडेल सीखकर प्रादेशिक भाषाओं में इसका अनुवाद करना बहुत ही सरल है, वैसे मुख्य प्रादेशिक भाषाओं के स्क्रिप्ट्स हम ही आपको प्रदान कर देते हैं । एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर कोर्स में जब आप प्रत्याक्षिकों द्वारा इसे समझते हैं, तो अचरज में पड़ जाते हैं कि कितना आसान होता है बातों-बातों में किसी के ब्रेन को फ्रेम करना । इसमें महारत हासिल कर आप स्वयं के तथा दूसरों के जीवन को बड़ी ही सहजता से परिवर्तित कर सकते हैं, उसे योग्य दिशा दे सकते हैं ।

शुरुआती दौर में ‘ट्रान्स की अवस्था’ को समझने के लिए ‘इरिक्सनियन हिप्नोसिस’ से अच्छा ‘एलमन इंडक्शन’ है, जहाँ पर हम सीधे तौर पर ‘ट्रान्स की अवस्था’ का अनुभव कर सकते हैं, इसी लिए हमारे एन.एल.पी. कोर्सेस में हम ‘एलमन इंडक्शन’ याने ‘डायरेक्ट हिप्नोसिस’ भी सीखाते हैं और वह भी नि:शुल्क ! हमें कहने में गर्व होता है कि आई.बी.एच.एन.एल.पी. भारत की एकमेव एन.एल.पी. ट्रेनिंग प्रदान करने वाली संस्था है, जो एन.एल.पी. कोर्स के प्रतिभागियों को डायरेक्ट हिप्नोसिस की भी ट्रेनिंग मुहैया कराती है, वह भी नि:शुल्क!
तो क्या आपको हिप्नोटिस्ट तथा भाषा का जादूगर बनना है?
फिर मिलेंगे, तब तक के लिए ‘एन्जॉय युअर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन ।’
क्या आप भी चाहते हैं कि आपका व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन सफलता की बुलंदियों को छुएं? अगर ‘हाँ’ तो एन.एल. पी. के जादुई और ताक़तवर तकनीकों से आप स्वयं के व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं । तो एन.एल.पी. कोर्सेस के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें, या मास्टर एन.एल.पी. ट्रेनर मृणाल गुप्ता को आप का पर्सनल लाइफ कोच बनाने के लिए आज ही संपर्क करें - +919834878870 या हमें लिखिए [email protected]

एन.एल.पी. सीखने से पूर्व डायरेक्ट हिप्नोसिस सीखना बेहद जरूरी क्यों है ? पार्ट १
एन.एल.पी. सीखने से पूर्व डायरेक्ट हिप्नोसिस सीखना बेहद जरूरी क्यों है ?
हमारा वर्तमान बहुत बार हमारे भूतकाल का प्रतिबिंब होता है । जो बातें हमारे साथ भूतकाल में घटी हैं, वही बातें हमारे साथ हर रोज़ घट रही हैं ।
- डेव्ह एलमन
आपको क्या लगता है कि इस दुनिया का सबसे पुराना व्यवसाय कौनसा होगा? जरा सोचे.....
बायबल में कहा गया है कि ‘एडम को गहरी नींद में सुला दो और उसकी कुछ पसलियाँ निकाल लो...’ पर एडम को गहरी नींद में कैसे सुलाया जा सकता है ? यह तो संमोहन जैसा लगता है । मेरी मानो तो इस दुनिया का सबसे पुराना व्यवसाय अगर कोई होगा, तो वह है ‘हिप्नोसिस’ या ‘संमोहन’ । हिप्नोसिस की जडे हमें ग्रीक और रोमन संस्कृतियों में भी मिलती है । उस जमाने में स्लिप टेम्पलस् हुआ करते थे । उन मंदिरो में जो बीमार है, उनको सुलाया जाता । उसके बाद मंदिर का पुजारी आता । जैसे ही पुजारी आता, मंदिर में धुंआ कर दिया जाता और उसके बाद वह कुछ मंत्रों का उच्चारण शुरू कर देता, जैसे ही यह सब होने लगता, एक अलग ही किस्म का माहोल खडा होता और जो बीमार लोग हैं, वे संमोहन की अवस्था में पहुँच जाते । इसके बाद पुजारी निकल जाता और कुछ देर में वे बीमार लोग संमोहन की अवस्था से बाहर आते और उनको बेहतर लगने लगता । आज भी हमारे भारत में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो इस प्रकार से ‘प्रभू की कृपा’ दिखाकर बीमारियों का इलाज करते हैं और आपको हजारों लोग ऐसे भी मिल जाएँगे, जो बताएँगे कि कैसे उनकी लाइलाज बीमारी ‘प्रभू की कृपा’ से ठीक हो गयी है । पर यह सब होता कैसे है? हिप्नोसिस का विज्ञान हमें इसका जवाब देता है ।
हिप्नोसिस कहता है ..
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कल्पना-शक्ति को उसके अंत तक ले जाओ - (Enhance the Imagination) एनहान्स दी इमेजिनेशन
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मानसिक तौर पर आशा को प्रबल करो - (Develop the Mental Expectancy) डेव्हलप दी मेंटल एक्सपेक्टंसी
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और फिर जादू होने लगता है - (Then the Miracle Happens) देन दी मिरॅकल हॅपन्स्
फिर आधुनिक युग में हिप्नोसिस का विज्ञान विकसित होने लगा । उसमें सबसे पहला नाम आता है फ्रेन्स मेसमर का, जो कि एक जर्मन डॉक्टर थे । १७ वी सदी के अंत में. डॉ. मेसमर हिप्नोसिस के माहीरों में से एक थे और इसका उपयोग करते हुए उन्होंने बहुत से बीमार लोगों को ठीक किया था ।
उनके यहाँ एक असेम्बली हॉल था । इलाज के लिए सारे मरीज़ों को उस असेम्बली हॉल में बैठाया जाता । असेम्बली हॉल में बैठे-बैठे मरीज़ आपस में बातें करने लगते कि किसप्रकार डॉ. मेसमर ने लाइलाज बीमारी से त्रस्त मरीज़ों को ठीक किया है । इन बातों से मरीज़ों में यह आशा प्रबल होने लगती कि वे भी आज ठीक होकर ही जाएँगे । उनकी मेन्टल एक्पेक्टन्सी बढ़ने लगती । मरीज़ों की बीमारी से ठीक होने के संबंध में कल्पना-शक्ति सघन होने लगती और फिर सब दिये बुझा दिए जाते । असेम्बली हॉल घने अंधेरे में डूब जाता और फिर कुछ समय पश्चात् मंच पर रोशनी की जाती और डॉ. मेसमर का आगमन होता । डॉ. मेसमर के हाथ में छड़ी हुआ करती थी । शांती से आगे बढ़ते हुए वे पहले मरीज़ के सामने खड़े हो जाते और जैसे ही वे अपनी छड़ी से उसके कंधे पर धीरे से थपथपाते, वह मरीज़ संमोहीत हो जाता । आँखे बंद, पूरी तरह से रिलॅक्स । इसके बाद दूसरा मरीज़ और फिर तीसरा और इस प्रकार से पूरे असेम्बली हॉल में बैठे सभी मरीज़ों को संमोहीत किया जाता । पर यह होता कैसे था ? हिप्नोसिस कहता है ‘मन जो उम्मीद करता है, उसे सच बना लेता है ।’
इसके बाद आए डॉ. जेम्स ब्रेड । डॉ. ब्रेड, डॉ. मेसमर के विद्यार्थी हुआ करते थे । डॉ. ब्रेड ने थोड़ी छानबीन शुरू की । उन्होंने स्वयं पर अनेक प्रयोग किए । हजारों लोगों पर हिप्नोसिस आजमाया । यहाँ से हिप्नोसिस ने विज्ञान बनने के तरफ यात्रा शुरू की ।
इस यात्रा ने १९५० के दशक में डेव्ह एलमन के साथ एक नया मोड़ लिया । डेव्ह एलमन एक रेडिओ होस्ट थे । उनके पिता कॅन्सर से ग्रस्त थे और इस कारण उन्हें बड़ी पीड़ा होती थी । वे दर्द से तड़पते थे, रातों को नींद नहीं आती थी । उनके पिता के दोस्त जो हिप्नोटिस्ट थे, उन्होंने हिप्नोसिस का इस्तेमाल करते हुए कुछ ही पलों में कॅन्सर की पीड़ा खत्म कर दी । हिप्नोसिस की इस जादूई ताक़त ने एलमन के मन को छू लिया और इस प्रकार से डेव्ह एलमन की हिप्नोसिस सीखने में जिज्ञासा जगी और वे हिप्नोसिस के स्वयं पर प्रयोग करने लगे । थोड़े ही दिनों में उन्होंने हिप्नोसिस में महारत हासिल कर ली । सन १९४९ में डेव्ह एलमन ने ‘मेडिकल रिलॅक्सेशन’ नाम से हिप्नोसिस सेमिनार की एक सिरीज तैयार की, जो डॉक्टर तथा दंत चिकित्सकों के लिए थी और फिर पूरे अमरीका में घूमकर उन्होंने हिप्नोसिस का प्रचार शुरू किया । डेव्ह एलमन ने हिप्नोसिस की एक विशिष्ट प्रक्रिया तैयार की, जिससे हिप्नोसिस सीखना एवं सिखाना बेहद आसान हुआ ।
डेव्ह एलमन ने हिप्नोसिस को इतना आसान बनाया, कि कोई भी सामान्य इन्सान इसे सीख सके और उसमें महारत हासिल कर सके । इसे ‘डेव्ह एलमन इंडक्शन’ नाम दिया गया और उसकी एक प्रक्रिया तैयार कर एक स्क्रिप्ट बनायी गई । अगर उस एलमन इंडक्शन की स्क्रिप्ट पर आप थोडासा काम करें, तो आप भी बैठे-बैठे किसी को भी हिप्नोटाइज कर सकते हैं । इसके कुछ आसान स्टेप्स् हैं, कुछ साधारणसी टेस्टस् हैं, तथा आपकी तरफ से थोड़ीसी मेहनत । बस! आप भी हिप्नोटिस्ट बन सकते हैं ।
अब थोड़ी सी बात एन.एल.पी. और डेव्ह एलमन की । डेव्ह एलमन की हिप्नोसिस की प्रक्रिया डायरेक्ट हिप्नोसिस में आती है, जहाँ सामनेवाले को पता होता है कि आप उस पर हिप्नोसिस का इस्तेमाल कर रहे हैं । एन.एल.पी. में हम डेव्ह एलमन को नहीं सीखतें । फिर से दोहराता हूँ । एन.एल.पी. में हम डायरेक्ट हिप्नोसिस या डेव्ह एलमन की प्रकिया को नहीं सीखतें । एन.एल.पी. में हम इरिक्सनीयन हिप्नोसिस सीखते हैं जो कि इनडायरेक्ट हिप्नोसिस है, याने सामनेवाले को पता भी नहीं चलता कि आप हिप्नोसिस का इस्तेमाल कर रहे हैं । पर अगर आपको सही में एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स में सीखाया जाने वाला इरिक्सनीयन हिप्नोसिस याने इंडायरेक्ट हिप्नोसिस सीखना है, तो आपको थोडा ‘डेव्ह एलमन हिप्नोसिस’ याने ‘डायरेक्ट हिप्नोसिस’ का पता होना चाहिए । इसी लिए हम आइ.बी.एच.एन.एल.पी. द्वारा आयोजित एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर कोर्स में ‘इरिक्सनीयन हिप्नोसिस’ याने ‘इंडायरेक्ट हिप्नोसिस’ सीखाने के पूर्व ‘डेव्ह एलमन हिप्नोसिस’ याने ‘डायरेक्ट हिप्नोसिस’ भी सीखाते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हमारे एन.एल.पी. कोर्स में ‘डायरेक्ट हिप्नोसिस’ नि:शुल्क सीखाया जाता हैं ।

One of the Most Popular & Scientific Definitions of Hypnosis -
“Hypnosis is the by-pass of the critical factor of the conscious mind and the establishment of acceptable selective thinking.”
हिप्नोसिस की इस व्याख्या के बारे में अगले ब्लॉग में सोचेंगे । तब तक के लिए ‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’

एन.एल.पी. क्या है?
एन.एल.पी. क्या है?
एन.एल.पी. एक रवैय्या है, जीवन को उसकी पूर्णता में जीने का ।
एन.एल.पी. एक ताक़तवर तरीका है, जिससे आप अपनी मन:स्थिति तथा विचार प्रक्रिया पर पूरी तरीके से नियंत्रण प्रस्थापित कर सकते हो ।
एन.एल.पी. एक जादू है, जिससे आपका जीवन पूरी तरह से रूपांतरीत हो सकता है ।
एन.एल.पी. एक ताक़त है, जिससे आप स्वयं के दिमाग को चला सकते हो ।
एन.एल.पी. एक अंदरूनी अहसास है, उत्साह का, आनंद का ।
एन.एल.पी. एक समझ है, जिंदगी सहजता से जीने की ।
पर असल में एन.एल.पी. है क्या?
सच कहूँ , तो एन.एल.पी. की कोई एक सटीक व्याख्या करना लगभग नामुमकिन है । एन.एल.पी. की हर व्याख्या एन.एल.पी. के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जैसे कि...
एन.एल.पी. आज के युग का एक बेहतरीन और सबसे ताक़तवर संवाद कौशल शास्त्र है ।
एन.एल.पी. दुनिया के बेहतरीन लोगों का अभ्यास करना है, जिसे एन.एल.पी. में सक्सेस मॉडेलिंग कहा जाता है ।
एन.एल.पी. हमारे अंदरूनी जगत की बनावट समझने तथा उसमें सकारात्मक बदलाहट लाने का सबसे आसान तरीका है ।
एन.एल.पी. की हर व्याख्या कुछ कहती है, कुछ दिखाने की कोशिश करती है, कुछ समझाना चाहती है ।
एन.एल.पी. के तीन पहलू है, न्युरो - लिंगविस्टिक - प्रोग्रॅमिंग ।
एन - न्युरोलोजी- हमारे दिमाग में सोचने की प्रक्रिया कैसे घटित होती है ?
एल - लिंगविस्टिक - हम अपनी भाषा का इस्तेमाल किस प्रकार से करते हैं तथा उस भाषा का हमारे जीवन पर क्या परिणाम होता है?
पी - प्रोग्रामिंग - हम किस प्रकार से किसी निश्चित ध्येय पूर्ती के लिए अपने दिमाग को कार्यप्रवण कर सकते हैं?
एन.एल.पी. क्या है ? यह एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं ।
एक दिन सांझ के समय एक क्लाइंट मुझ से मिलने आया । उसने मुझे अपने विजिट का उद्देश्य फ़ोन पर पहले ही थोड़ा बताया हुआ था । मेरे ऑफिस के बड़े से लाउंज में हम दोनों एक सोफ़े पर बैठे । वह थका हुआ, हारा हुआ, शायद पूरी तरह से टूट चुका था । वैसे तो वह एक बड़ा बिझनेसमन था । पर कुछ दिनों से उसका बिझनेस घाटे में चल रहा था और अब तो वह दिवालियाँ बनने की कगार पर था । उसकी आँखें निष्प्राण थी । कंधे नीचे झुके हुए थे । चेहरे का रंग उड़ा हुआ था । कुछ इधर उधर की बातें शुरू हुई । अचानक मैंने उससे पूछा, ‘‘क्या आप उस दिन को याद कर मुझे बता सकते हैं, जिस दिन आपने सही मायने में सफलता का अनुभव किया हो?” जैसे ही यह सवाल उसके कानों पर पड़ा, वह कुछ याद करने लगा । कुछ देर के लिए वह मौन हो गया । धीरे-धीरे उसकी आँखों से रोशनी झलकने लगी । चेहरा एक नई उमंग से खिलने लगा । कंधे सीधे हुए । वह बताने लगा उस दिन के बारे में, जिस दिन उसे उसके बिझनेस की सबसे बड़ी डील हासिल हुई थी । किस प्रकार उसने दिन रात मेहनत करते हुए वह कामयाबी हासील की थी । किस प्रकार उस दिन वह बहुत आनंदीत था । उसने कामयाबी का एहसास किया था । अब धीरे-धीरे उसकी आवाज बदलने लगी थी । उसके भीतर मानों एक नई ताक़त का संचार हुआ था । पलभर में उसे स्वयं के प्रति अच्छा महसूस होने लगा था ।
अगर आपने ठीक से उसके साथ घटी प्रक्रिया को महसूस किया होगा, तो आपको यह जरूर समझ में आया होगा कि एन.एल.पी. क्या है?
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अगले ब्लॉग में एन.एल.पी. को और उसके दूसरे पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे ।
तब तक के लिए ‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’

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दोस्तों, एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर कोर्स के लिए आने वाले सभी प्रतिभागियों के सामने इस नए फीचर को रखते हुए हमें बेहद प्रसन्नता हो रही है । यकीन मानिए, इस नए फीचर की मदद से आपकी ट्रेनर बनने की यात्रा बेहद आसान होने वाली है । जैसे कि आपको पता है, एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर आपके लिए इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, लेकिन आप में से कई लोगों का अंतिम लक्ष्य एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर बनने का है । एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर के इस कोर्स में आप एन.एल.पी. के एडवांस टूल्स सीखने वाले हैं, तथा एन.एल.पी. ट्रेनर बनने के लिए जरूरी ट्रेनिंग स्किल्स एवं एटीट्यूड के ऊपर भी आप मेहनत करने वाले हैं । आपको भी पता है, कोर्स खत्म होने के बाद जब आप स्टेज पर खड़े होकर एन.एल.पी. की ट्रेनिंग लेंगे, तब आप आत्मविश्वास तथा उत्साह से भरे होंगे । जो स्किल्स आपने मास्टर ट्रेनर कोर्स में सीखे हैं, उनकी मदद से आप बेहद सहजता से और आनंद की मानसिकता में रहते हुए, आपके ट्रेनिंग में आने वाले प्रतिभागियों की मदद करने वाले हैं ।
जैसा कि मैंने एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर ट्रैनिंग के दौरान कहा था, आपकी ट्रेनर बनने की इस यात्रा को आसान बनाने के लिए हम ने यह फीचर एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर कोर्स में समाविष्ट किया है । एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर के कोर्स में आपको 3 दिनों के लीडरशिप डेवलपमेंट ट्रेंनिंग मॉड्यूल दिया जाएगा, यह मॉड्यूल आई.बी.एच.एन.एल.पी. के फाउंडर और सी.ई.ओ. संदीप शिरसाट द्वारा डिजाइन किया हुआ है । इसकी मदद से आप कॉरपोरेट, स्कूल्स, कॉलेजेस, इत्यादि में 3 दिनों के लीडरशिप डेवलपमेंट ट्रेनिंग प्रोग्राम चला सकते हैं । आपकी ट्रेनिंग खत्म होने के तुरंत बाद इस मॉड्यूल की मदद से आप ट्रेनिंग फील्ड में कदम रख सकते हैं साथ ही साथ आपके ट्रेनिंग स्किल्स के आधार पर पैसे कमाना शुरू कर सकते हैं । इस मॉड्यूल की सहायता से आप बेहद सहजता से, आत्मविश्वासपूर्वक और उत्साह से ट्रेनिंग कंडक्ट कर सकते हैं ।
इस मॉड्यूल में निम्नलिखित चीजें समाहित है:
1. लीडरशिप डेवलपमेंट ट्रेनिंग मॉड्यूल में आप 3 दिनों में लीडरशिप से जुड़े हुए 6 अलग-अलग टॉपिक लेने वाले हैं, जिसे ‘सिक्स पीज् ऑफ लीडरशिप’ कहा जाता है । आपको हर टॉपिक की स्क्रिप्ट मिलेगी, यानी उस टॉपिक में जो कहानी आपको कहनी है, जिसके केस स्टडी पर आपको चर्चा करनी है, जो गेम आपको खेलना है, यह सब कुछ लिखित स्वरूप में आपको मिलेगा । आपको सिर्फ यह स्क्रिप्ट पढ़नी है, थोड़ी सी मेहनत लेनी है और आप प्रभावशाली तरीके लीडरशिप डेवलपमेंट ट्रेनिंग प्रोग्राम कंडक्ट करेंगे ।

2. इस लीडरशिप ट्रेनिंग मॉड्यूल में आपको अपने प्रतिभागियों को देने के लिए लीडरशिप डेवलपमेंट ट्रेनिंग वर्क बुक मिलने वाला है । इस वर्क-बुक में प्रतिभागियों को जो केस स्टडीज पढ़नी है, जो क्वेश्चनायर सोल्व करनी है, तथा जो एक्सरसाइजेस करानी है, सब कुछ इस वर्क-बुक में रहेगा ।

3. इसके अलावा इस लीडरशिप डेवलपमेंट ट्रेनिंग प्रोग्राम की मार्केटिंग कैसे करनी है, इसकी पूरी ट्रेनिंग आपको कोर्स में मिलेगी । इसके साथ-साथ मार्केटिंग के लिए पी.पी.टी. प्रेजेंटेशन तथा ब्रॉशर भी आपको दिया जाएगा ।

4. आपको इस ट्रेनिंग से संबंधित जो भी मटेरियल मिलेगा, वह सॉफ्ट कॉपी में होगा, जिसके चलते आप इसे आसानी से एडिट भी कर सकते हैं ।
संक्षेप में, 3 दिनों का लीडरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम सफलतापूर्वक कंडक्ट करने के लिए मार्केटिंग से लेकर ट्रेनिंग तक सब कुछ आपको मिलने वाला है । क्या आपको नहीं लगता, इसके जरिए लीडरशिप के ऊपर ट्रेनिंग कंडक्ट करना आपके लिए बेहद आसान होने वाला है । आप कॉरपोरेट्स, स्कूल्स तथा कॉलेज में जाकर इसकी मार्केटिंग कर सकते हैं और सफलतापूर्वक इस कोर्स को कंडक्ट कर सकते हैं । इसके अलावा एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर में आपने जो अलग-अलग टॉपिक सीखे हैं, उनको भी आप इस कोर्स में जोड़ सकते हैं । असल में यह लीडरशिप डेवलपमेंट ट्रेनिंग मॉड्यूल आपके लिए मॉडल का काम करेगा, जिसके आधार पर आप इस तरह के कई सारे अलग-अलग ट्रेनिंग मॉड्यूल डिजाइन कर सकते हैं ।
दोस्तों, आई.बी.एच.एन.एल.पी. में हमारा मकसद ही यह है, कि एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर कोर्स खत्म होने के तुरंत बाद आप ट्रेनिंग इंडस्ट्री में कदम रखें और वेल्थ को मेनिफेस्ट करना शुरू करें । ट्रेनर बनने के आपके सपने को पूरा करने के लिए हमारी तरफ से हम यथासंभव कोशिश करते रहते हैं, अगर आप अपनी तरफ से थोड़ी सी मेहनत ले और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़े, तो मैं दावे के साथ कहना चाहूंगा कि जल्द ही आपका ट्रेनर बनने का सपना साकार होगा ।

एन.एल.पी. सिखाने से पूर्व मास्टर्स और ट्रेनर पूरा करना जरूरी क्यों है?
एन.एल.पी. सिखाने से पूर्व एन.एल.पी. मास्टर तथा एन.एल.पी. ट्रेनर कोर्स पूरा करना क्यों जरूरी है?
27 जनवरी 2006, टाईम्स ऑफ इंडिया में एक खबर छपी, जिसके मुताबिक भारत के रिटेल क्षेत्र में रोमांच की लहर दौड़ रही थी, शायद रिटेल में क्रांती घट रही थी, या शायद यह एक बड़े बदलाव की अभूतपूर्व ऐसी पहल थी । एक ऐसा कारनामा हुआ था, जो कि भारत के रिटेल बाजार ने पहले न कभी देखा था और ना ही कभी इसके बारे में सोचा था । जो कुछ घटा था वह अविश्वसनीय, अद्भूत और अकल्पनीय था । सिर्फ एक दिन पहले याने 26 जनवरी 2006 को मुंबई के कांदिवली के एक रिटेल स्टोर पर भीड़ उमड़ पड़ी थी, जहाँ देखो वहाँ सिर्फ और सिर्फ लोग दिखाई दे रहे थें । सैकड़ों लोग घंटों से लाईन में खड़े थें, अंदर जाने के लिए रस्साकस्सी चल रही थी । यहीं हाल कोलकता के व्ही.आय.पी. रोड का था । लोगों की भीड़ इतनी बढ़ गयी थी, कि एअरपोर्ट की तरफ जानेवाले रोड पर भी ट्रैफ़िक जॅम हो चुका था । अंत में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को बुलाना पड़ा, तब जाकर लोग लाईन में खड़े रहकर अंदर जाने लगें और यहीं हाल बैंगलोर, दिल्ली एवं गुरूग्राम का था । इसके पीछे वजह यह थी कि दस हजार का टीवी सिर्फ छह हजार में मिल रहा था, महंगे मोबाईल फोन्स पर तीस से चालीस प्रतिशत की छूट थी, डिझायनर सोफा बड़ा ही सस्ता था सिर्फ और सिर्फ दस हजार में मिल रहा था । 26 जनवरी का वह दिन ग्राहकों के लिए सस्ती सौगाध लाया था, क्योंकि उस दिन का नाम था, ‘सबसे सस्ता दिन’ और ऑफर देनेवाला रिटेल स्टोर था ‘बिग बझार’। 26 जनवरी के उस सबसे सस्ते एक दिन में बिग बझार ने 30 करोड़ रूपये कमाकार इतिहास रच दिया था । पहली बार किसी रिटेल स्टोर ने सिर्फ एक ही दिन में 30 करोड़ का बिझनेस भारत में किया था, जिस कारण रिटेल क्षेत्र में खलबली मची हुई थी ।
इस सपने की शुरूआत लगभग छह माह पहले हुई थी, जब ‘26 को 26’ तय हुआ था, याने 26 जनवरी को 26 करोड़ कमाने का लक्ष्य रखा गया था । आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि जब यह कठिन और दुस्साहसिक लक्ष्य रखा गया, तब इसके पीछे कोई सर्वे, कोई गणितीय समीकरण या फिर कोई आंकड़ों का आधार नहीं था । सिर्फ और सिर्फ एक चाहत थी, कि कुछ तो वास्तव में असाधारण किया जाए, एक भव्य विजय की प्राप्ति हो, एक विशाल और उत्तेजनापूर्ण चुनौती को पूरा किया जाए । एक भव्य और दुस्साहसिक लक्ष्य निश्चित करने के बाद सब ने मिलकर लगन एवं समर्पण से काम किया । दिन रात मेहनत कर जबरदस्त इच्छाशक्ति का परिचय दिया गया । सबसे पहले इस भव्य सपने के छोटे से छोटे हिस्से पर ध्यान दिया गया, सटीक रणनीति तैयार की गयी और फिर उस अशक्यप्राय लक्ष्य की ओर बढ़ना शुरू हुआ । परिणामत: सिर्फ एक दिन में करोड़ों का मुनाफ़ा कमाते हुए रिटेल क्षेत्र में एक नया इतिहास रचा गया ।

इसका मतलब ही यह हुआ, कि अगर हमें जिंदगी में कुछ बड़ा करना हो, तो दो कौशल विकसित होना बेहद जरूरी है ।
1. आपको वह व्यापक चित्र दिखाई देना जरूरी है और
2. उस व्यापक चित्र को ध्यान में रखते हुए उसके छोटे से छोटे विवरण पर गौर करते आना चाहिए ।
एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर के बाद जब आप एन.एल.पी. मास्टर तथा एन.एल.पी. ट्रेनर का कोर्स के लिए आते हैं, तब यहीं दो कौशल विकसित करने पर हमारा ध्यान होता है । एन.एल.पी. मास्टर तथा एन.एल.पी. ट्रेनर कोर्स में आपको एन.एल.पी. का ‘26 को 26’ दिखाई देता है, याने आपको एन.एल.पी. ट्रेनिंग का व्यापक चित्र दिखाई देता है । इस व्यापक चित्र को ध्यान में रखते हुए एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर समझना और सिखाना बेहद आसान जाता है । याने एन.एल.पी. मास्टर तथा एन.एल.पी. ट्रेनर के स्तर पर आप जंगल को भी देख सकते हैं और एक अकेले पेड़ को भी देख सकते हैं । इसका मतलब ही यह हुआ, कि एन.एल.पी. के बड़े जंगल को देखते हुए आप एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर के हर एक अकेले पेड़ याने टॉपिक को बड़ी ही सुलभता के साथ समझ भी सकते हैं और सीखा भी सकते हैं ।
इसे उदाहरण के साथ समझने का प्रयास करते हैं । एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर कोर्स में हम ‘स्टेट मैनेजमेंट’ सीखते हैं । जिसमें यह सिखाया जाता है, कि जिस मानसिकता का हम जाने अनजाने में अभ्यास करते हैं, वह मानसिकता धीरे-धीरे सघन होने लगती है । अगर दिन भर हम रिक्तता, निराशा, उदासी का अनुभव करते हैं, तो कुछ दिनों बाद रिक्तता, निराशा, उदासी हमारी स्थायी मन:स्थिति बन जाती है । आपने देखा होगा, कुछ लोग हर अच्छी चीज में बुराई ढूँढ़ने में माहिर होते हैं, इसके विपरीत भी होता है । यह सब जाने अनजाने दोहराई हुई प्रक्रियाओं के परिणाम मात्र हैं । जो लोग दिन भर खुशी, आनंद एवं उत्साह की मानसिकता में जीते हैं, उनके जीवन में खुशी, आनंद और उत्साह की मानसिकता सघन होने लगती है । तो ‘स्टेट मैनेजमेंट’ में हम अपनी स्टेट या मानसिकता को नियंत्रित करने एवं उसे दिशा देने की एक ताक़तवर तकनीक सीखते हैं । जिसमें हम चार बातों पर ध्यान देते हैं ।

सबसे पहले स्वयं की मानसिकता को समझो, उसके प्रति जागरूक बनो, उसे बदलो और अंत में उसका इस्तेमाल करो । लगभग आधा दिन हम स्टेट मैनेजमेंट पर एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर के दौरान चर्चा करते हैं, एक्टिव्हीटीज करते हैं, डेमो देखते हैं और अंत में प्रॅक्टिकल आजमाते हैं । पर जैसे ही हम एन.एल.पी. मास्टर तथा एन.एल.पी. ट्रेनर कोर्स में आते हैं, तो हम स्टेट मैनेजमेंट के अगले एवं थोड़े गहन हिस्से की तरफ मुड़ते हैं, जिसे ‘मेटा स्टेटस्’ कहा जाता है । अब थोड़ा पारिभाषिक शब्दों को बाजू में रख दो । तो इस में समझने वाली बात यह है, कि अगर आपको ‘स्टेट मैनेजमेंट’ का स्वयं तथा दूसरों के लिए इस्तेमाल करना है, तो एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर में वह काम पूरा हो जाता है, पर अगर आपको ‘स्टेट मैनेजमेंट’ सिखाना है, तो बतौर एन.एल.पी. ट्रेनर ‘मेटा स्टेट’ के इस्तेमाल में महारत हासिल करना, आपके लिए बेहद जरूरी होता है, जो एन.एल.पी. मास्टर तथा एन.एल.पी. ट्रेनर कोर्स का हिस्सा है ।
जब आप एन.एल.पी. मास्टर तथा एन.एल.पी. ट्रेनर कोर्स का इन-हाउस वर्कशॉप पूरा करते हैं, तब आप एन.एल.पी. के उस पूरे जंगल को देख पाते हैं, जिसके बाद एक अकेले पेड़ को देखना आसान हो जाता है । संक्षेप में एन.एल.पी. मास्टर तथा एन.एल.पी. ट्रेनर कोर्स आपको एन.एल.पी. का व्यापक चित्र दिखाता है, जिससे एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर समझना और सिखाना आसान हो जाता है, इसीलिए एन.एल.पी. सिखाने से पूर्व मास्टर्स और ट्रेनर का कोर्स पूरा करना बेहद जरूरी होता है ।
आपके एन.एल.पी. ट्रेनर बनने के सपने को वास्तव में सकारित होते देखना हमारे लिए एक आनंददायी अनुभव होगा । इस पूरी यात्रा में इंडियन बोर्ड ऑफ़ हिप्नोसिस एंड न्यूरो-लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग (आइ.बी.एच.एन.एल.पी.) हमेशा आपके साथ रहेगा, यह मैं आप से वादा करता हूँ ।
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आइ.बी.एच.एन.एल.पी. द्वारा आयोजित एन.एल.पी. कोर्सेस की अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें या फिर एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर कोर्स के रजिस्ट्रेशन हेतू आज ही संपर्क करें - +919834878870 या हमें लिखिए [email protected]

एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर कोर्स के बाद पोस्ट ट्रेनिंग सपोर्ट का महत्त्व
फोर व्हिलर सीखते समय मुझे जो अनुभव हुआ, पता नहीं आपको भी वैसा ही अनुभव हुआ होगा, या नहीं । अगर नहीं, तो आप याद तो जरूर कर सकते हैं कि आपका वह अनुभव कैसा था?
जब पहली बार मैंने फोर व्हिलर सीखना शुरू किया, वह दिन मुझे आज भी याद है । सुबह का समय था । मैंने पहली बार कार का स्टेयरिंग अपने हाथों में थामा था । वह दिन था 18 अक्टूबर का, मेरे मित्र का जन्मदिन था । सुबह-सुबह वह मुझे गाड़ी सिखाने आ पहुँचा । जाड़े के दिनों की शुरुआत थी । सुबह की सर्द हवा महसूस हो रही थी । वातावरण में बनी ताजगी एवं उल्लास को मैं अनुभव कर रहा था । आकाश में बादल न के बराबर थें, मानो किसी ने आकाश को नीले रंग से पोत दिया हो । जिस रास्ते पर मैं कार चलाने की प्रैक्टिस करने वाला था, वैसे तो वह रास्ता सुनसान था, वहाँ ज्यादा गाड़ियों का ज्यादा आना जाना न था । उस रास्ते पर हमेशा शांती बनी रहती थी । उस दिन पहली बार मैं ड्रायव्हिंग सीट पर बैठा सामने उस खाली रास्ते को निहार रहा था । मेरा मित्र मुझे कुछ सूचनाएँ दे रहा था, जिन्हें मैं ध्यानपूर्वक सुन रहा था । मेरा एक हाथ स्टेयरिंग पर था, मित्र की सूचनाओं का पालन करते हुए, मैंने आहिस्ते से चाबी घुमाई और कार शुरू हुई । एक अजीब सा एहसास हो रहा था, शरीर में एक उत्तेजना थी, मैं थोड़ा नर्व्हस महसूस कर रहा था, मैं अपने आप को अतिशय जागरूक भी महसूस कर रहा था ।
वह एक यादगार दिन था, अगर आपने भी कभी कार चलाना सीखा होगा, तो वे शुरुआती दिन आपके लिए भी यादगार रहे होंगे । मैं हर गुजरते चीज के प्रति जागरूक था, चाहे वे पेड़ हो, या रास्ते से गुजरनेवाली गाड़ियाँ । इतना ही नहीं, उस दिन तो मुझे रास्ते के किनारे पड़े छोटे मोटे पत्थर भी दिखाई दे रहे थें । शायद जीवन में पहली बार मैंने इतनी अवेयरनेस की अनुभूती की थी । वह कार चलाना सीखना एक अभूतपूर्व अनुभव था । मेरा पूरा फोकस गाड़ी चलाने पर था, मानो मेरा शरीर और मन एक हो गया हो ।
धीरे-धीरे कार आगे बढ़ रही थी, मुझे ऐसा एहसास हो रहा था कि जैसे मैं अपने जीवन में आगे बढ़ रहा हूँ, जीत का परचम लहरा रहा हूँ, उस समय मुझे स्वयं के प्रति अच्छा महसूस हो रहा था । कितनी सारी चीजें मैं एक साथ कर रहा था, जैसे कि स्टेयरिंग व्हिल संभालना, गियर बदलना, क्लच एवं ब्रेक का ताल बनाए रखना, उपर से मेरे मित्र की अनगिनत सूचनाएँ सुनना! शुरूआत में यह सब असंभव लग रहा था । कितना कठिन था वह सब एक साथ करना । भविष्य में मैं कभी आराम से गाड़ी चला पाउँगा, इसकी कल्पना करना भी उस समय मुश्किल लग रहा था । कितना अलग और बेहतरीन अनुभव था । पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे गाड़ी चलाना महज एक रूटीन बन गया । आज जब मैं अच्छे से गाड़ी चला लेता हूँ, तब भी ये सारी चीजें घट रही हैं, स्टेयरिंग व्हिल, गियर, क्लच, ब्रेक, म्यूजिक, साथ में बैठे सह यात्रियों के साथ गपशप, पर अब यह गाड़ी चलाने की प्रक्रिया अन्कॉन्शस् लेवल पर हो रही है । इसके लिए अब मुझे पहले जैसा प्रयास नहीं करना पड़ता, ना ही मुझे विरूद्ध दिशा से आने वाली हर गाड़ी से डर लगता है । आज यह सब बड़े आराम से हो रहा है, अब मैं गाड़ी चलाना एन्जॉय कर रहा हूँ । अगर आप भी इस अनुभव से गुजरे हैं, तो आपको भी पता होगा कि आज भी आप वही सब कुछ कर रहे हैं, जो आपने गाड़ी सीखने के पहले दिन किया था । पर तब में और अब में सिर्फ एक ही फर्क है, तब चीजें कॉन्शस् इन्कॉम्पिटन्स लेवल पर थीं और आज चीजें अन्कॉन्शस् कॉम्पिटन्स लेवल पर है ।
किसी भी कौशल में महारत हासिल करने के चार तल ।

एन.एल.पी. सीखते समय भी आपको ठीक ऐसा ही महसूस होगा । छह दिनों के एन.एल.पी. ट्रेनिंग वर्कशॉप में आप ढेर सारे एन.एल.पी. टूल्स् एवं टेक्निक्स् सीखेंगे, लगभग बीस से भी ज्यादा और ये सारे एन.एल.पी. स्किल्स् आपको अपने एवं दूसरों के जीवन को परिवर्तित करने में मदद करेंगे । हम एक-एक स्किल अलग-अलग सीखेंगे, पर आखरी दिन हम सारे स्किल्स् को एकत्रित करते हुए एन.एल.पी. का पूरा माजरा क्या है? यह समझने की कोशिश करेंगे । जैसे कि अगर आप किसी को कोचिंग दे रहे हैं, तो सबसे पहले आपको ‘पीक स्टेट’ में आना होगा, क्लाइंट से बात करते हुए आपको अपनी सेन्सरी अक्युटी का इस्तेमाल करना होगा, ‘मेटा मॉडल’ का इस्तेमाल करते हुए सवाल पूछने होंगे, आवश्यकता के अनुसार मिल्टन मॉडल का इस्तेमाल करना होगा । जहाँ जरूरी है, वहाँ ‘पॅटर्न इन्टरप्ट’ की भी मदद लेनी होगी । इतना सब करते हुए चेंज वर्क प्रोसेस में एन.एल.पी. की कौन सी तकनीक इस्तेमाल करनी है? इसके बारे में भी सोचना होगा । यह सब ऐसा ही होगा, जैसे कार चलाना सीखते वक्त हुआ था । उस समय भी शुरूआत में ढेर सारी चीजों को हमें एक साथ करना होता था । शुरू-शुरू में हम गाड़ी रोकना चाहते थे, तो गाड़ी आगे बढ़ जाती थी, हम ब्रेक लगाना चाहते थे, तो एक्सीलेटर पर पैर पड़ जाता था, इन सब के बीच कभी-कभी गियर अटकने लगते थे, बीच में ही गलती से वायपर शुरू हो जाते था । पर धीरे-धीरे हमारे अन्कॉन्शस मन ने चीजों को समझाना शुरू किया । चीजें कॉन्शस् लेवल से अन्कॉन्शस लेवल पर आती गयी और जैसे ही चीजें अन्कॉन्शस् लेवल पर आती हैं, हम उनमें माहिर बनते हैं ।
ऐसा ही कुछ होगा शुरुआती दिनों में जब आप एन.एल.पी. का इस्तेमाल करना शुरू करेंगे । शुरू-शुरू में शायद आपको ऐसा लग सकता है कि इतना सब मुझसे कैसे होगा? शायद आपको यह सब असंभव लगेगा, ऐसा लगेगा कि इतनी महारत हासिल करने में तो अनेक वर्ष लग जायेंगे । बहुत बार आप अनुभव करेंगे, कि आप सेन्सरी अक्युटी का इस्तेमाल करने लगते हैं, तो मेटा मॉडल का इस्तेमाल करना भूल जाते हैं, मिल्टन मॉडल इस्तेमाल करने लगते हैं, तो पॅटर्न इन्टरप्ट का समय निकल जाता है, या कभी-कभी ऐसा होगा कि कोचिंग सेशन के अंत तक आपको यहीं समझ में नहीं आएगा कि क्लाइंट की इस समस्या के लिए कौन सी एन.एल.पी. तकनीक इस्तेमाल की जाए? जो ट्रेनर्स, कोचेस्, लिडर्स, साइकोलॉजिस्ट, टीचर्स्, मॅनेजर्स् इ. एन.एल.पी. सीखते हैं, तो एन.एल.पी. स्किल्स् इस्तेमाल करने में शुरू-शुरू में सबको दिक्कत होती है । पर इससे विचलित होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, क्योंकि यह शुरुआती दौर है, जिस में ऐसा होना लाजमी है, इसीलिए हमारा फोकस इस बात पर रहेगा कि ट्रेनिंग के बाद किस प्रकार से जल्द से जल्द एन.एल.पी. स्किल्स् को कॉन्शस् इन्कॉम्पिटन्स लेवल से अन्कॉन्शस कॉम्पिटन्स लेवल पर लाया जाए ।

इसी लिए मैंने ट्रेनिंग के बाद तीस दिनों तक आपको होमवर्क सपोर्ट दिया है । हर दिन आपको सिर्फ पंद्रह मिनिट निकालकर उस दिन का होमवर्क करना है । कुछ दिन आपको एक्टिविटीज करनी होगी, शायद ऑडियो सुनना होगा, शायद रिव्हीजन होगी, दूसरों पर एन.एल.पी. तकनीकों का इस्तेमाल कर देखना होगा । ऐसा कुछ होगा, जो आपको ट्रेनिंग में सीखे हुए एन.एल.पी. स्किल्स को तराशने में, एन.एल.पी. में महारत हासिल करने में मदद करेगा । आपका तीस दिनों का होमवर्क सपोर्ट इतना आसान है कि आपको होमवर्क करने में सहजता महसूस होगी और मजा भी आएगा । आपने एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स में बिताए हुए यादगार पल आप फिर से अनुभव करेंगे । जो एकाध संकल्पना समझने में शायद आपको दिक्कत आयी हो, वह आप होमवर्क सपोर्ट एक्टिविटीज द्वारा सहजता से समझ पाएँगे । साथ ही आप इन प्रयोगों के बीच-बीच जब आप नोट्स रेफर करेंगे, तो आपकी समझ और गहरी होगी । सभी पोस्ट ट्रेनिंग सपोर्ट एक्टिविटीज को इसप्रकार से तैयार किया गया है कि हर एन.एल.पी. स्किल का अच्छी तरह से अभ्यास हो और रोजमर्रा की जिंदगी में उन स्किल्स् को इस्तेमाल करने में आपको आसानी हो ।
इन तीस दिनों में एन.एल.पी. स्किल्स् को कॉन्शस् लेवल से अन्कॉन्शस् लेवल तक ले जाने की हम पुरजोर कोशिश करते हैं । तीस दिनों तक हर रोज़ सिर्फ पंद्रह से बीस मिनिट आपको एन.एल.पी. में महारत हासिल करने में मदद करेंगे । पोस्ट ट्रेनिंग सपोर्ट का स्वरुप जानने हेतू यहाँ क्लिक करें ।

एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन : एक अनसुलझी पहेली
एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन : एक अनसुलझी पहेली
क्या आप सिर्फ और सिर्फ एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन को लेकर चिंतित हैं?
अगर ‘हाँ’, तो आपको यह ब्लॉग जरूर पढ़ना चाहिए ।
एक दिन एक जंगल में सुबह के समय एक लोमड़ी शिकार करने निकली । आगे चलकर उसे एक खरगोश दिखाई दिया । लोमड़ी उस खरगोश को दबोचने ही वाली थी, तभी उसे एहसास हुआ कि वह खरगोश उसकी नज़रों से नज़रे मिला रहा है और निडर होकर वहीं खड़ा है । कुछ पल के लिए लोमड़ी भी हैरान हो गयी, क्योंकि उसकी अपेक्षा थी कि उसे देखते से ही खरगोश को भाग जाएगा, पर ऐसा कुछ हुआ नहीं । जैसे ही लोमड़ी खरगोश के तरफ बढ़ी तो खरगोश और सीना तान के उसके सामने खड़ा रहा । लोमड़ी और आगे बढ़ी, पर खरगोश जगह से हिलने का नाम नहीं ले रहा था । यह सब देखकर लोमड़ी परेशान थी । उसे समझ में नहीं आ रहा था, कि क्या हो रहा है? नजदीक जाने के बाद उसने खरगोश से कहा, “क्या तुम्हें पता नहीं है कि मैं लोमड़ी हूँ और मैं मांसाहार करती हूँ । शायद तुम्हें अंदाजा नहीं है कि मेरे पंजे कितने खूंखार हैं, सिर्फ एक झपट्टा और तुम मौत की नींद सो जाओगे । तुम्हारी औकात ही क्या है मेरे सामने? तुम तो बस एक क्षुद्र प्राणी हो, तुम्हें मुझ से डरना चाहिए । मुझे देखते ही तुम्हें भागना चाहिए । मैं एक लोमड़ी हूँ और एक खुंखार एवं ताक़तवर प्राणी हूँ ।” इस पर शांती से खरगोश ने कहा, “क्या तुम्हारे पास कोई सर्टिफिकेट है लोमड़ी होने का? सर्टिफिकेट चाहिए, नहीं तो हमें कैसे पता चलेगा कि तुम कौन हो? जाओ, सर्टिफिकेट लेकर आओ और फिर बात करेंगे ।”
इस पर लोमड़ी भ्रमित हो गई और चल पड़ी शेर की गुफा की तरफ, क्योंकि शेर तो जंगल का राजा था और अगर लोमड़ी होने का सर्टिफिकेट लेना हो, तो उससे ही लेना पड़ेगा और कुछ ही देर में लोमड़ी शेर के सामने खड़ी थी । उसने शेर से कहा, “राजा साहब! जंगल में सारे प्राणी सर्टिफिकेट मांग रहे हैं, उन्हें यकीन नहीं है कि मैं ही लोमड़ी हूँ, कृपा कर मुझे सर्टिफिकेट दे ।” शेर ने कागज लिया, पेन लिया और लिखना शुरू किया, “यह एक लोमड़ी है और मांसाहार करती है । इसके पंजे बड़े ही खुंखार तथा जानलेवा होते हैं । सिर्फ एक झपट्टे से ही छोटे जानवरों की मौत भी हो सकती है, इसी लिए सारे क्षुद्र प्राणियों को इससे डरना चाहिए । इसे देखते ही भाग जाना चाहिए । यह एक लोमड़ी है और एक खुंखार तथा ताक़तवर प्राणी है ।” नीचे शेर ने मुहर लगाई, हस्ताक्षर किए और लोमड़ी को बड़े ही आदर से सर्टिफिकेट दे दिया ।
लोमड़ी सर्टिफिकेट लेकर फिर से खरगोश के पास गई और उसे सर्टिफिकेट दिखाया । सर्टिफिकेट पढ़ने के बाद खरगोश की आँखों में डर छा गया, उसके हाथ पैर कांपने लगें और पलभर में खरगोश वहाँ से भाग गया । इससे लोमड़ी को बड़ा अच्छा लगा कि चलो, कम से कम सर्टिफिकेट देखने के बाद तो खरगोश डर कर भागा, याने अब फिर से छोटे प्राणी मुझसे डरने लगेंगे । उसे लगा कि शेर को धन्यवाद देना चाहिए और इसी लिए लोमड़ी फिर से शेर की गुफा की तरफ चल पड़ी । लोमड़ी ने दूर से ही देखा कि एक गधा शेर के बगल में खड़ा था और शेर से शेर होने का सर्टिफिकेट मांग रहा था । लोमड़ी हैरान थी, उसे इसकी बिलकूल ही उम्मीद नहीं थी कोई शेर से भी सर्टिफिकेट मांग सकता है । जैसे ही गधे ने शेर से सर्टिफिकेट मांगा, शेर ने गधे से कहा, “मुझे अगर भूख लगी होती, तो तुझे सर्टिफिकेट मांगने का समय भी नहीं मिलता, अब तक तू मेरे पेट में होता और अगर मुझे भूख नहीं लगी है, तो मुझे परवाह नहीं है कि तू क्या बकबक कर रहा है ।” शेर ने गधे से जो कहा, फिर से एक बार मैं दोहराता हूँ, “मुझे अगर भूख लगी होती, तो तुझे सर्टिफिकेट मांगने का समय भी नहीं मिलता, अब तक तू मेरे पेट में होता और अब जब कि मुझे भूख नहीं लगी है, तो मुझे पर्वा नहीं है कि तू क्या बकबक कर रहा है ।” शेर का जबाब सुनकर लोमड़ी को एहसास हुआ कि सर्टिफिकेट से ज्यादा "मैं ताक़तवर हूँ ।” यह एहसास, यह स्पिरिट, यह आत्मविश्वास और यह खुमारी दिल में होना जरूरी है ।
अगर यह कहानी पढ़ने के बाद आप इस नतीजे तक पहुँचे हैं कि सर्टिफिकेट की कोई आवश्यकता ही नहीं है, तो शायद मैं अपनी बात आप तक पहुँचाने में असफल रहा । मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि एन.एल.पी. ट्रेनिंग सर्टिफिकेट से ज्यादा एन.एल.पी. का स्पिरिट हमें अपने भीतर खड़ा करने की आवश्यकता है । यह स्पिरिट, यह आत्मविश्वास और यह खुमारी शायद सिर्फ हमारे पास सर्टिफिकेट होने ने से नहीं आएगी । ‘मुझे केवल एन.एल.पी. का सर्टिफिकेट चाहिए ।’ इस विचार से उपर उठकर आपको सोचना होगा । आपको एन.एल.पी. का यह स्पिरिट अपने अंदर जगाना पड़ेगा । उस आत्मविश्वास को जगाने के लिए थोड़ी मेहनत करनी होगी । उस खुमारी को आविष्कृत करने के लिए प्रयास करना होगा । यही स्पिरिट, यही आत्मविश्वास और यही खुमारी एक अतुलनीय ताक़त को निर्मित करती है, जो किसी आम को खास बनाती है ।
सर्टिफिकेट सिक्के का सिर्फ एक पहलू है, जो महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन उससे भी ज्यादा उस एन.एल.पी. स्पिरिट को जगाना ज्यादा आवश्यक है, इसीलिए आइ.बी.एच.एन.एल.पी. सर्टिफिकेट के साथ-साथ आप के भीतर एन.एल.पी. स्पिरिट को जागृत करने के लिए भरसक कोशिश करती है, प्री-ट्रेनिंग कोर्स तथा पोस्ट ट्रेनिंग द्वारा आपकी यथासंभव मदद भी की जाती है और यहीं वह बात है, जो आइ.बी.एच.एन.एल.पी. को दूसरे एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस् से अलग करती है ।

एन.एल.पी. सर्टिफिकेट के साथ-साथ थोड़ी इस बात की भी चिंता करें, कि जिस विषय में आपको सर्टिफाय किया जा रहा है, उस विषय में आपको सच में महारत हासिल हो रही है, या नहीं । मैंने देखा है कि अनेक प्रतिभागी केवल ऐसा सोचकर एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स जॉइन करते हैं कि एक अच्छा एन.एल.पी. ट्रेनिंग सर्टिफिकेशन मिल जाए तो बाकी सब मैं देख लूँगा, वैसे तो मुझे सब कुछ पता है, केवल किसी अच्छी एन.एल.पी.ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट का सर्टिफिकेशन मिल जाए, तो बात बन जायेगी । ऐसे प्रतिभागी ना तो एन.एल.पी. को सही मायने में समझने में उत्सुक होते हैं, ना ही एन.एल.पी. टूल्स एवं टेक्निक्स को समझकर अपने जीवन को रूपांतरित करने में । इसी लिये शायद सर्टिफिकेशन मिल जाने के पश्चात् भी न ही वे व्यक्तिगत जीवन में कुछ बदलाव ला पाते हैं, ना ही बतौर ट्रेनर या कोच दूसरों की मदद कर पाते हैं । मूलभूत समस्या उनके दृष्टिकोन में है । सर्टिफिकेशन तभी मददरूप होता है, जब आपने उसे उसके ट्रू स्पिरिट में सीखा हो । नहीं तो मैं ऐसी बहुत सी एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस् देखता हूँ जो बहुत ही कम दाम में एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन बेचने की दुकाने खोले हुए बैठी हैं और लोग भी बड़े मजे से सर्टिफिकेशन पर सर्टिफिकेशन खरीदे जा रहे हैं । पर आप ही सोचिए कि ऐसा कोई भी सर्टिफिकेशन आगे जाकर आपको कितना मददगार साबित होगा?
एन.एल.पी. के इस जज्बे को आपके भीतर जगाने के लिए आइ.बी.एच.एन.एल.पी. में हम एन.एल.पी. के साथ-साथ हिप्नोसिस तथा लाइफ कोचिंग के अलग-अलग पहलुओं को भी कवर करते हैं । मुख्यत: डायरेक्ट हिप्नोसिस सीखने के कारण मेटा मॉडल तथा मिल्टन मॉडल समझने में प्रतिभागियों को सहूलियत होती है और लाइफ कोचिंग की प्रोसेस समझने के पश्चात् दूसरों की पेशेवर रूप में मदद करना भी शक्य होता है । इस पूरी प्रक्रिया में हमारा फोकस ट्रेनिंग को एक्सपीरियंशल बनाने पर होता है । एन.एल.पी. से क्या बदलाव आ सकता है, इसका एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर एक जीवित उदाहरण होता है, एन.एल.पी. के तकनीकी या पारिभाषिक शब्दजाल में प्रतिभागियों को न अटकाते हुए एन.एल.पी. ट्रेनिंग में हमारा फोकस सभी प्रतिभागी एन.एल.पी. की ताकत को कैसे अनुभव करें? इस पर होता है ।

सर्टिफिकेट देने से पूर्व हम इस बात का पूरा ख्याल रखते हैं कि जिस विषय में आपको प्रमाणित किया जा रहा है, उसमें आपको सही मायने में महारत हासिल हो । साथ ही साथ क्लासरूम ट्रेनिंग के बाद एक महीने तक पोस्ट-ट्रेनिंग और उसके पश्चात् आपको प्रोजेक्ट सबमिशन भी होता है, जिसका पूरा स्ट्रक्चर आपको ट्रेनिंग के छठे दिन विस्तारपूर्वक बताया जाएगा । इसके तहत आपको कम से कम तीन लोगों के औसतन पाँच लाईफ कोचिंग सेशनस् लेने हैं एवं दिए गए प्रारूप में प्रोजेक्टस् बनाकर आइ.बी.एच.एन.एल.पी. को भेजना होता है । जिससे हमें यह पता चल सके कि आपको जिस एन.एल.पी., हिप्नोसिस, लाईफ कोचिंग के लिए सर्टिफाय किया जा रहा है, वह उचित है, या नहीं । आपके प्रोजेक्टस् बोर्ड मेम्बर्स द्वारा स्वीकृत होने के बाद ही आपको आइ.बी.एच.एन.एल.पी. की मेम्बरशिप मिलती है, अगर आप किसी कारणवश सफलतापूर्वक प्रोजेक्टस् सबमिट नहीं कर पाते, तो आपको एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर के साथ तीन से पाँच ऑनलाइन सेशनस् करने होते हैं । याने आप ऐसा कह सकते हैं कि प्रथम सीढ़ी से लेकर सफलता के अंतिम शिखर तक के प्रवास में आइ.बी.एच.एन.एल.पी. आपके साथ होगी । हमारा दायित्व केवल आपको छह दिनों का एन.एल.पी. ट्रेनिंग प्रदान करना इतना ही नहीं होगा, इससे कई गुना जिम्मेदारी हमारे कन्धों पर होती है और हम उसे बखूबी निभाते हैं । हमारा प्रयास है कि भारत में रहते हुए आपको एन.एल.पी. का अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बेहतरीन ट्रेनिंग मिले, सर्वश्रेष्ठ सर्टिफिकेशन मिले और साथ ही साथ आप एन.एल.पी. में सही मायने में महारत हासिल करें । अब आप ही सोचे आपको करना क्या है?
केवल एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन या एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन के साथ-साथ एन.एल.पी. में महारत हासिल करते हुए भारत के सबसे तेजी से बढ़ते सबसे बड़े एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर नेटवर्क का हिस्सा बनना । फैसला आपका है ।आइ.बी.एच.एन.एल.पी. द्वारा आयोजित एन.एल.पी. कोर्सेस की अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें ।

जानियें 7 दिनों के एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्स का महत्त्व !
जानियें 7 दिनों के एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्स का महत्त्व !
इंडियन बोर्ड ऑफ़ हिप्नोसिस एंड न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग (आइ.बी.एच.एन.एल.पी.) के संस्थापक अध्यक्ष एवं एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर के होने नाते मुझसे अक्सर कुछ सवाल पूछे जाते हैं, जैसे कि...
1. क्या एन.एल.पी. सीखने के लिए एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्स करना जरूरी है?
2. क्या किताबें पढ़कर एन.एल.पी. सीखना संभव है?
3. क्या मैं किसी कॉरस्पॉण्डन्स् कोर्स या ऑनलाइन कोर्स से एन.एल.पी. सीख सकता हूँ?
4. क्या मैं एक या दोन दिन का शॉर्ट एन.एल.पी. कोर्स करते हुए एन.एल.पी. में महारत हासिल कर सकता हूँ?
वास्तविक कहा जाए तो यह दुनिया अनेक असीम सम्भावनाओं से भरी हैं । यहाँ पर कुछ भी हो सकता है । इस जहाँ में कुछ भी ना मुमकिन नहीं । अगर किसी ने ठान ही लिया कि वह सिर्फ किताबें पढ़कर ही एन.एल.पी. सीखेगा, तो शायद वह किताबें पढ़कर एन.एल.पी. सीख भी जाएगा । सीधे तौर पर, “क्या यह संभव है? क्या यह हो सकता है? क्या मैं यह कर सकता हूँ?” इसप्रकार के सवालों के उत्तर ‘ना’ में, या ‘हाँ’ में देना, मेरे लिए तो संभव नहीं है, क्योंकि यह दुनिया इतनी बेबुझ है, कि यहाँ पर कुछ भी हो सकता है, जैसे कि लगभग सौ साल पहले याने सन 1916 में आइन्स्टाइन ने भविष्यवाणी की थी, कि गुरूत्वाकर्षणीय तरंगें होती हैं, जो हमारी आँखें देखने में समर्थ नहीं हैं, याने अगर आपके टेबल से आपका पेन फर्श पर गिरता है, तो वह केवल गुरूत्वाकर्षण की तरंगें उसे नीचे खींच रही है इस लिए । पर मानवी आँखों को वे तरंगें दिखाई नहीं देती । इसप्रकार की बात आइन्स्टाइन ने सालों पहले की थी, जिसे उस समय के वैज्ञानिकों ने खारीज किया था । अब सन 2017 में डॉक्टर वीस, डॉक्टर थॉर्न और डॉक्टर बेरिष को फिजिक्स के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन के चलते नोबल पारितोषिक से नवाजा गया । आइन्स्टाइन की सौ साल पुरानी इस बात को इन तीनों भौतिक शास्त्रीयों ने 20 साल के निरंतन शोध के बाद सिद्ध किया । याने इस असीम संभावनाओं भरी दुनिया में बहुत से प्रश्नों पर ठोस ‘हाँ’ या ‘ना’ में जबाब देना कठिन होता है, इसी लिए अगर आपने ठान ही लिया है कि बिना कोई एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स किये एन.एल.पी. सीखना ही है, तो शायद आप सीख भी सकते हैं, और इस केस में आप को यह ब्लॉग आगे पढ़ने की भी जरूरत नहीं है, पर अगर आपको लगता है कि एन.एल.पी. सीखने का आपका सफर ज्यादा तेज, सटीक, सुखदायक तथा सकारात्मक परिणामों से भरा हो, तो कुछ बातों पर हमें गौर करना होगा ।
सबसे पहले दूसरे सवाल से शुरूआत करता हूँ , ‘क्या किताबें पढ़कर एन.एल.पी. सीखना संभव है?’
- अब तक एन.एल.पी. पर लगभग दो हजार से ज्यादा किताबें लिखी गई हैं । अगर हम सिर्फ सबसे महत्वपूर्ण सौ किताबें भी निकाले, तो आपको इन्हें पढ़ने में, समझने में और उन पर अमल करने में शायद एक या दो साल लगेंगे और ज्यादातर लोगों के लिए यह काम असंभव श्रेणी का होगा ।
अब तीसरा सवाल, ‘क्या मैं किसी कॉरस्पॉण्डन्स् कोर्स से या ऑनलाइन कोर्स द्वारा एन.एल.पी. सीख सकता हूँ?’
- एन.एल.पी. कोई थ्योरी नहीं है, स्किल सेट है, जिसे प्रात्यक्षिकों के जरिए समझना ज्यादा आसान होता है । लाइव्ह क्लासरूम सेटिंग ट्रेनिंग में ढेर सारे प्रात्यक्षिक होते हैं, परिणामतः एन.एल.पी. समझना ज्यादा सरल, सटीक और ठोस होता है । शायद आपको पता ही होगा कि एन.एल.पी. में हम अपने अंतर्मन पर काम करते हैं, इसीलिए एन.एल.पी. समझने के लिए पढ़ने से ज्यादा उसे अनुभव करना महत्वपूर्ण होता है, जो लाइव्ह एन.एल.पी. ट्रेनिंग वर्कशॉप में आराम से होता है । साथ ही साथ एक कुशल एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर आपका एन.एल.पी. सीखने का घंटों का काम चंद मिनिटों में करा सकता है ।
अब चौथा सवाल, ‘क्या मैं एक या दोन दिन का शॉर्ट टर्म एन.एल.पी. कोर्स करते हुए एन.एल.पी. में महारत हासिल कर सकता हूँ?’
- यह लगभग असंभव है, क्योंकि एक या दो दिनों में एन.एल.पी. जैसे विस्तारीत विषय को समझना, उसकी ताक़त को अनुभव करना बहुत ही कठिन है । हाँ, एक, दो दिनों में आप एन.एल.पी. के कुछ प्रारंभिक स्किल्स जरूर सीख सकते हैं, पर एक, दो दिनों में एन.एल.पी. को विस्तार से समझना नामुमकिन हैं । कुछ एन.एल.पी. ट्रेनर एक या दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित करते हैं, पर यकिन मानिए इस प्रकार के कोर्सेस में सिर्फ वे एन.एल.पी. की ‘ए बी सी डी’ ही सिखाते हैं । आइ.बी.एच.एन.एल.पी. में एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर कोर्स छह दिन चलाता है, पर फिर भी मुझे लगता है कि आगे चलकर छह दिन के कम से कम ग्यारह दिन करने चाहिए । शुरू-शुरू में एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर कोर्स लगभग इक्कीस दिनों का हुआ करता था, इसीलिए एन.एल.पी. ठीक से समझने के लिए कम से कम छह दिनों का कोर्स तो होना ही चाहिए ।

अब सबसे पहला और महत्वपूर्ण सवाल अंत में, ‘क्या एन.एल.पी. सीखने के लिए एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्स करना जरूरी है?’
- मुझे लगता है कि सिर्फ जरूरी ही नहीं, बेहद जरूरी है । एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्सेस साधारणतः पाँच से छह दिनों के होते हैं । इन पाँच से छह दिनों में हम एन.एल.पी. की गहराईयों में जाकर एन.एल.पी. टूल्स एवं टेक्निक्स का व्यक्तिगत जीवन में तथा पेशेवर तरीके से कैसे उपयोग करना यह सीखते हैं । इसमें अनेक प्रत्याक्षिक होते हैं, प्रक्टिकल्स् होते हैं, इंडिविजुअल एक्टिविटीज् होती हैं, ग्रुप एक्टिविटीज होती हैं, आउटबाउंड एक्सरसाइझेस भी होती हैं, साथ में थोड़ा होमवर्क भी होता है । इससे हम जो कुछ भी सीखते हैं, उसे समझने में न केवल आसानी होती है, बल्कि हँसते-खेलते जीवन रूपांतरण की प्रक्रिया भी घटित होती है और यह सिर्फ इनहाउस क्लासरूम सेटिंग एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स में ही संभव होता है ।
शायद आपको पता होगा कि मेटा मॉडल और मिल्टन मॉडल एन.एल.पी. की बुनियाद है और आइ.बी.एच.एन.एल.पी. में हम पूरे दो दिन लगातार इन मॉडल्स् को सीखते हैं और इस्तेमाल करने का अभ्यास भी करते हैं । विस्तार से इन दो मॉडल्स् को सीखने के लिए पूरे दो दिन देना सिर्फ एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर सर्टिफिकेशन कोर्स में ही संभव होता है ।
एन.एल.पी. में हम पॅटर्नस् सीखते हैं । ये एन.एल.पी. पॅटर्नस् किसी भी चेंज वर्क में काफ़ी अहम भूमिका निभाते हैं । ये एन.एल.पी. पॅटर्नस् हमारे अंर्तजगत में बदलाहट लाते हैं, इसी लिए इन्हें थोड़ा विचारपूर्वक और सावधानी से इस्तेमाल करना होता है । ऐसे भी कुछ पॅटर्नस् हैं, जिनके लिए प्रतिभागियों को व्यक्तिगत सहायता की आवश्यकता होती है, जहाँ मंझे हुए एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन बेहद जरूरी होता है और एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर की यह व्यक्तिगत मदद सिर्फ दीर्घकालीन एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर सर्टिफिकेशन कोर्स के दौरान ही संभव होती है ।
साथ ही साथ अगर आप ट्रेनिंग फिल्ड से जुड़े हो, किसी कंपनी में मॅनेजर हो, एच.आर. हो, ट्रेनर हो, टीचर हो, कोचिंग के क्षेत्र में काम कर रहे हो, या साइकोलॉजी के क्षेत्र से जुड़े हो, तो एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्स आपके लिए सुनहरे भविष्य की बहुत सारी संभावनाओं को खोल देता है । आपके व्यावसायिक प्रगति के लिए भी एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्स आपको मदद करता है, अतः मुझे लगता है कि एन.एल.पी. सीखने के लिए एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर सर्टिफिकेशन कोर्स ही सबसे बेहतरीन विकल्प है ।
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जरा सोचिए आप आपकी जिंदगी के महत्वपूर्ण छह दिन सिर्फ और सिर्फ एन.एल.पी. सीख रहे हैं, पूरी तरह से फोकस्ड् हैं, अलग-अलग एक्टिव्हीटीज में बढ़ चढकर हिस्सा ले रहे हैं, सीखते समय आप हंस रहे हैं, सोच रहे हैं, समझ रहे हैं, एन.एल.पी. स्किल्स को सही मायने में जीवन में उतार रहे हैं, स्वयं के भीतर एक बेहतरीन अनुभव को निर्मित होता पा रहे हैं, एन.एल.पी. की बारीकियाँ आपको सटीक तरीके से समझ में आ रही हैं, आप अलग-अलग एन.एल.पी. पॅटर्नस् का सहजता से इस्तेमाल करते हुए स्वयं के भीतर एन.एल.पी. की सही समझ निर्मित कर रहे हैं, मानों किसी ने आपके मस्तिष्क को आपके सामने खोल कर रख दिया हो, मस्तिष्क की जटिल विचार प्रक्रियाओं के मूल तक जाकर आप उन्हें परिवर्तित करने में सक्षम हो रहे हो, स्वयं के दिमाग को समझना आपके लिए एक बेहतरीन अनुभव साबित हो रहा है, जिससे आपको स्वयं के जीवन पर नियंत्रण महसूस हो रहा है, एक आत्मविश्वास खड़ा हो रहा है, आपको अच्छा महसूस हो रहा है, इतना ही नहीं आप में यह आत्मविश्वास भी जग रहा है कि आप बेहतर तरीके से दूसरों की भी मदद कर पायेंगे, छह दिन आप सिर्फ एक विद्यार्थी बनकर जी रहे हैं, फिर से जिंदगी में कुतूहल निर्मित हो रहा है, कुछ नया सीखना आपको बेहतर बना रहा है और यह सिर्फ एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्स में ही संभव होता है, इसीलिए 6 दिन का एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन ही करना बेहद जरूरी है ।
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क्यों हमें एन.एल.पी. को भारत में अलग नजरिए से देखना होगा?
अगर हम एन.एल.पी. सीखने में उत्सुक हैं और उसे हमारे रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल भी करना चाहते हैं, तो एन.एल.पी. को हमें थोड़ा अलग नजरिए से देखना होगा ।
(बहुत सारे लोग एन.एल.पी. सीखते हैं, पर उसका इस्तेमाल दैनिक जीवन में नहीं कर पाते क्योंकि उन्होंने ट्रेनिंग में जो सीखा हैं, उसमें और रोजमर्रा के जीवन में जो इस्तेमाल करना है, उसमें बहुत ज्यादा अंतर आ जाता है ।) जैसे कि एन.एल.पी. में ‘एल’ का मतलब लँग्वेज है और एन.एल.पी. की निर्माण अंग्रेजी में हुआ, तो एन.एल.पी. में बहुत सारे ऐसे एन.एल.पी. पॅटर्नस् हैं, जो अंग्रेजी में रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होते हैं, पर उसी प्रकार के पॅटर्नस् हमें भारतीय भाषाओं में नहीं मिलतें, इतना ही नहीं भारत में बोली जाने वाली अंग्रेजी भी ग्रेट ब्रिटन या अमेरिकन अंग्रेजी से काफ़ी अलग है, इसीलिए एन.एल.पी. को समझते समय कम से कम भारत में हमें थोड़ा अलग नजरिया रखना होगा । इसीलिए, ‘क्यों हमें एन.एल.पी. को भारत में अलग नजरिए से देखना होगा?’ इस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब हम थोड़ा विस्तार पूर्वक समझने की कोशिश करते हैं ।
1. मेटा मॉडल: आपको शायद पता होगा कि एन.एल.पी. की शुरूआत हुई मेटा मॉडल से, जो व्हरजीनिया सटायर तथा फ्रिटस् पर्ल्स् के भाषा कौशल पर आधारित था । थेरपी जगत में उस समय इन दोनों के नाम बहुत चर्चा में थे । यह दोनों बड़ी सहजतापूर्वक क्लांयट के अंतर्जगत में बदलाहट लाते थें । अंतर्जगत की जो चीजें बदलने में एवं जीवन को रूपांतरित करने में जहाँ दूसरों को सालों लगते थें, वहीं काम यह दोनों कुछ ही पलों में कर देते थें । बहुत बार सिर्फ एक काउंसलिंग सेशन में निराशा, चिंता, दुःख, क्रोध, नकारात्मकता दूर हो जाती थी । एक नई जिंदगी शुरू होती थी । लोग इनके पास रोते हुए आते थे और हँसते हुए जाते थे, निराश होकर आते थे और उत्साहित होकर लौटते थे । यह एक जादू था, कुछ पलों में जिंदगी बदल जाती थी । सालों से चली आयी समस्याएँ मिनिटों में दूर हो जाती थी । अब सवाल था कि सटायर और पर्ल्स् यह जादू करते कैसे थे?
जब रिचर्ड बॅन्डलर एवं जॉन ग्राइंडर ने, जो कि एन.एल.पी. के सह संस्थापक हैं, इन दोनों का निरीक्षण करना शुरू किया, तो उन्हें पता चला कि व्हरजीनिया सटायर और फ्रिटस् पर्ल्स् दोनों ही भाषा का इस्तेमाल इतने सटीकता एवं सहजता से कर रहे हैं कि उनकी भाषा के कुशलतापूर्वक प्रयोग के कारण ही वे अपने क्लाइंट के जीवन में बदलाहट ला रहे हैं । उनकी भाषा के इस विशिष्ट जादूई प्रयोग के गहन अध्ययन के पश्चात् रिचर्ड बॅन्डलर एवं जॉन ग्राइंडर ने उनकी भाषा के उपयोग में कुछ पॅटर्नस् या प्रतिरूप पाये । उन पॅटर्नस् को इकठ्ठा कर जब एन.एल.पी. संस्थापकों ने उनका इस्तेमाल करना शुरू किया, तब उन्हें भी आश्चर्यजनक परिणाम हासिल होने लगे । एन.एल.पी. संस्थापक भी सटायर और पर्ल्स् दोनों के समान थेरपी में परिणाम हासिल करने लगे । बदलाहट इतनी जल्दी हो सकती है, इस पर विश्वास करना कठिन था, पर जीवन रूपांतरित होने के सेंकडो प्रमाण सामने थें । परिणामस्वरूप उन लॅन्ग्वेज पॅटर्नस् को अधार बनाकर एन.एल.पी. पर पहली किताब लिखी गई, जिसका नाम था ‘दि स्ट्रक्चर ऑफ मॅजिक’, जो पूरी तरह से भाषा विज्ञान एवं भाषा के सटीक उपयोग पर आधारित है । किस प्रकार हम अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हुए स्वयं के तथा दूसरों के जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं, इस के बारे में पुस्तक में बताया गया था ।
मेटा मॉडेल हमें भाषा का इस्तेमाल करते हुए भाषा पर ही किस प्रकार सवाल खड़े किये जा सकते हैं, जिससे स्वयं के और दूसरों के अंतर्जगत को पूरी तरह से कैसे बदला जा सकता है, इसका मार्गदर्शन करता है ।
पर समस्या तब खड़ी होती है, जब मेटा मॉडल को हम प्रादेशिक भाषाओं या भारतीय अंग्रेजी में इस्तेमाल करना शुरू करते हैं । मेटा मॉडल के कुछ पॅटर्नस् ऐसे हैं, जो हमारी प्रादेशिक भाषाओं या भारतीय अंग्रेजी में इस्तेमाल ही नहीं होतें । हमारी भाषाओं में हम थोड़े अलग ढंग से सवाल पूछते हैं, इसीलिए मेटा मॉडल को हम उसके मूल रूप में कम से कम भारत में इस्तेमाल नहीं कर सकतें और यहीं वह कारण है, जिसके चलते आइ.बी.एच.एन.एल.पी. में हम ने मेटा मॉडल को प्रादेशिक भाषाओं में (मुख्यतः हिंदी) तथा भारतीय अंग्रेजी में ढाला है ।

2. मिल्टन मॉडल: मेटा मॉडल को इजाद करने के पश्चात् एन.एल.पी. फाउंडर्स भाषा के एक और जादूगर से मिले । यह जादूगर इतना प्रभावशाली था कि आपके समझ में आए बिना आपको बदलने की ताक़त रखता था । उसका नाम था मिल्टन इरिक्सन । मिल्टन इरिक्सन को हिप्नोसिस में महारत हासिल थी । जिंदगी की बहुत सी जटील समस्याएँ जैसे चिंता, निराशा, निरूत्साह, तनाव, विस्मरण, इ. का इरिक्सन पलभर में हिप्नोसिस के इस्तेमाल से समाधान कर देता था । उसने लाखों लोगों को लम्बे अरसे से चली आई समस्याओं से निजाद दिला दी और वह भी उनके समझ में आए बिना कि बदलाहट कैसे हुई ? वह इसप्रकार से बातें करता था कि चेतन मन रूक जाता था और सूचनाएँ अवचेतन मन में स्थिर हो जाती थी । जैसे ही सूचनाएँ अवचेतन मन में स्थिर हो जाती, वैसे जिंदगी बदल जाती थी । वह सीधे हमारे अवचेतन मन से संवाद करता था, क्योंकि जिंदगी कि कोई भी बदलाहट प्रथम अवचेतन मन में होती है और अगर बदलाहट अवचेतन मन में हो तो ही बदलाहट होती है, अन्यथा वह होती ही नहीं है । वह जिस प्रकार से बातें करता था, जिससे जीवन में बदलाहट होती थी, उन लँग्वेज पॅटर्नस् को एन.एल.पी. फांउडर्स ने इकठ्ठा कर मिल्टन मॉडल बनाया, जो एन.एल.पी. की और एक महत्वपूर्ण नींव है । मिल्टन मॉडल, मेटा मॉडल के विपरीत है । मेटा मॉडल में हम भाषा को सटीक या स्पेसिफिक करते हैं, तो मिल्टन मॉडल में हम भाषा को अस्पष्ट या व्हेग करते हैं ।
मिल्टन मॉडल के इस्तेमाल में भी वहीं दिक्कत आती है, जो मेटा मॉडल के साथ आती है । मिल्टन मॉडल के कुछ एन.एल.पी. पॅटर्नस् भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल ही नहीं होतें, इसी लिए उन पॅटर्नस् के जगह भारतीय भाषाओं इस्तेमाल होने वाले एन.एल.पी. पॅटर्नस् हमें ढूंढने होंगे और यहीं काम आइ.बी.एच.एन.एल.पी. ने किया है । हमने मिल्टन मॉडल को भी भारतीय भाषाओं में विशेषतः हिंदी में ढाला है ।
3. कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस: मिल्टन मॉडल को ही कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस भी कहा जाता है, या हम कह सकते हैं कि कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस का एक रास्ता मिल्टन मॉडल के जरिए एन.एल.पी. ने हमारे सामने रखा । पर यह बात हुई 1975 की, जब मिल्टन मॉडल एन.एल.पी. में सीखाना शुरू हुआ और बीते चालीस सालों में अलग-अलग लोगों ने कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस पर काम किया हैं । इनमें से एक नाम है इगोर लोडोचोवोस्की । इन्होंने कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस को बड़े ही आसान तरीके से दुनिया के सामने रखा । उन्हें पढ़ते वक्त मुझे लगा कि मिल्टन मॉडल के साथ-साथ अगर कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस को भी पढ़ाया जाए, तो हम मिल्टन मॉडल से भी आगे जा सकते हैं और फिर हम ने कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस का हिंदी संस्करण निर्मित किया और वहीं से मैंने मिल्टन मॉडल के साथ-साथ कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस को एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर कोर्स में सीखाना शुरू किया जिसके हमें अद्भूत परिणाम मिलें ।
यहाँ पर समस्या वही भी थी, जो मेटा और मिल्टन मॉडल के साथ थी । कुछ एन.एल.पी. पॅटर्नस् भारतीय भाषाओं में थें ही नहीं । तो हमने उसके समान एन.एल.पी. पॅटर्नस् ढुंढकर कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस का हिंदी व्हर्जन बनाया, जो कि आइ.बी.एच.एन.एल.पी. का कॉपीराइट कंटेंट है । एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर में मिल्टन मॉडल के अलावा हम साठ से ज्यादा कॉन्वर्सेशनल एन.एल.पी. पॅटर्नस् सिखाते हैं, जिन्हें रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल करना बड़ा आसान है और इसप्रकार हमने कॉन्वर्सेशनल हिप्नॉसिस को भी भारतीय भाषाओं में विशेषतः हिंदी में ढाला ।
4. आय एसेसिंग क्युज्: एन.एल.पी. में लगातार कई सालों तक आय एसेसिंग क्युज् सीखाए गए, आज भी कई एन.एल.पी. ट्रेंनिंग इंस्टिट्यूटस् में इन्हें पढ़ाया जाता है । आय एसेसिंग क्युज् का मतलब हुआ कि जिस प्रकार से आँखें अलग-अलग दिशा में घुमती है, उससे हम सामनेवाला उसके दिमाग में क्या कर रहा है उसे पहचान सकते हैं, जैसे कि जब किसी की आँखें उपरी दिशा में दाई और मुडती हैं, तो वह इंन्सान जो हुआ है, उसे याद करने की कोशिश कर रहा है और अगर उसकी आँखें उपर की तरफ बाई और घुमती है, तो इसका मतलब हुआ कि वह इन्सान दिमाग में इमेज बना रहा है । एक बार थोड़ा आय पोजिशन की नीचे दी गई इमेज को देख लें ।

अब अगर आप कल होटल में खाना खाने गए थे और आज मैंने आपसे पूछा कि क्या कल आपने होटल में खाना खाया? तो आपकी आँखें किस दिशा में जानी चाहिए? जवाब देने से पूर्व उपर दिया हुआ विवरण पढ़े और आय पोजिशन की इमेज एक बार फिर देख लें । जवाब है, उपरी दिशा में दाई तरफ, क्योंकि आप उस होटल में जाने की घटना को याद कर रहे हैं । अगर आप गए नहीं है पर फिर भी आप कह रहे हैं कि “हाँ, मैं गया था ।” और अगर आपकी आँखें उपरी तरफ बाई दिशा में घुमती हैं, तो आपके ‘हाँ’ कहने के बावजूद में आपका झूठ पकड लूंगा, क्योंकि आप होटल में ना जाने के बावजूद ‘हाँ’ कहने के लिए उस इमेज को दिमाग में बना रहे हैं ।
पर कुछ सालों के अध्ययन के बाद पता चला कि आय एसेसिंग क्युज् वैज्ञानिक आधारपर खरी नहीं उतरती है । पर फिर भी ढेर सारे एन.एल.पी. इंस्टिट्यूटस् ने इसे सीखाना जारी रखा । आइ.बी.एच.एन.एल.पी. में अब हम आय एसेसिंग क्युज् नहीं सिखाते इसके जगह सेन्सरी एक्युटी विकसित करने के जो वैज्ञानिक तरीके हैं, उन्हें सिखाया जाता है और भी बहुत सारे कारण हैं, जिनकी वजह से हमें एन.एल.पी. को भारत में थोड़ा अलग नजरिए से देखना होगा, जैसे कि माइन्डफुलनेस मैडिटेशन का थेरेपी बनना, पॉजिटिव सायकोलोजी का उदय होना, न्यूरो सायन्स का विकसित होना इ. पर इन कारणों पर अगले ब्लॉग में विस्तार सोचेंगे ।

क्या आपको एक बेहतरीन लीडर बनना है? एन.एल.पी. मदद करेगा ।
एन.एल.पी. हमें एक बेहतरीन एवं प्रभावशाली लीडर बनने में बुनियादी तौर पर मदद करता है । अब तक लीडरशिप के नाम पर हमें सिर्फ ‘लीडर करते क्या हैं?’ यही सिखाया जाता रहा है । हमें सिर्फ अच्छे लीडर की विशेषताएँ या लक्षण बताए जाते हैं और ये विशेषताएँ बड़ी ही साधारण होती हैं, जैसे कि आत्मविश्वास, लगन, प्रयास, समय प्रबंधन, लोगों से प्यार, इ. । सिर्फ ये विशेषताएँ पढ़कर जिसे सही में स्वयं को लीडर के तौर पर विकसित होना है, उसे ज्यादा फायदा नहीं होता । एन.एल.पी. हमें यहाँ से आगे की राह दिखाता है । एन.एल.पी. हमें वे स्किल्स् एवं टूल्स् सिखाता है, जिनकी मदद से एक अच्छे लीडर के तौर पर हम एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते हैं, जिससे लोग हम से जुड़कर आनंद तथा गर्व महसूस सके । एन.एल.पी. हमें एक आकर्षक भविष्य निर्माण में मदद करता है । इतना ही नहीं, एन.एल.पी. हमें आकर्षक भविष्य के निर्माण के साथ-साथ, उस आकर्षक भविष्य को अपने मन के अचेतन तल तक किस प्रकार ले जाना है, किस प्रकार उसे प्रोग्रॅम कर करना है, जिससे यह आकर्षक भविष्य हमारे जीवन का सघन हिस्सा बने, इसके लिए ठोस प्रक्रिया प्रदान करता है । एन.एल.पी. हमें एक लीडर की मन:स्थिति या माइंडसेट को किस प्रकार से हर वक्त जिया जाए, यह सिखाता है । एन.एल.पी. में हम मेटा प्रोग्रॅम सीखते हैं, जिसमें हम लोगों को उनके स्वभाव अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में रखने तथा हर श्रेणी के इंसान से संवाद प्रस्थापित करने की कला को विकसित करने के नुस्खे भी आजमाकर देखते हैं, जो किसी भी लीडर के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है ।
एन.एल.पी. हमें स्वयं की एक व्यक्तिगत लीडरशिप स्टाइल विकसित करने में मदद करता है ।
एन.एल.पी. हमें लीडरशिप विकसित करने के लिए
१. स्वयं की मन:स्थिति पर नियंत्रण पाना,
२. प्रणाली (System) के बारे में खंडो में सोचना और संपूर्ण प्रणाली को ध्यान में रखते हुए सोचना,
३. संवादकला पर प्रभूत्व, जिससे हम स्वयं के तथा औरों के अंतर्मन से जुड़ सकते हैं,
४. दूसरों से गहरे तल पर जुड़ना, इ.
जैसे कई सारे आसान पर प्रभावी तरीके सिखाता है ।
एन.एल.पी. की व्याख्या लीडरशिप के संबंध में....
न्युरो - एक अच्छा लीडर अपने दिमाग को काबू करना जानता है । वह स्वयं के मस्तिष्क को चलाता है ।
लिंगविस्टिक - वह अपनी भाषा का इस्तेमाल लोगों को प्रभावित करने के लिए सटीक ढंग से करता है । साथ ही वह अपना संदेश पूरी ताक़त से लोगों तक पहुँचाने में माहीर होता है ।
प्रोग्रामिंग - वह एक्शन लेना जानता है । वह अपने कार्य से परिणाम लाता है ।
एन.एल.पी. यह सब काँक्रीट टूल्स् एवं टेक्निक्स् के जरिए सिखाता है, जिससे इसकी कंडीशनिंग हो सके, यह सब हमारे दिलों दिमाग पर छप सके, उस दिशा में हम एक्शन ले सके, हमारी भावनाएँ बदले और परिणामस्वरूप हमारा वर्तन भी ।

मैं हर वक्त ‘लीडरशिप डेव्हलपमेंट थ्रू एन.एल.पी. वर्कशॉप’ में आए प्रतिभागियों से कहता हूँ .....
ऊपर बताई गई सिर्फ चार बातें आपको आत्मसात करनी है और बस! आप स्वयं को एक लीडर के तौर पर सही माइने में प्रस्थापित कर सकते हैं । लीडरशिप स्किल्स् या नेतृत्व कौशल सीखना सही में बड़ा ही आसान है । मुझे आश्चर्य नहीं होगा, अगर आपको अभी तक यह एहसास हुआ होगा कि नेतृत्व कौशल सीखना कितना आसान, कितना सरल है, और साथ ही साथ कितना आनंददायक एवं सहज है । नेतृत्व कौशल सीखना आपको स्वयं पर थोपने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है, तब तक जब तक कि आपको यह अंदरूनी एहसास ना हो । एक बार नेतृत्व कौशल सीखने का एहसास जग जाए, अंतस्तल पर उसी वक्त सीखना शुरू हो जाता है । कोई भी इंन्सान, आपको तो पता ही होगा कि नेतृत्व गुणों को लेकर ही पैदा होता है । हम में वे गुण होते हैं, सिर्फ हम उन्हें भूल जाते हैं, या उनको विकसित नहीं करते । मैं आप से कहना चाहूँगा कि सही में इतनी आतुरता से नेतृत्व कौशल को सीखने की जरूरत नहीं है, इससे अच्छा आप अपने बोध को जगाए, जिससे नेतृत्व कौशल सीखना बड़ा ही सुलभ हो जाएगा । चलो, एक सवाल पूछता हूँ, क्या आपने कभी भी किसी छोटे या बड़े समूह में स्वयं को खुला छोड़ दिया है, जिससे आपके नेतृत्व गुणों को बाहर आने का मौका मिल सके? आपको तो पता ही होगा कि जैसे ही हम स्वयं को खुला छोड़ देते हैं, तब ‘लोग क्या कहेंगे?’ इस विषय में हम चिंता करना छोड़ देते हैं और यहाँ से नेतृत्व कौशल सीखने की सही माइने में शुरुआत होती है, क्योंकि हर बार जब भी आप खुल जाते हो, तब आपका मन पूरी ताक़त और सहजता से सीखना शुरू कर देता है । जब भी कभी आपका मन रिलॅक्स होता है, आप अंतर्मन के तल पर सीखना शुरू करते हो । मुझे आपको यह बताना ही होगा कि नेतृत्व कौशल सीखना ना सिर्फ आसान है, पर यह आपका जीवन रूपांतरित करने की क्षमता संजोए हुए है और मुझे आपको यह भी बताना होगा कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए इसे सीखने के सिवाय हमारे पास दुसरा कोई विकल्प भी नहीं है । मैं चाहता हूँ कि आप नेतृत्व गुणों को जल्द से जल्द सीखे, जिससे आप नेतृत्व कौशल में महारत हासिल कर सके और आपको इसकी बिल्कुल जरूरत नहीं है कि इसके लिए आप ढेर सारी किताबें पढ़े । सिर्फ थोड़ा सा अपने अंदर झाँके और आपको समझ में आएगा कि आप आज भी लीडर ही हो, क्योंकि आप कम से कम स्वयं के जीवन को दिशा दिखा ही रहे हो, चाहे वह सही हो या गलत ।
अब सवाल यह उठता है कि आपको यह कैसे पता चलेगा कि आपने नेतृत्व कौशल सीख लिये हैं? आसान है जब भी आप किसी समूह में जाएँगे छोटे या बड़े, आपको यह अंदरूनी एहसास होगा कि आप सहजता से उस समूह को प्रभावित करते हुए उसका नेतृत्व कर रहे हो । आपने सीखे हुए नेतृत्व कौशल खुदबखुद बाहर आने लगेंगे और आपको एक आत्मविश्वास का एहसास होगा ।
और बहुत सी बातें हैं, अगले ब्लॉग में मिलते हैं तब तक के लिए ‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन!’

क्या ‘फायरवॉकिंग’ से जीवन रूपांतरण होगा?
क्या ‘फायरवॉकिंग’ से जीवन रूपांतरण होगा?
‘फायरवॉकिंग’, क्या आपने यह शब्द इससे पहले सुना है? जरा दिमाग पर जोर डाले । अगर आप को एन.एल.पी. के संदर्भ में थोड़ा बहुत पता है, अगर आपको टोनी रॉबिन्स् के बारे में पता है, तो आपने फायरवॉकिंग के बारे में जरूर सुना होगा ।
अब जरा कल्पना करें, कि आपके सामने आठ से दस फीट तक जलते हुए अंगारे बिछाए हुए हैं, जिनकी गर्मी दूर खड़े रहते हुए भी आप महसूस कर सकते हैं, वे धधकते हुए लाल तप्त अंगारे देखना भी डर का एहसास खड़ा कर रहा है और उन शोलों को देखते हुए, आप मन ही मन स्वयं से सवाल पूछ रहे हो, कि क्या आप सच में यह दस फीट का अंतर धधकते हुए अंगारों पर चलकर पार कर सकेंगे? अगर कुछ गड़बड़ हुई तो? आपको यह असंभव लगने लगता है, आप के मन में संशय है, धीरे-धीरे संशय डर में तब्दील होने लगता है ।
पर फिर आपको तैयार किया जाता है, आपको अपने जीवन के सबसे ताक़तवर मन:स्थिति में लाया जाता है, आपको कैसे चलना है? इसकी सूचनाएँ दी जाती हैं, आपसे यह कहा जाता है कि आपके मन में चल रहे संवाद को अनसुना करें और आप एक ऐसी भावदशा में प्रविष्ट हो जाते हो, जहाँ पर आप पूरी तरह से आत्मविश्वास से भरे हो और आपको पूरा यकीन है, कि आप यह कर सकते हैं और फिर उन धधकते हुए अंगारों के सामने आपको खड़ा कर दिया जाता है पूरी तैयारी के साथ, तभी चारों ओर से सेंकडों लोग चिल्लाने लगते हैं, आपका हौसला बढ़ाने लगते हैं, उस कोलाहल के बीच सोचना लगभग असंभव हो जाता है । आप में अचानक ताक़त का संचार होने लगता है । लोगों के उस शोर से, उनके द्वारा आपका हौसला बढ़ाने से, आपका आत्मविश्वास दोगुना हो जाता है और पूरे जोश के साथ आप उन उत्तप्त अंगारों पर पैर रखते हुए सहजता से चलकर उस दस फिट के अंतर को पार करते हैं ।

ऐसा ही कुछ नजारा होता है, जापान के आकीबासन मंदिर के बाहर! जहाँ पर हर साल दिसंबर महिने के दूसरे रविवार को ‘फायरवॉकिंग’ के जरिए धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है । सबसे पहले मंदिर का मुख्य पुजारी धधकते हुए अंगारों की मंत्रोच्चारण के साथ पूजा करता है और फिर इसके बाद ‘फायरवॉकिंग’ रूपी पवित्र अनुष्ठान की शुरूआत होती है, जिसके साथ जोरों से मंत्रोच्चारण चलता है । भगवान का नाम लिया जाता है, लोग जोरों से प्रार्थना करते हैं और सैकड़ों लोग आग पर चलने का कारनामा आराम से कर गुजरते हैं । यह रिवाज यहाँ सालों से चला आ रहा है । स्थानीय लोगों का मानना है कि इससे उनकी जिंदगी खुशहाली आती है, आनंद की वर्षा होती है, दु:खों का नाश होता है । इसका मतलब ही यह हुआ कि ‘फायरवॉकिंग’ एक बहुत पुराना कर्तब है, जो हजारों सालों से अलग-अलग देशों में धार्मिक विधी के नाम पर किया जाता है ।
पर अब कुछ सवाल खड़े होते हैं, जैसे कि
- ‘एन.एल.पी.’ और ‘फायरवॉकिंग’ का क्या संबंध है?
- क्या ‘फायरवॉकिंग’ एन.एल.पी. का हिस्सा है?
- क्यों कुछ एन.एल.पी. ट्रेनर्स एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स का करीब आधा दिन ‘फायरवॉकिंग’ सिखाने में निकाल देते हैं?
तीसरे सवाल का जावाब जानने से पूर्व पहले दो सवालों के जवाब देता हूँ । सच कहूं तो ‘एन.एल.पी.’ और ‘फायरवॉकिंग’ में कुछ भी संबंध नहीं है । और आगे जाकर कहना हो तो ‘फायरवॉकिंग’ एवं ‘एन.एल.पी.ट्रेनिंग’ का बिल्कुल भी हिस्सा नहीं है । अब तीसरे सवाल की तरफ मुड़ते हैं, तो क्यों कुछ ट्रेनर्स एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स का करीब आधा दिन ‘फायरवॉकिंग’ सिखाने में निकाल देते हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढने से पूर्व ‘फायरवॉकिंग’ सिखाना कहाँ से शुरू हुआ, इसे थोड़ा खंगालते हैं ।
हुआ यह कि सन 1980 के दशक में एन्थनी रॉबिन्स, जॉन ग्राइंडर के संपर्क में आए जो कि एन.एल.पी. के को-फाउंडर थें । जल्द ही दोनों पार्टनर बन गए और साथ में एन.एल.पी. ट्रेनिंग सेमिनार्स लेने लगें । सन 1983 में एन्थनी रॉबिन्स ने ‘फायरवॉकिंग’ का करतब सीखा और एन.एल.पी. ट्रेनिंग सेमिनार्स में उसका प्रयोग करने लगें । इससे हुआ यह कि ‘फायरवॉकिंग’ कुछ ही दिनों में उनके सेमिनार की मार्केटिंग का एक बेहतरीन साधन बन गया । उन्होंने ‘फायरवॉकिंग’ के प्रयोग को बड़े जोरों शोरों से उछाला और कुछ ही दिनों में ‘फायरवॉकिंग’ एन्थनी रॉबिन्स के सेमिनार का यूएसपी बन गया और इस प्रकार से एन.एल.पी. और ‘फायरवॉकिंग’ का संबंध जुड़ने लगा । मार्केटिंग की यह कल्पना इतनी बढ़िया थी कि पूरी दुनिया में ट्रेनर्स ने इसके अलग-अलग संस्करण निर्मित किए जैसे कि, कांच के टुकड़ों पर चलना, जलता हुआ कॉटन खाना, जलते हुए रींग से छलांग लगाना, हाथों की चमड़ी को सुई से छेदना इ. । जैसे-जैसे इस प्रकार के प्रयोग ज्यादा संख्या में होने लगें, वैसे-वैसे उनके पीछे का मूल संदेश लुप्त होने लगा और धीरे-धीरे इस प्रकार के प्रयोग हँसी मजाक का केंद्र बनने लगें । कुछ ट्रेनर्स की सोच थी कि उन्हें ट्रेनिंग में कुछ तो अलग करना है और इसी सोच के कारण अलग-अलग प्रयोग होने लगें, जिनका एन.एल.पी. से कोई ताल्लुक नहीं था । ये तो सिर्फ छोटे मोटे जादू के प्रयोग जैसे हैं, जिन्हें आप कहीं पर भी सीख सकते हैं, पर मूल सवाल यह है कि क्या इससे जीवन रूपांतरण होगा?
शायद एन्थनी रॉबिन्स की सोच अलग थी । ‘फायरवॉकिंग’ के प्रयोग से रॉबिन्स यह सिखाना चाहते थें कि अगर आप चाहे, तो जिंदगी में भय को नियंत्रित कर सकते हैं, परिस्थितियाँ विपरीत होने के बावजूद भी आप एक्शन ले सकते हैं, आपकी ताक़त आपके भीतर है, आप स्वयं के मालिक है । इस संदेश के साथ-साथ ‘फायरवॉकिंग’ की और एक उपयोगिता थी । ‘फायरवॉकिंग’ एक ऐसा प्रयोग था, जिससे एन.एल.पी. के कुछ टॉपिक्स, जैसे स्टेट मॅनेजमेंट, एन्करींग, रिसोर्सफुलनेस इ. को बड़ी आसानी से सिखाया जा सकता था, पर अगर ‘फायरवॉकिंग’ के बाद भी जीवन में सपनों को पूरा करने की अगर आप हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, तो ‘फायरवॉकिंग’ महज एक प्रयोग बन कर रह जाता है । असल बात तो समझ में ही नहीं आती । इससे तो अच्छा यह होता कि आप दस दिनों तक लगातार सबमोडॅलिटीज् का अभ्यास करते और सबमोडॅलिटीज् में महारत हासिल करतें । (सबमोडॅलिटीज् एन.एल.पी. में एक ताक़तवर विधी है, जिसमें हम अपने मस्तिष्क में आनेवाले इमेजेस् , साउंडस् और फिलिंग को नियंत्रित करना एवं उन्हें बदलना सीखते हैं ।) और यहीं वह प्रभावशाली उपाय है, जिससे हम अपने डर को नियंत्रित कर सकते हैं । सबमोडॅलिटीज् के अभ्यास से, ‘जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपने भीतर छिपे डर को काबू करना जरूरी होता है ।’ यह केवल एक विचार न रहकर हमारा निजी अनुभव बन जाता है, जैसे-जैसे हम इस तकनीक में हम माहिर बनते जाते हैं, डर पर काबू करना हमारे लिए एक खेल बन जाता है । पर दुर्भाग्य से ‘फायरवॉकिंग’ का खेल इतना बड़ा हो जाता है कि प्रतिभागी यह भूल जाते हैं कि सिर्फ और सिर्फ सबमोडॅलिटीज् के अभ्यास से ही डर को, स्वयं के दिमाग को नियंत्रित किया जा सकता है और ‘फायरवॉकिंग’ उसका महज एक प्रतीक भर है और जैसे ही हम प्रतीको में अटक जाते हैं, जीवन की प्रगति रूक जाती है ।
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इसी लिए याद रखना, एन.एल.पी. एक कौशल है, जिसका प्रतिदिन आप को अभ्यास करना होगा, लगातार अभ्यास करने से ही महारत हासिल होगी । अगर आपको लगता है कि कोई मसीहा, कोई गुरू, कोई मास्टर आपकी जिंदगी में आएगा और एक दिन अचानक आपकी जिदंगी बदलकर रख देगा, तो आप गलती कर रहे हैं । शायद यही हमारी सुप्त इच्छा, यही मानसिकता कि विनायास जीवन परिवर्तन हो जाए, कोई और हमारे जीवन को परिवर्तित करने का काम कर दे, हमें विकसित होने के लिए तकलीफों से गुजरना ना पड़ें, सब कुछ आराम से और मुफ्त में हो जाए, हमें गैरजरूरी चीजों में अटका देती है, परिवर्तन तो नहीं होता, पर हमें ठगने का दूसरों को मौका मिलता है और अंत में हाथ कुछ भी नहीं लगता ।
आप ही जरा सोचे, कांच के टुकड़ों पर चलना, जलता हुआ कॉटन खाना, जलते हुए रिंग से छलांग लगाना, हांथों की चमडी में सुई डालना इ. से क्या हासिल होगा ? याद रखना ज्यादातर बार ‘फायरवॉकिंग’ जैसी एक्टिव्हीटीज् सिर्फ और सिर्फ मार्केटिंग के टूल के तौर पर या लोगों को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल की जाती है, इसी लिए एन.एल.पी. का कोर्स करने से पूर्व इस बात की थोड़ी चिंता करें, कि क्या सही में एन.एल.पी. सिखाया जाएगा या एन.एल.पी. के नाम पर अलग-अलग एक्टिविटीज् के जरिए आपका मनोरंजन करके आपको एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर का सर्टिफिकेट देकर घर भेज दिया जाएगा?
एक बात और, क्या आपको नहीं लगता कि हम में से कितने ही लोग ऐसे हैं, जो हर रोज़ कांच के टुकड़ों पर या जलते हुए अंगारों पर चलकर स्वयं का जीवन छलनी कर रहे हैं, चाहे वह जीवन की निराशा हो, दुःख हो, दर्द हो, या जीवन की तकलीफे हो । क्या जिंदगी के दु:खों की जलन कम है, जो धधकते हुए अंगारों पर चलने चल पड़े? संक्षेप में अगर आप प्रयास करें और वह भी हर रोज, तो ही चीजें बदलेगी । बेहतरीन एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर, अच्छी ट्रेनिंग, ट्रेनिंग से निर्मित अनुभूतियुक्त समझ, ट्रेनिंग के बाद का सपोर्ट सिर्फ और सिर्फ आपके सीखने की प्रक्रिया आसान करेंगे, पर अंत में आप ही हो जो बदलाहट ला सकते हैं, सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, जिंदगी में आगे बढ़ने का निरंतन प्रयास कर सकते हैं । इसी लिए इस बात का हमेशा स्मरण रखना, ‘आपके जीवन विकास की या जीवन रूपांतरण की सौ प्रतिशत जिम्मेदारी आप की है और आप उससे बच नहीं सकतें ।’

एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन - कहानी के पीछे की कहानी
एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन - कहानी के पीछे की कहानी
जब मैंने पहली बार ‘एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन’ गुगल किया, तो करीब 80 सेकंद में 5,00,000 से भी ज्यादा गुगल रिझल्टस् सामने आए । साथ ही साथ 5 से 7 गुगल एडस् भी दिखी । एन.एल.पी. ट्रेनिंग मुहैया कराने वाली ढेर सारी अलग-अलग वेबसाईटस् खुलने लगी । एन.एल.पी. पढ़ानेवालों का मानों ताता लग गया था । तकरीबन 50 से ज्यादा एन.एल.पी. ट्रेनिंग वेबसाइटस् को मैंने शुरू से अंत तक खंगाला । अब आगे मैं जो बतानेवाला हूँ, उसे पढ़कर आपको जरूर हैरानी होगी । आज की तारीख़ में पूरी दुनिया में 1000 से ज्यादा एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस् हैं, एन.एल.पी. इस विषय पर तकरीबन 1200 से ज्यादा किताबें लिखी गई हैं, 50 से ज्यादा लोग ऐसे हैं, कि जिन्होंने सही मायने में एन.एल.पी. के विकास में सहयोग दिया है । ये सारे लोग अपने-अपने नाम से एन.एल.पी. वर्कशॉप्स चला रहे हैं । हैरान करनेवाली बात यह है, कि हर किसी का अलग सर्टिफिकेशन, अलग सिलॅबस, अलग ड्यूरेशन और अलग फ़ीस है । इस पर कुछ सवाल खड़े होते हैं, शायद आपके भी मन में ये सवाल जरूर आए हो, जैसे कि क्या एन.एल.पी. को रेग्युलेट करनेवाली कोई संस्था नहीं है? क्या एन.एल.पी. सीखानेवाली कोई ओरीजनल संस्था नहीं है? एक एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन दूसरे से कैसे भिन्न है? कौन सा एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है? एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन ट्रेनिंग को रेग्युलेट करने वाली सर्वोच्च संस्था कौन सी है? पर इन सवालों के जवाब ढूंढने से पूर्व हमें एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन के कहानी के पीछे की कहानी को जानना जरूरी है ।
सन 1970 में रिचर्ड बॅन्डलर एवं जॉन ग्राइंडर ने एन.एल.पी. की संरचना की । शुरुआती दौर में एन.एल.पी. सायकोथेरपी के संदर्भ में इस्तेमाल होती थी और सीखनेवाले ज्यादातर साइकोलॉजी के क्षेत्र से थें । पर धीरे-धीरे एन.एल.पी. का विस्तार होने लगा, अलग-अलग क्षेत्रों में एन.एल.पी. की उपयोगिता साबित होने लगी, अलग-अलग क्षेत्रों से प्रतिभाशाली लोग जुड़ते गए, एन.एल.पी. को विकसित करने में मदद करने लगें, कारवां बनता गया और कहानी आगे बढ़ने लगी ।
अब साल था 1981 ! रिचर्ड बॅन्डलर एवं जॉन ग्राइंडर में किसी कारणवश अनबन हुई और दोनों के रास्ते अलग हुए । यह एन.एल.पी. कम्युनिटी में पहली दरार थी । सही मायने में कम्युनिटी बनने से पूर्व ही कम्युनिटी बिखर गई थी । जॉन ग्राइंडर ने स्वयं के एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्सेस् शुरू किए, जिन में रिचर्ड बॅन्डलर को कोई हिस्सा नहीं दिया गया । इस पर नाराज होकर बॅन्डलर ने ग्राइंडर के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर किया । कई सालों तक मुकदमा चला और अंतिम निर्णय बॅन्डलर के पक्ष में आया । अंत में दोनों में एक समझौता हुआ, जिसके तहत ग्राइंडर को एन.एल.पी. सेमिनार लेने का दस साल का लायसेंस दिया गया । साथ में यह भी तय हुआ कि हर सेमिनार के बाद बॅन्डलर को रॉयल्टी दी जाएगी । उस समय ऐसा लगा कि शायद सब कुछ ठीक हो गया है और आपको भी लगा होगा कि कहानी खत्म हुई, पर नहीं, कहानी ने यहाँ से अलग ही मोड़ ले लिया ।
वर्ष 1996 में फिर से एक मुकदमा दायर हुआ । बॅन्डलर ने ग्राइंडर और एन.एल.पी. से जुड़े लगभग सारे बड़े ट्रेनर्स के खिलाफ कोर्ट में फिर से एक मुकदमा दायर किया । ऐसा कहा जाता है कि लगभग 200 से ज्यादा ट्रेनर्स के खिलाफ बॅन्डलर ने मुकदमा दायर किया था । बॅन्डलर का कहना था कि ये सारे एन.एल.पी. ट्रेनर्स एन.एल.पी. के नाम पर पैसा बना रहे हैं, पर एन.एल.पी. के ओरिजिनेटर होने के नाते मुझे रॉयल्टी के नाम पर कुछ नहीं मिल रहा है और अगर एन.एल.पी. की संरचना मैंने की है, तो मुझे रॉयल्टी मिलनी ही चाहिए । शायद आप यह जानकर चौंक जायेंगे कि जो मुकदमा हुआ और जो रॉयल्टी की रकम मांगी गई वह थी 10,000,000 डॉलर । कोर्ट का निर्णय आया । कोर्ट ने कहा कि बॅन्डलर ने एन.एल.पी. लायसेन्स का गलत अर्थ लगाया है । जिस रॉयल्टी की वे मांग कर रहे हैं, वे उसके हकदार नहीं हैं और फैसला इसबार बॅन्डलर के खिलाफ गया । अब कहानी ने एक और नया मोड़ लिया ।
वर्ष 2000 में बॅन्डलर और ग्राइंडर के बीच और एक समझौता हुआ, जिसके तहत दोनों को एन.एल.पी. का को-फाउंडर और को-क्रिएटर बताने पर सहमती बनी और साथ ही साथ यह भी तय हुआ कि दोनों एक दूसरे के प्रयासों को कमतर नहीं मानेंगे । अब यहाँ से कहानी अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुकी थी । उस समझौते में यह भी तय हुआ कि एन.एल.पी. पर किसी एक की मालकीयत नहीं होगी तथा एन.एल.पी. सीखाने पर एवं लोगों को एन.एल.पी. में सर्टिफाय कराने पर कोई पाबंदी नहीं होगी । इसप्रकार से एन.एल.पी. से ट्रेडमार्क हट गया और एन.एल.पी. अलग-अलग लोगों की मालकियत से मुक्त हो गया । ऐसा लगा कि अब जाकर कहानी खत्म हुई । ऐसा होता तो अच्छा होता, पर अब यहाँ से एक नई कहानी की शुरूआत हुई ।
एन.एल.पी. से ट्रेडमार्क हटने के बाद अलग-अलग लोग एन.एल.पी. को अपने तरीके से विकसित करने लगें, एन.एल.पी. में नए मॉडल्स जोडे जाने लगें, अलग-अलग सर्टिफिकेशन्स् निर्मित होने लगें । इससे एक अच्छी बात यह हुई कि एन.एल.पी. का विकास होने लगा, अलग-अलग अच्छी चीजें जुड़ गई, जो गलत था वह पीछे छुटने लगा । अलग-अलग इंस्टीट्युटस् बनें, एन.एल.पी. बोर्डस् निर्मित हुए और दुनिया भर में एन.एल.पी. का प्रचार प्रसार होने लगा । एन.एल.पी. की मदद से लोगों के जीवन बदलने लगे, जो आदतें बदलने में जिंदगी निकल जाती थी, वे कुछ ही पलों में बदलने लगी, लोगों की जिंदगी बेहतर होने लगी । तो क्या यहाँ पर कहानी खत्म हुई? ‘नहीं’ इस एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन की कहानी ने और एक मोड लिया ।
दुनिया को मानवी मस्तिष्क की विचारप्रक्रिया के परिवर्तन के लिए एन.एल.पी. के रूप में एक बेहतरीन रास्ता मिला, पर इससे एक गड़बड़ हुई, ढेर सारी एन.एल.पी. इंस्टीट्यूटस्, एन.एल.पी. कोर्सेस्, अलग-अलग सिलॅबस्, एन.एल.पी. ट्रेनर्स की फौज बनने लगी । सर्टिफिकेट बांटे जाने लगे । एन.एल.पी. का मूल स्पिरिट खत्म होने लगा । कहीं-कहीं तो एन.एल.पी. के नाम पर कुछ और ही सिखाया जाने लगा और इसीलिए अगर आप को एन.एल.पी. में स्वयं को ट्रेन करना है, तो बेहतरीन एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट ढूंढना यह आपकी जिम्मेदारी बन गयी, पर यहाँ पर मैं आपकी थोड़ी सी मदद कर सकता हूँ, जिससे एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन की कहानी उसके समाप्ति तक पहुंचे । तो एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन करने से पूर्व नीचे दी गई कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना जरूरी है ।
1. आपको एन.एल.पी. क्यों सीखना है?
इस सवाल पर गौर करें । आपको सही में सीखना है, या सिर्फ आपके नाम के आगे एन.एल.पी. प्रॅक्टिशनर लिखना है । अगर सिर्फ सर्टिफिकेट चाहिए, तो ऑनलाइन भी मिल जाएगा, वह भी सिर्फ पाँच सौ से एक हजार रूपये में । पर अगर आपको सही में एन.एल.पी. सीखना है, स्वयं को और दूसरों को जीवन परिवर्तन में मदद करनी है, जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी के बुलंदियों को छुना है, तो एक ऐसी ट्रेनिंग करें, जहाँ पर सही मायने में एन.एल.पी. सिखाया जाता हो और उनका सर्टिफिकेट भी सन्मानित हो ।

2. क्या एन.एल.पी. बोर्ड बेहतर है या एन.एल.पी. इंस्टीट्यूट?
अगर आप किसी एन.एल.पी. बोर्ड से दिया जानेवाले ट्रेनिंग करें, तो अच्छा होगा, क्योंकि ढेर सारी एन.एल.पी. इंस्टीट्यूट किसी बोर्ड के साथ टाय अप होती हैं, जो ट्रेनिंग के बाद आपको उस बोर्ड का सर्टिफिकेट मुहैया कराती हैं । इससे अच्छा आप सीधे एन.एल.पी. बोर्ड से ही ट्रेनिंग प्राप्त करें, जिससे एन.एल.पी. ट्रेनिंग की क्वॉलिटी बरकरार रहे और आगे चलकर आप उस एन.एल.पी. बोर्ड के ट्रेनर भी बन सकें ।
3. एक ऐसा एन.एल.पी. बोर्ड ढूँढे जो आपको सीखाने में उत्सुक है, ना की सिर्फ सर्टिफिकेशन बेचने में ।
कोर्स करने से पूर्व एन.एल.पी. सर्टिफिकेशन कोर्स से जुड़ी सारी वेबसाईटस् ध्यान से चेक करें । वेबसाईट पर पढ़ने योग्य, एन.एल.पी. सीखने योग्य कितनी चीजें हैं और बेचने के लिए उपयुक्त कितनी है, इसपर थोड़ा ध्यान दें । ढेर सारी वेबसाईटस् सिर्फ एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्सेस बेचने के लिए बनी होती है, इनसे थोड़ी दूरी बनाए रखना बेहतर होगा ।
4. एन.एल.पी. सिलॅबस् पर गौर करें ।
आज की तारीख में लगभग सभी एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस् का एन.एल.पी. का सिलेबस तो कम ज्यादा एक सा ही होता है । पर एन.एल.पी. के साथ-साथ क्या कुछ नया सिखाया जा रहा है? क्या कुछ विशेष सिखाया जा रहा है? क्या कुछ बेहतर सिखाया जा रहा है? उसे थोड़ा ढूँढे, क्योंकि एन.एल.पी. के क्षेत्र में बहुत सारी नई चीजें हो रही है । दिन ब दिन साइकोलॉजी का विस्तार और विकास हो रहा है । तो क्या इन नई खोजों को आप सिलॅबस में ढूंढ पा रहे हैं?
5. क्या जिस एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट का चुनाव आप करने जा रहे हैं, वह एन.एल.पी. ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट या एन.एल.पी. ट्रेनिंग बोर्ड एन.एल.पी. रिसर्च में भी कुछ योगदान दे रहा है?
अगर ‘हाँ’ तो आपको बेहतर एन.एल.पी. ट्रेनिंग मिलने की उम्मीद बढ़ जाती है । बहुत बार कोई ट्रेनर एन.एल.पी. का कोर्स अटेंड कर आता है और सिखाना शुरू करता है, बिना उस पर गहन अध्ययन किए, इसीलिए रिसर्च में समाहीत हो, ऐसी जगह से ट्रेनिंग करना बेहतर होगा ।

6. क्या ट्रेनिंग के बाद एन.एल.पी. कौशल विकसित करने के लिए कोई मदद मिल रही है?
बहुत बार मदद के नाम पर कुछ पन्ने थमाए जाते हैं । याद रखना, एन.एल.पी. एक कौशल है, इसे सीखने में थोड़ा समय लगता है और अगर लगातार एन.एल.पी. बोर्ड से मदद मिलती रहे, तो सीखना आसान हो जाता है, नहीं तो बहुत बड़ी संभावना यह है कि आपके पास सर्टिफिकेट तो होगा, पर एन.एल.पी. में महारत नहीं होगी ।
इसी लिए इन छह बातों का ध्यान रखें और एन.एल.पी. सीखकर स्वयं के और दूसरों के जीवन को रूपांतरित करें । तो क्या कहानी का अंत हुआ? हरगीज नहीं! अभी तो एक नई कहानी शुरू होगी, जब आप एन.एल.पी. सीखना शुरू करेंगे और जीवन में सफलता की बुलंदियों को छुएंगे ।

अगर आप एन.एल.पी. सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में सीख रहे हों, तो आप आपका पैसा एवं समय दोनों बर्बाद कर रहे हों ।
अगर आप एन.एल.पी. सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में सीख रहे हों, तो आप आपका पैसा एवं समय दोनों बर्बाद कर रहे हों । - भाग २
अगर आपको इसी शृंखला का पहला भाग पढ़ना हो तो यहाँ क्लिक करें ।
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मेटा मॉडल को इजाद करने के पश्चात् एन.एल.पी. फाउंडर्स भाषा के एक और जादूगर से मिले । यह जादूगर इतना प्रभावशाली था कि आपके समझ में आए बिना आपको बदलने की ताक़त रखता था । उसका नाम था मिल्टन इरिक्सन । मिल्टन इरिक्सन को हिप्नोसिस में महारत हासिल थी । जिंदगी की बहुत सी जटील समस्याएँ जैसे चिंता, निराशा, निरूत्साह, तनाव, विस्मरण, इ. का इरिक्सन पलभर में हिप्नोसिस के इस्तेमाल से समाधान कर देता था । उसने लाखों लोगों को लम्बे अरसे से चली आई समस्याओं से निजाद दिला दी और वह भी उनके समझ में आए बिना कि बदलाहट कैसे हुई ? वह इसप्रकार से बातें करता था कि चेतन मन रूक जाता था और सूचनाएँ अवचेतन मन में स्थिर हो जाती थी । जैसे ही सूचनाएँ अवचेतन मन में स्थिर हो जाती, वैसे जिंदगी बदल जाती थी । वह सीधे हमारे अवचेतन मन से संवाद करता था, क्योंकि जिंदगी कि कोई भी बदलाहट प्रथम अवचेतन मन में होती है और अगर बदलाहट अवचेतन मन में हो तो ही बदलाहट होती है, अन्यथा वह होती ही नहीं है । वह जिस प्रकार से बातें करता था, जिससे जीवन में बदलाहट होती थी, उन लँग्वेज पॅटर्नस् को एन.एल.पी. फांउडर्स ने इकठ्ठा कर मिल्टन मॉडल बनाया, जो एन.एल.पी. की और एक महत्वपूर्ण नींव है ।

अब एक उदाहरण देखते हैं, थोड़ा ध्यान से पढ़िए ।
‘‘मुझे जरूर आश्चर्य होगा, अगर आपको अभी तक यह एहसास हुआ होगा कि जिंदगी में सही माइने में सफल होने के लिए लक्ष्य की स्थापना करना कितना जरूरी है और आपको यह अभी करने की कोई जरूरत नहीं है, जब तक कि आपके दिल में यह करने का भाव ना उठे । कोई भी इन्सान, आपको तो पता ही होगा कि आराम से उसके जीवन में लक्ष्य की स्थापना कर सकता है, जिससे उसका मन नया सीखने के लिए खुल जाता है, आनंद से भर जाता है, उत्साह से सराबोर होता है और आपको सही में इतनी आतुरता से लक्ष्य की स्थापना करने की जरूरत नहीं है, इससे अच्छा आप उस लक्ष्य प्राप्ति के बाद मिलने वाले अपार आनंद और आत्मविश्वास के बोध को जगाए । क्या आपने कभी भी किसी भी छोटे या बड़े लक्ष्य की प्राप्ति की है, बचपन में या बड़ा होने के बाद जिससे आपको उस लक्ष्य की प्राप्ति के बाद मिलने वाली कामयाबी का एहसास हुआ हो । ऐसा एहसास जो आपके दिल को छू गया हो, क्योंकि हर बार जब भी आपको लक्ष्य प्राप्ति के बाद कामयाबी का एहसास होता है, आपका मन भविष्य में और दूसरे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आतुर हो उठता है । लक्ष्य प्राप्ति की चाहत पैदा होती है ।’’
क्या आपने भाषा के इस्तेमाल पर गौर किया? अगर नहीं तो फिर से पढ़िए । यहाँ पर मैंने हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् का इस्तेमाल किया है । ये लँग्वेज पॅटर्नस् हमें अपने अवचेतन मन से जुड़ने में मदद करते हैं । ये पॅटर्नस् हमारे चेतन मन को किनारे कर देते हैं और अवचेतन मन से संवाद प्रस्थापित करने में मदद करते हैं । जैसे कि..........
- मुझे आश्चर्य होगा अगर आपको अभी तक यह एहसास हुआ होगा कि .......... आसान, सरल, सुलभ,आरामदेह, संतोषजनक, आनंददायक, सहज, इ. ।
- और.......... जरूरत नहीं है तब तक जब तक कि आपको यह अंदरूनी एहसास ..........
- और कोई भी इंन्सान, आपको तो पता ही होगा.......
- और आपको सही में इतनी आतुरता से.......... बोध को जगाएँ ।
- क्या आपने कभी भी .......... जिससे ...........?
- क्योंकि हर बार जब भी .......... आपका मन / शरीर
मैंने इन छह लँग्वेज पॅटर्नस् की मदद से उदाहरण लिखा है । इस प्रकार से लगभग एक सौ चौदह हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् हैं, जिससे हम बातों-बातों में हिप्नोसिस का इस्तेमाल कर सकते हैं और हमारा सन्देश पूरी ताक़त से दूसरों के सामने रख सकते हैं । अब थोड़ा सोचिए, इस प्रकार अगर आपने एक सौ चौदह हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् अंग्रेजी में सीख लिए और रोजमर्रा की जिंदगी में आप हिंदी इस्तेमाल कर रहे हो, तो यकिन मानिए आप कभी भी ये हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे । जैसे ही आप ये हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् अंग्रेजी के साथ-साथ आपकी रोजमर्रा की भाषा में भी सीख लेते हो, तो इन्हें इस्तेमाल करना आसान हो जाता है । इसीलिए आइ.बी.एच.एन.एल.पी. में हमारा प्रयास रहता है, कि एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर ट्रेनिंग कोर्स के प्रतिभागियों को हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओं में पढ़ाएं जाए, ताकि जरूरत के मुताबिक वे उनका इस्तेमाल कर सकें । इतना ही नहीं अनेक मुख्य प्रादेशिक भाषाओं में इनके अनुवाद भी आप को मिल जायेंगे, इससे चीजें और भी सरल हो जाएगी ।
पर दुर्भाग्य से भारत में जो एन.एल.पी. कोर्सेस कंडक्ट किये जाते हैं, वे एक तो पूरी तरह से अंग्रेजी में होते हैं, या तो पूरी तरह से हिंदी में । इससे प्रतिभागियों का बड़ा नुकसान होता है, पर जब तक उन्हें कुछ समझ में आए, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । अतः आई.बी.एच.एन.एल.पी. में हम ने बहुत सोच विचार के पश्चात् मेटा मॉडल अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी सीखना शुरू किया । यकिन मानिए, ऐसा करने वाली आई.बी.एच.एन.एल.पी. यह पहली एन.एल.पी. ट्रेनिंग संस्था है । दूसरी और भी कई महत्वपूर्ण बातें हैं, जिनके बारे में अगर आप एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स के लिए रजिस्ट्रेशन करना चाहते हैं, तो आप को पता होना ही चाहिए ।
उनके बारे में अगले ब्लॉग में बात करेंगे । तब तक के लिए ......
‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’
आप भी चाहते होंगे कि आपका व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन सफलता की नई बुलंदियों को छुएं, तो निश्चित ही आप एन.एल. पी. के जादुई और ताकदवर तकनीकों को सीखने के लिए भी बेहद उत्सुक होंगे ।

जीवन रूपांतरण के लिए पांच बेहद बुनयादी और महत्वपूर्ण सवाल
पिछले कई दिनों से मेरे दिमाग में हर समय कुछ सवाल आ रहे हैं । जब भी मैं कश्मीर में हो रही हिंसा के बारे में सोचता हूँ, तब ये सवाल मुझे घेर लेते हैं । क्यों हम भारतीय पाकिस्तानियों के प्रति गुस्से से भरे होते हैं? क्यों पाकिस्तानी हम भारतीयों के प्रति नफरत से भरे होते हैं? क्यों दोनों मुल्कों के बीच कुछ भी ठीक नहीं है? क्रिकेट में भी, ‘अगर तुम वर्ल्ड कप हार जाओ तो ठीक है, पर पाकिस्तान से मत हारना ।’ क्यों पाकिस्तान को हराना वर्ल्ड कप जीतने से ज्यादा जरूरी बन जाता है?
जब भी मैं इन सवालों के बारे में सोचता हूँ, तब मेरे जहन में कुछ जवाब आते हैं, जैसे कि पाकिस्तानी हमारे दुश्मन हैं, उनका एक ही सपना है, उन्हें हिंदुस्तान जीतना है । वे हम पर वार करें, इससे पहले हमें उन्हें हराना है । जब भी मैं इन जवाबों के बारे में सोचता हूँ, तो मुझे लगता है कि ये सिर्फ जवाब नहीं हैं, ये मेरे बिलीफस् हैं, ये मेरी धारणाएँ हैं, यह मेरी सघन श्रध्दा बन चुकी है ।
पर ये बिलीफस् या धारणाएँ होती क्या है?
आपको शायद पता होगा कि हमारी धारणाएँ हमारे दिमाग को सीधे तौर पर आदेश देती हैं । हमारी धारणाएँ हमारे वर्तन को नियंत्रित करती हैं ।
- हमारी धारणाएँ याने हमारे ऐसे विचार जिनपर हमारा पूर्ण विश्वास होता है ।
- हमारी धारणाएँ याने हमारे ऐसे विचार जो हमारे लिए परम सत्य होती हैं, या कहे कि जिन्हें हमने परम सत्य मान लिया होता हैं ।
- हमारी धारणाएँ याने हमारे ऐसे विचार या विचारों का ऐसा ढांचा, जिनकी सत्यासत्यता पर हम कभी सवाल नहीं उठाते ।
- हमारी धारणाएँ याने हमारे ऐसे दृढ़ विचार जो कभी बदले नहीं जा सकते ।
आप अगर थोड़ा गहरा सोचे, तो आप भी यह जरूर देख पाएँगे कि हमारी धारणाएँ ही हमारा जीवन चला रही हैं, नियंत्रित कर रही हैं । यह एक ऐसी नींव है, जिसपर हमारे समग्र विचारों का ढांचा खड़ा होता है । बहुत बार हमारी धारणाएँ इतनी सूक्ष्म होती हैं कि हमें सीधे तौर पर वे दिखाई भी नहीं देती । ये धारणाएँ हमारे इतने निकटतम होती हैं कि हमसे छिप जाती है । ये धारणाएँ हमारे जीवन में इतनी घुल मिल जाती है कि हम कभी उन पर प्रश्न नहीं उठा पातें । अगर हम थोड़ा गहरा सोच पाएँ, तो हमारी जिंदगी क्या है? हमारी धारणाएँ ही तो हमारी जिंदगी है ।
आपने भी महसूस किया होगा कि हमारी पूरी जिंदगी हमारे धारणाओं के इर्द-गिर्द घूमती रहती है । जिंदगी भर हम अपनी धारणाओं को सही साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं, चाहे वे नकारात्मक ही क्यों ना हो । याद रखिये, आखिरकार हमारी धारणाएँ ही हमारे जीवन की हम ने तय की हुई भविष्यवाणी बन जाती है । जैसे ही कोई हमारी धारणाओं को धक्के देता है, तो हम मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं । पूरी दुनिया में इतनी मारकाट क्यों मची है? क्योंकि शायद सभी यह साबित करने की जद्दोजहद कर रहे हैं कि उनकी ही धारणाएँ सही हैं और बाकियों की गलत ।
सकारात्मक धारणाएँ जिदगीं में आगे बढ़ने के लिए सीढ़ी साबित होती हैं, जैसे कि मुकेश अंबानी कहते हैं, “आगे बढ़ना ही जिंदगी है, यह हमारी सब से आधारभूत धारणा है और हमें हर वक्त आगे ही बढ़ना हैं ।” और यहीं धारणा रिलायंस को आगे बढ़ाती है ।
अब सवाल यह उठता है कि हमारी ये धारणाएँ निर्मित कैसे होती हैं?
हमारी धारणाएँ निर्मित होती हैं
- हमारे अतीत के अनुभवों से,
- हमारी शिक्षा से,
- जिस तरह से हमारा पालन पोषण हुआ है उससे,
- हमारे माता पिता से,
- हमारे वातावरण से ।
हम जिंदगी भर अपनी धारणाओं को संजोते हैं, या हमारे ऊपर धारणाएँ थोपी जाती हैं । बहुत बार तो हमें यह भी समझ में नहीं आता कि कुछ ऐसी नकारात्मक धारणाएँ हैं, जो हमारे जीवन का सघन हिस्सा बन चुकी हैं ।
ये धारणाएँ काम कैसे करती हैं?
कुछ दिनों पहले मैं ‘दि हिस्टरी प्रोजेक्ट’ के बारें में पढ़ रहा था । तब मुझे लगा कि अगर कोई भी विचार लोगों को बार-बार कहा जाए, समझाया जाए, तो पहले उसका विरोध होता है, बाद में संदेह जताया जाता है, और इसके बावजूद भी अगर ज़ोरशोर से प्रचार प्रसार जारी रहा, तो धीरे-धीरे वह विचार पक्की धारणा बन जाता है । बीते ६९ साल के दौरान भारत और पाकिस्तान के साथ यहीं हुआ है । आज भी दोनों मुल्कों के बच्चें जिस इतिहास को पढ़ते हैं, वह कई बार घटनाओं का एकतरफा विवरण देता है और इससे दोनों मुल्कों के लोग एक दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह से भर जाते हैं ।
उदाहरण के तौर पर .....
कश्मीर का मसला लेते हैं । भारत के इतिहास की किताबों में हमें यह पढ़ाया जाता है कि १९४७ में कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराज हरी सिंह भारत में शामिल होना चाहते थे, न कि पाकिस्तान में । इसके बाद पाकिस्तान के सशस्त्र घुसपैठियों ने कश्मीर पर हमला किया और तब हरी सिंह ने भारत में शामिल होने संबंधी समझौता करार पर हस्ताक्षर किए, जिसके बदले भारतीय सेना को कश्मीर की रक्षा के लिए भेजा गया ।
उधर पाकिस्तान की इतिहास की किताबों में इसके ठीक विपरीत पढ़ाया जाता है । पाकिस्तान की इतिहास की किताबें कहती हैं कि १९४७ में कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराज हरी सिंह जो कि धर्म से हिंदू थे और कश्मीर की बहुतांश प्रजा मुस्लिम थी । महाराज हरी सिंह ने मुसलमानों को कश्मीर से खदेड़ना शुरू किया, मुसलमानों पर जुल्म डहाने शुरू किये, मुसलमानों का कत्लेआम शुरू हुआ । महाराज हरी सिंह के जुल्मों से लड़ने के लिए कश्मीरियों ने कश्मीर से सटे पाकिस्तानी कबिलों के लड़ाकों की मदद ली और कश्मीर के एक बड़े हिस्सें को आझाद कराने में कामयाबी हासिल की । इसके बाद महाराज हरी सिंह ने मजबूरी में भारत का रूख किया ।
अब इसमें कौन सही और कौन गलत यह दूसरी बात है । मैं कोई इतिहासकार या इतिहासवेत्ता नहीं हूँ, तो मुझे भी नहीं पता कि किसका संस्करण सच है और किसका झूठ । पर समझनेवाली बात यह है कि किसप्रकार से हमारे ऊपर धारणाएँ थोपी जाती हैं । धीरे-धीरे हम इन धारणाओं के गुलाम बनते हैं, ऐसी धारणाएँ जिनको हम ने नहीं चुना हैं, जो हमें सिखायी गई हैं । अब समय आ गया है कि जब हम हमारी धारणाओं को खंगोले, उन पर जरा सोच विचार करें और सबसे महत्वपूर्ण - हम हमारी धारणाएँ जागरूक होकर चुनें ।
धारणा, धारणा होती है, वह सही या गलत कैसे हो सकती है, क्योंकि मेरी कोई एक धारणा मेरे लिए सही है, तो दूसरों के लिए शायद वही धारणा गलत भी हो सकती है । दूसरों की सही धारणाएँ जिन पर वे मर मिटने के लिए राजी हैं, मेरे लिए गलत हो सकती हैं । हमारे पास सिर्फ एक ही पैमाना है, जिस पर हम धारणाओं को चुन सकते हैं और वह है कि कौनसी धारणाएँ मेरे जीवन में सकारात्मक परिणाम निर्मित कर रही हैं और कौन सी नहीं । जो सकारात्मक काम कर रही हैं, उन्हें और सघन बनाओ तथा जो नकारात्मक धारणाएँ हैं, उन्हें मिटा दो ।
चलो थोड़ा और गहरे में उतरकर इन धारणाओं को ढूंढते हैं ।
आपकी अपने काम के प्रति क्या धारणाएँ है?
अगर हमें सच में ऐसा लगता है कि काम एक बोझ है, काम करना याने मजबूरी है, काम याने सजा है, तो शायद आप कितनी भी तनख्वाह क्यों न पाते हो, आप कभी भी आनंदित होकर पूरे मन से काम नहीं कर सकते । तो जरा सोचे - आपकी सही में अपने काम के प्रति क्या धारणाएँ हैं? उन्हें लिखिए और आप शायद चौक जाएँगे कि आपके कार्यालयीन कामकाज या व्यवसाय द्वारा आप आपके जीवन में जो भी परिणाम हासिल कर रहे हो अच्छे या बुरे, वे सीधे आपकी धारणाओं से जुड़े हैं, चाहे वे धारणाएँ सकारात्मक हो या नकारात्मक । अब थोड़ा समय निकालकर नीचे दिए सवाल पर जरूर विचार करें ।
आपकी अपने काम के प्रति क्या धारणाएँ है?
अब स्वयं से कुछ सवाल पुछें ।
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क्या मेरी ये धारणाएँ मुझे आंनद और उत्साह से काम करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं?
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क्या इन धारणाओं के बूते मैं काम करने के बाद आनंदीत महसूस करता हूँ?
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क्या ये धारणाएँ मेरी जीवन में सकारात्मक परिणाम ला सकती हैं?
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क्या ये धारणाएँ बदलना जरूरी हैं?
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अगर है तो कौनसी नई धारणाएँ मेरा वर्क लाइफ बदल सकती हैं?
शायद आपको लगेगा कि यह सब मेरे लिए नहीं है । मेरी सब धारणाएँ सकारात्मक हैं । पर थोड़ा सोचे । यह आपके ही लिए है ।
फिर मिलेंगे, तब तक के लिए ......
‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’

जब मनुष्य की आत्मा जगती है......
जब मनुष्य की आत्मा जगती है......
हेलन केलर कहती है, अगर आपके जीवन में अडव्हेंचर नहीं है, तो आपकी जिंदगी, जिंदगी ही नहीं है । मानवी रूह के बारे में एक बात सच है, कि उसे भूख होती है, कुतूहल होता है, जिज्ञासा होती है, कुछ खोजने की, कुछ आविष्कृत करने की । उसे तीव्र अभिलाषा होती है कुछ समझने की, कुछ ढुंढ़ने की, कुछ जीतने की । कभी-कभी यह तृष्णा, यह जिज्ञासा मूर्खतापूर्ण होती है, कभी-कभी जिद्दी होती है, और बहुत बार अजेय होती है ।

नाथनियल फिलब्रिक लिखित ‘इन द हर्ट ऑफ द सी’ नामक उपन्यास की शुरुआत होती है एक मालवाहक जहाज के समुद्र प्रवास के साथ । १८१९ में ‘इसेक्स’ नामक यह जंगी जहाज पॅसिफिक समुंदर में व्हेल मछलियों को पकड़कर उनका तेल निकालने के उद्देश्य से चल पड़ा । उन दिनों व्हेल मछलियों को मारकर उनके शरीर से तेल निकालकर उसे अलग-अलग चीजों में इस्तेमाल किया जाता था । व्हेल मछलियों के शरीर से निकाला वह तेल बहुत ही मूल्यवान और किमती था । अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उसकी बहुत मांग हुआ करती थी ।
बारिश का मौसम था । समुंदर में तेज हवाएँ बह रही थी । उस अथांग समुंदर की ऊँची-ऊँची लहरों को चीरते हुए जहाज आगे बढ़ रहा था । धीरे-धीरे मौसम बद से बदतर होने लगा । जहाज में सवार मछुआरे डटे थे, किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए । एक दिन शाम के समय जोरदार बारिश शुरू हुई । जोरों से हवा बहने लगी । मछुआरे समझ गये कि यहाँ समुंदर में भीषण तुफान आने वाला है । लहरें इतनी तेज और ऊँची थी, कि जहाज में पानी भरने लगा । चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था । कप्तान और उसके साथी मछुआरों ने जहाज को बचाने के लिए पुरजोर कोशिश की । अचानक एक विशालकाय तेज लहर जहाज से आ टकराई । जहाज बूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया । पर फिर भी कप्तान ने हार नहीं मानी । अनेक असफल प्रयासों के पश्चात् जैसे-तैसे वह जहाज को दूसरी ओर मोड़कर उन ऊँची लहरों से बचा पाने में सफल हुआ । धीरे-धीरे तुफान थमने लगा । जहाज का एक हिस्सा टूट चुका था । जहाज की मरम्मत होने के बाद उन्होंने आगे बढ़ने का फैसला लिया ।
समुद्र प्रवास पर निकले उन्हें लगभग तीन महीने हो चुके थे, लेकिन एक भी व्हेल नहीं दिखाई दी थी । उन्होंने अपना धैर्य समाप्त होने लगा था । तभी एक दूसरे जहाज के कप्तान ने उसका समुद्री नक्शा उन्हें थमाते हुए कहा, कि वहाँ से करीब दो हजार मील दूर समुंदर के बीचोबीच उन्हें बहुत बड़ी सफेद व्हेल मछलियाँ मिल सकती हैं, पर अगर वे चौकन्ने नहीं रहे, तो व्हेल मछलियाँ उन पर हमला बोल देगी । ऐसा कहकर वह चिन्हांकित नक्शा इस जहाज के कप्तान को सौंप देता है । अब इसेक्स नामक इस जहाज के कप्तान के पास दो रास्ते थें, एक वापस लौटने का, क्योंकि पहले ही तीन महीनों से वे इस समुंदर में खाक छान रहे थे, या दो हजार मील दूर प्रवास कर समुंदर के बीचोबीच जाकर, व्हेल मछलियों को मारकर उनका तेल निकाल लाने का । कप्तान ने आगे बढ़ने का फैसला लिया । यह एक बड़ा ही दु:साहस था । कुछ महीनों के अथक प्रयासों बाद वे समुंदर के बीचोंबीच उस जगह पहुँच गये, जो कि दूसरे जहाज के कप्तान ने बतायी थी ।
उन्हें समुद्र के पानी में कुछ हलचल नजर आई । शांत समुंदर में अचानक लहरे तेज होने लगी । जहाज हिलने लगा । तभी उन्हें जहाज के नीचे समुंदर में कुछ दिखाई दिया, पर पलभर में वह नजरों से ओझल हो गया । समुंदर के बीचोंबीच उन्हें ड़र का अहसास होने लगा । सभी मछुआरे अपने-अपने हथियारों को संभाल कर खड़े हो गये । तभी फिर से जहाज को एक और धक्का लगा । हर कोई चौकन्ना था, चेहरों पर तनाव था और दिलों में अतार्किक डर महसूस हो रहा था । तभी जहाज से सिर्फ बीस फुट की दूरी पर उन्हें एक विशालकाय सफेद व्हेल दिखाई दिया, शायद ही किसीने सपने में भी इतने बड़े व्हेल की कल्पना की होगी । कुछ समझने के पूर्व ही उस व्हेल मछली ने इसेक्स जहाज पर हमला बोल दिया, उसका हमला इतना तेज, ताक़तवर एवं विनाशकारी था, कि कुछ पलो में ही जहाज तहस नहस हो गया । जहाज डूबने लगा । हर कोई अपनी जान बचाने के लिए समुंदर में कूद पड़ा । उस डूबते जहाज से कुछ छोटी-छोटी नौकाएँ एवं खाने का कुछ सामान निकालने में कप्तान तथा कुछ साथी मछुआरे सफल गये ।
यहाँ से उनके बूरे दिनों की शुरुआत होती हैं । अगले कुछ महीनें वे उन छोटी नौकाओं में जीवन गुजारने के लिए मजबूर होते हैं । बिना खाना और पानी के वे तड़पने लगते हैं । उनके शरीर सूख जाते है, उनमें घाँव बनने लगते हैं, वहाँ पर खून जम जाता है । एक दिन उनका एक साथी तड़पने लगता है, उसे पानी चाहिए, लेकिन विडंबना देखिए, उस पानी भरे विशाल समुंदर में पीने लायक पानी नहीं । आखिरकार तड़पते हुए वह मछुआरा मर जाता है । मरने के बाद उसके साथी उसका माँस निकालकर खाने के लिए मजबूर हो जाते हैं । अन्ततः कुछ दिनों बाद, संयोगवशात् दूसरे समुद्री जहाज को ये छोटी नौकाएँ दिखाई देती हैं और इसप्रकार जो बचे रहें, डटे रहे, स्वयं को जिंदा रख पाए, उन्हें बचा लिया जाता है ।
सचमुच कभी-कभी यह अडव्हेंचर, यह जिज्ञासा, यह कुतूहल, यह खोज, मूर्खतापूर्ण होती है, कभी-कभी जिद्दी होती है, कभी-कभी जानलेवा होती है और बहुत बार अजेय होती है । यह पूरी कहानी हमें याद दिलाती है, हमारे अतीत की । जब हर दिन अडव्हेंचर था, हर दिन एक नई खोज थी । जरूर जिंदगी बहुत कठिन थी, जोखीम भरी थी, पर फिर भी यह अडव्हेंचर हमें हर दिन याद दिलाता था, कि हम ‘जिंदा’ है । धीरे-धीरे हम आधुनिक होते गए, जिंदगी के मायने बदलते गए । जिंदगी से अडव्हेंचर खत्म होते गया । जिंदगी बहुत सुरक्षित होती गई और इसी के साथ हम ‘जिंदा’ हैं, यह भाव भी खोता गया । हम भूल गए, कि हम मनुष्य हैं और हम रोबोट बन गए । यांत्रिक हो गए । हम भूल गए, कि हम सबके भीतर एक सुप्त इच्छा होती है कुछ खोजने की । कुतुहल होता है जानने का, जिद होती है जीतने की । हम भूल गए, कि मूलतः हम एक खोजी हैं ।
कभी कभार बॉलीवुड की ‘गुरू’ फिल्म का नायक गुरूकांत देसाई हमें फिरसे उस अडव्हेंचर की याद दिलाता है । फिल्म के आखिर में उसका अभिवादन करने पहुँचे कंपनी के सेकड़ों शेयरहोल्डर्स से कहता है, “सपने मत देखो, सपने कभी सच नहीं होते, ऐसा मेरा बापू कहता था । लेकिन मैंने सपना देखा, हमने सपना देखा, हिंदुस्तान की सबसे बड़ी कंपनी बनने का सपना ।” और फिर वह सामने बैठे सभी शेयरहोल्डर्स से पूछता है, “तो क्या अपना यह सपना पूरा हुआ?” और वे हजारों लोग चिल्लाते, तालियाँ बजाते, नाचते हुए कहते हैं, “हाँ ।” और फिर गुरू पूछता है, “तो अब क्या करे, रूक जाएँ? या फिर देखे और एक सपना? .....बनना चाहते हो दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी?” और फिरसे लोग चिल्लाते, तालियाँ बजाते, नाचते हुए कहते हैं, “ हाँ ” और आखिरकार गुरू कहता है, “तो फिर बता दो दुनिया को, कि हम आ रहे हैं ।”
चलो दोस्तों, आज एक बार फिर कोई बड़ा सपना देखते हैं, अडव्हेंचर पर निकलते हैं, फिर से कुतूहल के भाव को जगाते हैं जो कि हमारा मूल स्वाभाव है, फिर से कुछ खोजते हैं । एक नई दिशा में चलते हैं, एक नई सुबह देखते हैं, फिर से प्यार भरा कोई नगमा गाते हैं । भूलना मत, कि मूलतः हम एक खोजी है । हम मनुष्य हैं, रोबोट नहीं । अडव्हेंचर हमारे खून में है । याद रखना ‘हम जिंदा है’ ।
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वह क्या है जो हमें पीछे खींच रहा है?
वह क्या है जो हमें पीछे खींच रहा है?
‘‘जिंदगी में एक दुश्चक्र खड़ा होता है, हम रूक जाते हैं, थक जाते हैं, धीरे-धीरे टूटने लगते हैं, और आखिरकार हम हार मान लेते हैं । पर यह होता कैसे है? वह क्या है जो हमें पीछे खींचता है?’’
एक दिन शाम के समय शहर के पास वाली एक पहाड़ी मैं पर टहलने गया था । बारिश का मौसम था । कुछ ही देर पहले बारिश रुकी थी । सूर्यास्त होने के करीब था । पंछी अपने घरोंदों में वापस लौट रहे थें । हवा का बहना मानों लगभग थम चुका था । पहाड़ से निकलते अनेक छोटे-छोटे झरने पहाडी से अपना रास्ता बनाते हुए अपनी मस्ती में नीचे की ओर दौड़ रहे थे । चारों ओर एक शांती छायी थी । उन झरनों को देखते हुए मुझे एक गाने की कुछ पंक्तियाँ याद आने लगी । वे पंक्तियाँ कुछ ऐसी थी...
‘‘ओ दरिया मुझे नहीं जाना उस पार, आया रांझा मेरा, आया रांझा मेरा
ओ दरिया जरा रोकन दो मझधार, आया रांझा मेरा, आया रांझा मेरा ।’’
कवि इन पंक्तियों में कहता है कि वह सालों से एक ही सपना दिल में समेटे हुए है । जब से उसने होश संभाला है, सिर्फ वही सपना वह अपने दिमाग में संजोए हुए है और वह सपना है, किसी भी हालत में जल्द से जल्द दरिया के उस पार जाना । दरिया के उस पार एक दुनिया है, जिसकी बहुत बातें उसने सुन रखी है । जहाँ के बहुत से अनूठे किस्से सुने हैं, कई अफसाने सुने हैं और जब से यह सब सुना है, तब से दिल में बार-बार एक तरंग उठती है, उस पार की दुनिया देखने की । उसने सुना है कि दरिया के उस पार की दुनिया इस दुनिया से अलग है, वह दुनिया ज्यादा समृध्द है । वहाँ पर शांती है । वहाँ पर आनंद है । वहाँ पर खुशी है । इस दुनिया जैसी दौड़धूप वहाँ नहीं है । न ही निराशा है, न ही उदासी है और न ही कोई तनाव ! उस दुनिया में जाना है । इसी एक सपने को संजोए हुए वह सालों से उस पार जाने की तैयारी कर रहा है । आज तैयारी पूरी हो गयी है । अब उस पार निकलना ही था, कि इस पार उससे मिलने उसकी प्रेमिका आती है, जिससे उसे गहरा लगाव है, जिसके साथ गहन प्रेम है, जिससे एक पुराना रिश्ता है । अब मन में उलझन खड़ी होती है । अब मन में एक द्विधा मन:स्थिति में घिर जाता है । एक मन कह रहा है, चलो अब तो निकलने का समय हो गया है और एक मन कह रहा है, ‘‘जरा रूको, यह पल फिर से नहीं आनेवाला है ।’’ अब दोनों में से एक का चुनाव करना है, मन में सम्भ्रम खड़ा होता है, और आखिकार उसे यह कहना पड़ता है...
‘‘ओ दरिया मुझे नहीं जाना उस पार, आया रांझा मेरा, आया रांझा मेरा
ओ दरिया जरा रोकन दो मझधार, आया रांझा मेरा, आया रांझा मेरा ।’’

मन में गहन प्रेम था, आस्था थी, लगाव था, इसलिए रूक गए । उस पार नहीं जाने का फैसला लिया । जिस सपने के लिए सालों से तैय्यारी की थी, उसे किनारे रख दिया । चलो कोई बात नहीं, जो हुआ वह अच्छा हुआ ।
पर क्या आपको नहीं लगता कि असल जिंदगी में भी बहुत बार छोटी-छोटी चीजें हमें अपने सपनों की तरफ बढ़ने से रोक लेती हैं? हमारी ‘उस पार’ जाने की शक्ति को छीन लिया जाता है? हमारी असीम शक्तिशाली आत्मा को कैसे कैद किया जाता है? जिंदगी में एक दुश्चक्र खडा होता है । हम रूक जाते हैं । थक जाते हैं । धीरे-धीरे टूटने लगते हैं और आखिरकार हार मान लेते हैं । वह क्या है, जो हमें पीछे खींचता है? वह क्या है, जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है? वह क्या है, जिसकी बेड़ियाँ बन जाती है?
हम उसे ‘डिसएमपॉवरींग थॉट पॅटर्न’ याने ‘असहाय महसूस करानेवाले विचारों का ढांचा’ कहते हैं । इन थॉट पॅटर्नस् का एक ऐसा जाल खड़ा होता है, जिसमें हम उलझते जाते हैं, बहुत बार हमें यह भी समझ में नहीं आता कि हम उस दुश्चक्र में घिर चूके हैं । हर दिन अनजाने ही उन ‘असहाय महसूस करानेवाले विचारों’ को दोहराने की वजह से वे इतने ताक़तवर बनते हैं, कि हमारी जिदंगी पर राज करने लगते हैं ।
मैं एक क्लाइंट के साथ काम कर रहा था । उनकी आयु लगभग पैंतालिस साल के करीब होगी । वह एक बड़ी एमएनसी में एच.आर.मॅनेजर थे । जिंदगी में सब कुछ था, पर फिर भी एक उदासीनता थी । एक खालीपन था । एक निराशा थी । सब कुछ था, पर फिर भी कुछ भी नहीं था । जिंदगी यंत्रवत हो चुकी थी । जिंदगी से चुनौतियाँ खत्म हो चुकी थी और इसके परिणाम स्वरूप जीवन से उत्साह खत्म हो गया था । ऐसा लगता था मानों जिंदगी खत्म होने का इंतजार कर रहा हो । बातों-बातों में मैंने उनसे पूछा, ‘‘क्या आपको इसीप्रकार से जीना है, या जीवन की दिशा और दशा बदलनी है?’’ उन्होंने कहा, ‘‘बेशक, मुझे यह बदलना है । यहीं नहीं, मैं पिछले 15 सालों से सोच रहा हूँ । मेरा एक सपना है । मुझे अपना एक होटल शुरू करना है । सालों से मैं सोच रहा हूँ, पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ ।’’

दोस्तों! क्या आपको नहीं लगता, कि हम में से कई सारे लोग इसी प्रकार से जिंदगी में एक जगह पर आकर अटक जाते हैं । ना आगे बढ़ पाते हैं, ना पीछे लौट पाते हैं । जिंदगी रूक जाती है । जिंदगी की वह सीडी बारबार वहीं गाना प्ले करने लगती है । तीन बाते हैं, जो मूलतः हमें पीछे खींचती हैं, जिससे जीवन में एक दुश्चक्र खडा होता है...
चलो ! थोड़ा अंदर झाँकते हैं । हमारे ‘डिसएमपॉवरींग थॉट पॅर्टनस्’ को ढूंढ़ते हैं । हमारी आदतों के बारे में सोचते हैं और हमारी नकारात्मक भावनाओं के प्रति थोड़ा सचेत होते हैं । इसके लिए कुछ सवालों के जवाब हमें ढूंढ़ने पडेंगे और ये सवाल हैं...
अगर आप इन सवालों को किसी विशेष सपने को ध्यान में रखकर पूछेंगे, तो हमें ज्यादा सटीक उत्तर मिलेंगे ।
जैसे कि किसी को कोई कम्पेटिटिव्ह एक्झाम में टॉप करना है । तो कम्पेटिटिव्ह एक्झाम को ध्यान में रखकर उपर दिए हुए तीन सवाल पूछिए । जैसे ही आपको जवाब मिलने लगेंगे, आपको समझ में आने लगेगा, कि आपको एक्झॅक्टली क्या बदलाव लाने होंगे, जिससे आपका सपना पूरा हो सके ।
याद रखना । उपर बातायी हुई तीन बातों को बदलना बहुत आसान है । इतना आसान की चुटकी बजाई और बदलाहट हो गई । पर कुछ भी बदलने से पूर्व क्या बदलना है ? इस पर थोड़ा काम करते हैं । उपर पूछे सवालों के जवाब लिखते हैं, तो चलो !
सोचना शुरू करो और लिखना भी ।
मिलते हैं अगले ब्लॉग में .....।
तब तक के लिए ‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’

क्या आपको सही में एक सुनहरे भविष्य का निर्माण करना है?
‘ऑपरेशन डाउनफॉल’ नाटो का एक स्पेशल मिलिटरी मिशन! जिसकी कामयाबी पूरी दुनिया के लिए बेहद जरूरी है और इस ऑपरेशन डाउनफॉल पर २०१४ में एक हॉलीवुड मूव्ही ‘एज ऑफ टुमारो’ रिलीज हुई थी । जिसकी काफी चर्चा हुई तथा फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भी काफी हिट रही । फिल्म जब शुरू होती है, तब हमें अलग-अलग न्यूज चॅनल्स् के माध्यम से यह पता चलता है, कि दुनिया भर में तबाही फैल चुकी है । भीषण हमले हो रहे हैं । लोग अपने घरों को छोड़कर भाग रहे हैं । भगदड़ मची है । शहर तबाह हो रहे हैं । लोग मारे जा रहे हैं और इसका कारण है एलियंस । जिन्होंने पृथ्वी पर हमला किया है और इससे पूरी कायनात खतरे में है, वैसे ही जैसे बहुत सारी हॉलीवुड मुव्हीज में बार-बार दिखाया जाता है । इन एलियंस से लड़ने के लिए नाटो ने एक अलग कमांडोज् की फौज खड़ी की है, जिसे प्रारंभिक सफलता मिल रही है । कुछ जगहों पर एलियंस को हराया भी गया है और यहाँ पर एन्ट्री होती है मेजर केज की । जिसे मैदाने जंग का कोई भी अनुभव नहीं है । वह जंग से डरता है और उसे भी यह महसूस होता है, कि वह कहीं से भी एक सिपाही नहीं है । फिर भी उसे फ्रान्स लड़ने भेज दिया जाता है । जब वह नींद से जगता है, तब वह अपने आप को एक सैन्य बेस पर पाता है । जहाँ उसे लड़ाई पर जाने के लिए मजबूर किया जाता है । धीरे-धीरे उस पर उसका डर हावी होने लगता है । वह बहाने बनाता है, ताकि उसे लड़ने ना जाना पड़े । वह भागने की हर कोशिश करता है, पर कामयाबी नहीं मिलती । आखिरकार सिर्फ एक ही रास्ता बचता है, और वह है जंग लडना । इस प्रकार से वह मैदाने जंग में पहुँच जाता है । जहाँ पर मारकाट मची हुई है । एलिंयस की तरफ से जोरदार हमले हो रहे हैं, उसके आसपास के सैनिक मारे जा रहे हैं । खून की नदियाँ बह रही हैं । उसके इर्दगिर्द सिर्फ और सिर्फ मौत तांडव मचा है । आखिरकार जब कोई रास्ता नहीं बचता, तो वह लड़ने के लिए तैयार हो जाता है । तभी एक जोरदार हमला होता है । वह पूरी ताक़त के साथ उसका मुकाबला करने लगता है । पर अफसोस! कुछ ही पलो में वह उस मैदाने जंग में मारा जाता है ।
जैसे ही वह मारा जाता है, वह पुन: एकबार नींद से जगता है और अपने आप को फिर से फ्रान्स के उसी सैन्य बेस पर पाता है और सब घटनाएँ दुबारा से उसी क्रम से घटने लगती हैं । उसे फिर से लड़ने भेज दिया जाता है । वहीं घटता है, जो पहले घटा था और इसबार भी वह फिर से वह मारा जाता है । जैसे ही वह मारा जाता है, वह फिर नींद से जगता है और फिर से वहीं घटने लगता है, जो पहली दो बार घटा है । धीरे-धीरे उसे समझ में आने लगता है कि भविष्य में क्या होने वाला है और हर बार वह अपनी जिस गलती से मारा गया था, उसे अगली बार सुधार लेता है । हर बार मरने से पहले वह बेहतर होता जाता है और हर बार जागने के बाद स्वयं को बेहतर बनाने में जुट जाता है । इसमें एक प्रशिक्षक उसे बेहतर बनने में मदद करती है । हर बार जागने के बाद वह अपनी भूलें सुधार लेता है । हर बार जागने के बाद वह अपनी जो स्ट्रॅटेजिज् फेल हुई हैं, उनकी जगह पर नई स्ट्रॅटेजिज् बनाता है । हर बार जागने के बाद वह अपनी हार को जीत में परिवर्तित करने के लिए ताक़त झौंक देता है । इस से वह स्वयं को बदलता है और परिणामों को भी बदल पाता है ।

क्या आपको भी नहीं लगता कि हमारे अंदर भी केज की तरह हर दिन को दोबारा शुरू करने की शक्ति है । भविष्य को सही मायने में बदलने के लिए हमें अपना हर दिन बदलना पड़ेगा । हर रोज हमारी कमजोरियों को मरना होगा, तभी नए दिन की शुरूआत हो पाएगी । हमें प्रतिदिन स्वयं को तैय्यार करना पड़ेगा । हमें प्रतिदिन आगे बढ़ना पड़ेगा । हमें प्रतिदिन कम से कम एक कदम उठाना पड़ेगा । जरा सोचिए, केज यह लड़ाई क्यों जीत सका ? किस प्रकार से वह एक भगौड़े से एक बहादूर बना ? उसके जिंदगी में डर की जगह साहस ने कैसे ली ? दो चीजें थी...
क्या आप जानते हैं कि जिंदगी में सबसे बड़ी दिक्कत क्या है ? रोज की इस उठापटक में हम भूल जाते हैं, कि कुछ बड़ा किया जा सकता है । जिंदगी के रोजमर्रा के कामों में हम इतने उलझ जाते हैं कि हमें याद भी नहीं रहता, कि जिंदगी इन रोजमर्रा के कामों से बड़ी है । हम छोटी-छोटी चीजों में उलझ जाते हैं । हम छोटी-छोटी चीजों में माहीर हो जाते हैं और महत्वपूर्ण चीजों को भूलने लगते हैं । यह उलझाव इतना जटिल हो जाता है, कि हमें यह भी दिखाई नहीं पडता कि जिंदगी यांत्रिक हो चुकी है, सुबह से रात तक हम एक ही पॅटर्न में जीने लगते हैं । सालों से उस पॅटर्न में जीने के बाद हम लगभग सपने देखना बंद कर देते हैं, नयी सोच हमें अखरने लगती है, कुछ अलग करने की ताक़त हम खो देते हैं ।
क्या इस चक्रव्यूह को तोड़ा जा सकता है ? इस सवाल के जवाब में, मैं आपसे दो और सवाल पूछता हूँ .....
1. क्या आपको आपका भविष्य दिखता है? क्या आपके पास कोई सुनहरे भविष्य की कल्पना है ? क्या आपके पास ऐसा कोई सपना है, जो आपके जिंदगी से बड़ा हो ?
2. क्या आप हर दिन आपके उस सुनहरे भविष्य के निर्माण के लिए स्वयं को तैयार कर रहे हैं?
इन दोनों सवालों पर थोड़ा सोच विचार करना । सिर्फ पढ़कर छोड़ मत देना ।

इस सुनहरे भविष्य के निर्माण में एन.एल.पी. ट्रेनिंग में हम कुछ जादूई और ताक़तवर टूल्स् सीखते हैं । हमारे ‘सुनहरे भविष्य का निर्माण’ सबसे पहले होता कहाँ है ? ‘हमारे दिमाग में ।’ और एन.एल.पी. ट्रेनिंग की तो शुरूआत ही होती है, दिमागी प्रक्रियाओं को समझने से ।
- जिन लोंगो ने इस धरातल पर सुनहरे भविष्य का निर्माण किया, उन्होंने वह कैसे किया ?
- उनके दिमाग में क्या घटा था ?
- उन्होंने स्वयं को किस प्रकार से कंडिशन किया ?
- उन्होंने उस सुनहरे भविष्य निर्माण के लिए स्वयं को किस प्रकार से प्रोग्राम्ड किया?
- हर दिन उन्होंने किस प्रकार से एक्शन ली ?
- उनका हर कदम उसी दिशा में किस प्रकार से उठा ?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, ‘‘क्या मैं भी यह करना सीख सकता हूँ ?” एन.एल.पी. इसके कुछ जादूई और ताक़तवर जवाब हमें देता है, जिससे हम अपने उस सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सके, जिसकी कभी हम ने कल्पना की थी ।
चलो फिर अगले ब्लॉग में मिलते हैं । तब तक के लिए ‘एन्जॉय युवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन ।’

सिर्फ एक हुनर जो आपकी जिंदगी बदल कर रख देगा.....
सिर्फ एक हुनर जो आपकी जिंदगी बदल कर रख देगा.....
क्या आपको आपके जिंदगी का एक ऐसा दिन याद है, जब आप दुःख से तड़प रहे थें ? चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक? एक ऐसा दिन जब दर्द आपके बर्दाश्त के बाहर चला गया हो? लाख कोशिशों के बाद भी उस पीड़ा का अंत ना हुआ हो ? एक ऐसा दिन, जब आपने गहन निराशा का अनुभव किया हो, एक ऐसा दिन जब आप थक चुके थे, टुट चुके थे, जिंदगी से उब चुके थे ? क्या आप याद कर पा रहे हैं, उस समय आपके दिमाग में क्या हो रहा था ? क्या इमेजेस आपके दिमाग में दौड़ रही थीं ? आपको आपके शरीर में क्या महसूस हो रहा था ? उस दर्द का एहसास कैसा था ? आपके साथ क्या हो रहा था ? कौनसी भावनाओं को आप महसूस कर रह थें ?
क्या इस दुःख या दर्द की अवस्था में रहकर हम जीवन में उमदा प्रदर्शन कर सकते हैं ? आप कहेंगे, हरगिज नहीं । पर क्या आपको पता है, आपने जो दुःख, दर्द महसूस किया होगा, उससे सौ गुना ज्यादा दर्द महसूस करने के बाद भी कोई ऑलिम्पिक में गोल्ड मैडल जीत सकता है ? आप कहेंगे, यह कैसे संभव हैं?
जिंदगी भर व्हिलचेअर पर बैठकर इस एथलीट ने खेलों की दुनिया में नए कीर्तिमान स्थापित किए । मारीके वेवोर्त आज हमारे बीच नहीं है । उसने लंदन पैरालिम्पिक में 200 मीटर की रेस में सिल्वर और 100 मीटर की रेस में गोल्ड मेडल जीता है । व्हीलचेअर पर जब वह दौड़ लगाती थी, तब उसकी फुर्ती देखने लायक होती थी । उसका आत्मविश्वास, उसका ज़ज्बा, उसकी ऊर्जा, उसकी जीत की भूख, उसे औरों से अलग खड़ा करती थी । शायद शारीरिकरूप से वह उस व्हिलचेअर पर सीमित थी, पर मानसिकरूप वह प्रचंड शक्तिशाली थी ।
दर्द क्या होता है? यह शायद मारीके वेवोर्त से अच्छा किसी को पता नहीं होगा । जब आप उसकी पीड़ा को देखेंगे, तब शायद आपको आपके दर्द पर हंसी आएगी । आप शायद आपके दुःख को, दर्द को, दुःख दर्द कहने से भी कतराने लगोगे । शायद मारीके वेवोर्त का दर्द आपके दुःख की परिभाषा बदल देगा ।
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मारीके वेवोर्त को इच्छा मरण लेना था । यह उसकी आखरी ख्वाहिश थी । पर मरने से पहले उसे अपनी और एक इच्छा पूरी करनी थी । उसे रियो पैरालिम्पिक में गोल्ड मेडल जितना था । उस वक्त यह चैम्पियन गहरे दर्द से गुजर रही थी । शारीरिक पीडा इतनी सघन हो चुकी थी, कि रातों को वह ठीक सो भी नहीं पाती । रात-रात भर दर्द से करहाती हुई सुबह होने का इंतजार करती थी । इस चैम्पियन को स्पाइन की एक ऐसी बीमारी हुई थी, जिसका कोई भी इलाज नहीं हो सकता था । स्पाइन की यह लाईलाज बीमारी लाखों में से किसी एक को होती है और इससे उस पीड़ित व्यक्ति को भयंकर दर्द होता है । वह इस दर्द से तड़पती थी । उसने एक इंटरव्यू में कहा है, “रियो के बाद मेरा करियर खत्म हो जाएगा । मैंने इच्छामरण के बारे में सोचना शुरू कर दिया है । मुझे रोज बेहद दर्द से गुजरना पड़ता है । मैं रातों को ठीक से सो भी नहीं पाती हूँ । किसी-किसी रात तो मैं सिर्फ 10 मिनट ही सो पाती हूँ । इस सबके बावजूद मुझे ट्रेनिंग भी लेनी होती है । भले ही मैं अपनी बीमारी से लड़ रही हूँ , लेकिन मैं हार्ड प्रैक्टिस करती हूँ । उम्मीद है, कि मैं रियो में पोडियम पर गोल्ड मेडल के साथ अपना करियर खत्म करूँगी । मैं चाहती हूँ , सब लोग हाथों में शेम्पैन का गिलास लेकर मुझे याद करें । मैं बेहद दर्द से गुजर रही हूँ , लेकिन फिर भी मैं रियो में गोल्ड जीतना चाहती हूँ ।’’
अब सवाल यह है, कि इतने दर्द के बावजूद मारीके वेवोर्त किस प्रकार से इतनी कठिन प्रैक्टिस कर पाती थी ? हर दिन सुबह वह इस दर्द को कैसे हरा पाती थी ?....जरूर वह अपने दिमाग में कुछ ऐसा कर रही थी, जो हमें पता नहीं है, या हमें उसका अभ्यास नहीं है । वह बहुत ही कुशलता से स्वयं के दिमाग में अपना फोकस शिफ्ट कर पा रही थी । वह अपना फोकस दर्द से हटाकर प्रैक्टिस पर ला रही थी । वह उसका फोकस दुःख से हटाकर उसके सपने पर ला रही थी । वह अपना फोकस असंभव से संभव पर ला रही थी । यह करने में वह इतनी कुशल हो चुकी थी, कि रात को दर्द से तड़पने के बाद भी सुबह पूरी ऊर्जा से प्रैक्टिस शुरू करती थी ।
उसी इंटरव्यू में आगे वह कहती है, ‘‘मैं रियो में मेडल जीतना चाहती हूँ, लेकिन यह बहुत मुश्किल होगा, क्योंकि मुकाबला बेहद कड़ा है । मैं हर लम्हें को जीना चाहती हूँ । जब मैं कुर्सी पर बैठती हूँ, तो मेरी नजरों के सामने से हर चीज गायब हो जाती है । मैं नेगेटिव सोच को दूर रखती हूँ । मैं डर, दुःख और तकलीफ को अपने करीब नहीं आने देती । मैंने ऐसे ही पिछले ऑलिम्पिक में मेडल जीते हैं और इस ऑलिम्पिक में भी मैं ही जीतूंगी ।’’

नवीनतम खोजे बता रही हैं कि फोकस हमारे मसल जैसे काम करता है । अगर हम ने उसका उपयोग नहीं किया, तो वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है, जैसे ही हम उसका उपयोग करने लगते हैं, वैसे-वैसे फोकस करने की हमारी क्षमता बढ़ने लगती है । आधुनिक युग में मोबाइल के बढ़ते गलत इस्तेमाल से सामान्य व्यक्ति का ध्यान अवधि (अटेंशन स्पॅन) चेतावनी स्तर से भी काफी नीचे गिर चुका है, यह सभी मनोवैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय हैं । अगर हमें जिंदगी में बेहतरीन परिणाम अर्जित करने हैं और साथ में आनंद से जीना है, तो हमें अपने जीवन में सोच की एक ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी, जहाँ पर हमारा फोकस हमेशा बेहतरीन परिणामों पर हो, ऐसे परिणाम या रिझल्ट, जो हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण हैं । जब हम लगातार अडिगता से अपने परिणामों पर फोकस करते हैं, तब तुरन्त ही हमारा वर्तन और सोच दोनों बदल जाते हैं । जीवन में जहाँ पर भी हमारा फोकस होता है, उसी का हम अनुभव करते हैं और मन के गहन तल पर उसे ही जीने लगते हैं । हम जिन समस्याओं पर फोकस करते हैं, वे समस्याएँ बढ़ती जाएँगी, समस्याओं पर का आपका फोकस आपको असहाय महसूस कराएगा । जिससे आपका वर्तन प्रभावित होगा, तथा इससे और नई समस्याएँ उत्पन्न होगी । इस के विपरीत अगर आपका फोकस आपके बेहतरीन प्रदर्शन पर होगा, तो आपको कई नई संभावनाएँ दिखाई देगी । आपको नई ऊर्जा का अनुभव होगा, इसी के परिणाम स्वरुप आपका वर्तन प्रभावित होगा एवं आप और नई संभावनाएँ देखने में समर्थ होंगे तथा आपका प्रदर्शन और बेहतरीन होगा ।
इसी लिए अगर जीवन में आपको सिर्फ एक कौशल सीखना हो, तो वह कौशल होगा ‘आपके फोकस को नियंत्रित करना और उसे सही दिशा देना ।’ सिर्फ यह एक कौशल आपके जीवन को आमूलाग्र बदल कर रख देगा ।
आखिरकार हमारी जिदंगी है क्या ? हमारा फोकस ही तो हमारी जिंदगी है । हम सभी के जीवन में इस समय हजारों चीजे घट रही हैं,
- जो खुश है, वह जाने अनजाने खुशी पर फोकस कर रहा है ।
- जो दुखी है, वो जाने अनजाने दुःख पर फोकस कर रहा है ।
- जो उत्साही है, वह जाने अनजाने उत्साह पर फोकस कर रहा है ।
- जो निराश है, वह जाने अनजाने निराशा पर फोकस कर रहा है ।
जिस पर फोकस किया जा रहा है, वे चीजे अपने आप बढ़ती जा रही है । चाहे वे नकारात्मक हो, या सकारात्मक । अगर आप अपने जीवन में सतत नकारात्मक अनुभव कर रहे हो, या असफल परिणाम हासिल कर रहे हो, तो थोड़ा अंदर जरूर टटोलना कि कही अनजाने में आपके फोकस को नियंत्रित करने में तो आप असफल नहीं हो रहे हैं? सवाल यह है, कि आप किस पर फोकस कर रहे हैं ?
याद रखना ‘हमारा फोकस ही हामारी जिंदगी है ।’

एन.एल.पी. ट्रेनिंग वर्कशॉप में हम ‘फोकस’ खड़ा करने की दिमागी प्रक्रिया सीखते हैं । हमें लगेगा, कि ‘फोकस’ एक परिणाम है, पर नहीं फोकस एक दिमागी प्रक्रिया है । अगर यह दिमागी प्रक्रिया है, तो उसके कुछ इन्ग्रेडियंटस् याने घटक होंगे और अगर उसके कुछ घटक होंगे, तो उन्हें जानने के बाद हम उस फोकस को बड़ी ही आसानी से स्वयं के दिमाग में खड़ा कर सकते हैं । एन.एल.पी. हमें फोकस के इन्ग्रेडियंटस् के बारे में समझाता है और उसे स्वयं के जीवन में खड़ा करने में मदद करता है ।
अब एक ऐसे सवाल के साथ आपको छोड जाता हूँ , जिससे मैंने अपने फोकस को नियंत्रित किया, उसे दिशा दी । जब भी कोई उलझन होती है, तो मैं यह सवाल अपने आप से पूछता हूँ....
कौन से ऐसे विशिष्ट परिणाम है, जिन्हें प्राप्त करने के लिए मैं प्रतिबध्द हूँ?
एक वादा मैं जरूर आप से कर सकता हूँ कि अगर आप ठान ले, तो बहुत ही सरलता से फोकस्ड रहने की इस प्रक्रिया को सीखकर आप अपने जीवन में आश्चर्यजनक परिणाम अर्जित कर सकते हैं । आवश्यकता है, इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाने की ।
चलो फिर अगले ब्लॉग में मिलते हैं ।
तब तक के लिए ‘एन्जॉय युवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन ।’

एन.एल.पी. सीखना याने स्वयं में लड़ने के जज्बे को जगाना ।
एन.एल.पी. सीखना याने स्वयं में लड़ने के जज्बे को जगाना ।
बीते कई वर्षों से मैं एन.एल.पी., हिप्नॉसिस, लाइफ कोचिंग, इमोशनल इंटेलिजेंस, सी.बी.टी., पर्सनॅलिटी डेवलपमेंट एवं साइकोलॉजी का एक अभ्यासक तथा ट्रेनर रहा हूँ । इन सब में एन.एल.पी. मुझे हमेशा से ही ज्यादा आकर्षित करता आया है, मैंने एन.एल.पी. के संदर्भ में बहुत सारी किताबें पढ़ी हैं, ढेर सारे ट्रेनर्स को सुना है, देखा है, सेंकडों ट्रेनर्स से मिला हूँ, पर सिर्फ कुछ गिने चुने ट्रेनर्स ऐसे हैं, जिन्होंने सही मायने में मेरे जीवन को आकार दिया, मुझे जीना सिखाया और सबसे अहम बात मुझ में लड़ने का ज़ज्बा जगाया । इन में रिचर्ड बॅन्डलर, एन्थनी रॉबिन्स, मायकेल हॉल, रॉबर्ट डिल्टस्, जोसेफ ओ. कनॉर इ. कुछ खास नाम शामिल है । इनसे ना सिर्फ मैंने एन.एल.पी. सीखा, किंतु मुझ में एन.एल.पी. की एक समझ खड़ी हुई, जीवन जीने का एक नया नजरिया मिला और सबसे महत्वपूर्ण बात, मुझ में समस्याओं से कभी हार न मानने का ज़ज्बा पैदा हुआ और अब यहीं लड़ने का ज़ज्बा एन.एल.पी. ट्रेनिंग के प्रतिभागियों में खड़ा करने का काम आज आइ.बी.एच.एन.एल.पी. कर रहा है ।
जब मैं भूतकाल में झाँकता हूँ, तो अचंबित हो जाता हूँ, क्योंकि एक समय था जब जिंदगी समस्याओं का पर्यायवाची शब्द बन चुका थी । कई बार मुझे ऐसा एहसास होता था, कि मानों जिंदगी अंतहीन समस्याओं की एक श्रृंखला है । एक समस्या खत्म नहीं हुई, कि दूसरी सामने आकर खड़ी होती थी । ऐसा लगता था कि जिंदगी खत्म हो जाएगी, परंतु समस्याएँ नहीं । किंतु एन.एल.पी. ने मुझे सिखाया, कि समस्याओं से ध्यान हटाकर लड़ने के जज्बे को मज़बूत करने में ताक़त लगाओ, स्वयं को बेहतर करने के लिए समय निकालो, स्वयं के भीतर छिपी हुई ताक़त को उजागर करने का प्रयास करो । जब मैंने एन.एल.पी. को जीवन में आजमाना शुरू किया, तब धीरे-धीरे मुझे एन.एल.पी. सीखने का मतलब मुझे समझ में आने लगा । मेरे लिए एन.एल.पी. सीखने का मतलब है, स्वयं के भीतर छिपे हुए लड़ने के जज्बे को जगाना और साथ ही साथ कुछ कर गुजरने के जुनून को निर्मित करना । एन.एल.पी. सीखना याने जिंदगी से बेतहाशा प्यार करना, जिंदगी के प्रति बेहद कुतूहल से भर जाना और लड़ने के लिए जरूरी जज्बे को जगाना । कुछ अलग और हटकर करना । जो कुछ करना है, उसे उत्साह के साथ करना । जिंदगी को ना सिर्फ जीना, पर उसे महसूस करना । एन.एल.पी. कोई थ्योरी नहीं है, एन.एल.पी. स्वयं के साथ और दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण संवाद को स्थापित करने की एक जादूई प्रक्रिया है, यह कोई तकनीक नहीं है, बल्कि हमारे मस्तिष्क के अविरत चलते कार्यविधी को सीखना है, उसमें महारत हासिल करना है, इसीलिए एन.एल.पी. समझना, याने एन.एल.पी. जीना है और एन.एल.पी. को जीना, याने स्वयं के भीतर लड़ने के जज्बे को जगाना है ।

दोस्तों, बहुत बार रोजमर्रा के जीवन की उठा पटक में हम समस्याओं से घिर जाते हैं, कभी हार न मानने की उस ताक़त को खोने लगते हैं, धीरे-धीरे लड़ने का वह ज़ज्बा खत्म होने लगता है, हम थक जाते हैं, अंदर से टूट जाते हैं, स्वयं की काबिलियत पर ही सवाल उठाने लगते हैं, अंत में परिस्थितियों से एडजस्ट करना सीख लेते हैं और अंत में जिंदगी में ऊँचा उठने की सनक गँवा बैठते हैं । पर क्या आपको लगता है कि उस ‘लड़ने के जज्बे’ को खोने से आपका जीवन सुखमय होगा? हरगीज नहीं । एक बात याद रखना,
- अगर जीवन है, तो समस्याएँ होगी ।
- अगर आप काम करेंगे, तो गलतियाँ होगी ।
- अगर आप उपर उठने का प्रयास करेंगे, तो गिरेंगे भी ।
याने आपके जीवन में समस्याएँ है, संघर्ष है, तो इसका मतलब ही यह हुआ कि आप जीवित है । खुशियाँ मनाएँ आप जीवित हैं, क्योंकि जो मर गए हैं, उनके लिए सारी समस्याएँ और संघर्ष खत्म हो गए हैं । याद रखना, हमारे जीवन के संघर्ष ही हमें जीवित होने का एहसास देते हैं । उन संघर्षों से लड़ने में ही जीवन छिपा है । वे संघर्ष ही प्रगति की डोर हैं । वे संघर्ष ही अंततः अपार आनंद के स्त्रोत बनते हैं, क्योंकि कामयाबी का स्वाद उन संघर्षों की तुलना में ही चखा जा सकता है ।
आपने शायद पूर्व हैवी वेट चॅम्पियन जेम्स् वाल्टर ब्रेडोक का नाम सुना होगा । उनका जीवन बचपन से ही समस्याओं से घिरा था, या आप ऐसा भी कह सकते हैं कि संघर्षों से उनका बहुत पुराना नाता रहा । जिंदगी बिल्कुल भी आसान नहीं थी, छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करना पड़ता था । बचपन में फुटबॉल प्लेयर बनने का सपना देखा था, पर वह पूरा न हो सका । इस टूटे हुए सपने का दर्द सीने में लिए हुए वे जी रहे थें और अचानक एक दिन बॉक्सिंग के प्रति आकर्षित हुए । बॉक्सिंग करने लगें, शुरुआती असफलताओं के बाद धीरे-धीरे लय में लौटे और जीत का आगाझ हुआ । अब बॉक्सिंग में करीयर बन रहा था, थोड़े बहुत पैसे भी हाथ आ रहे थें, लग रहा था कि अब आखिरकार संघर्षों से, समस्याओं से छुटकारा मिल ही गया । एक दिन वे हैवी वेट टायटल के लिए लड़ रहे थें, मुकाबला जोरदार हो रहा था, जीत की भरसक कोशिश हो रही थी, लड़ाई एकदम आरपार की थी, पर दुर्भाग्य से आखरी पलों में नसीब ने साथ नहीं दिया और जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण मुकाबला हार गए । इतना ही नहीं इस लड़ाई में उनका दाया हाथ कई जगह पर फ्रॅक्चर हुआ था और इसप्रकार करीयर का लगभग अंत हो चुका था ।
धीरे-धीरे स्थितियाँ बद से बदतर होती गयीं । वह दौर अमेरिका का ग्रेट डिप्रेशन या भयानक मंदी का था । जेम्स् को रोजगार नहीं मिल रहा था, हाथ में काम नहीं था, पैसे खत्म हो चुके थें, गरीबी से पूरा परिवार त्रस्त हो गया था । संघर्ष खत्म होने का नाम नहीं ले रहे थें । इतना ही नहीं प्रतिदिन संघर्ष और समस्याएँ बढ़ रही थीं । हर दिन नई समस्याएँ, एक समस्या खत्म होने से पूर्व दूसरी समस्या सामने आ खड़ी होती थी । रोजगार की तलाश में थें और आखिरकार काम मिला । काम था, सिर पर बोझ ढोने का । काम तो मिल गया, पर बोझ उठाने के लिए हाथ में ताक़त तो होनी चाहिए, क्योंकि फाईट में दाया हाथ कई जगह पर फ्रॅक्चर हुआ था । अंततः बाएँ हाथ से बोझ ढोने लगें । संघर्षों की श्रृंखला समाप्त नहीं हो रही थी ।
अब एक ही रास्ता बचा था, फिर से बॉक्सिंग में नसीब आजमाने का और इस प्रकार जेम्स् वाल्टर ने फिर से बॉक्सिंग के रिंग में कदम रखा । अब लड़ाई सिर्फ जीतने के लिए नहीं थी, अब स्वयं का अस्तित्व बचाना था, अब कुछ बड़ा करना था, स्वयं को सिध्द करना था और इसी ताक़त एवं निश्चय के साथ जेम्स् ने लड़ना शुरू किया, हर मुक्का पहले से ज्यादा ताक़तवर था, हर रणनीति पहले से ज्यादा सटीक थी, हर चाल पहले से ज्यादा बुद्धिमानी पूर्ण थी । पूरी ताक़त झोंक दी थी, हर फाईट मानों जिंदगी की आखरी फाईट थी और 1935 में चमत्कार हुआ, कुछ दिनों पूर्व बोझ ढोनेवाला मजदूर अमेरिकन बॉक्सिंग जगत का हैवी वेट चॅम्पियन बना था । जेम्स् वाल्टर ब्रेडोक ने इतिहास रचा था । सही मायने में कामयाबी का स्वाद चखा था ।
अब सवाल यह है कि ऐसा क्या है, जो जेम्स् वाल्टर को उन लाखों लोगों से अलग खड़ा करता है, जो जिंदगी से हार मान लेते हैं? जो लड़ने के बजाय भागने में यकिन करते हैं? जो जीत के लिए मेहनत करने की बजाय स्वयं की हार को स्वीकार कर लेते हैं? कुछ मुलभूत बातें हैं, जो जेम्स् वाल्टर को सामान्य लोगों से अलग खड़ा करती हैं । जेम्स् वाल्टर में एक ज़ज्बा था, कभी न हार मानने का ज़ज्बा । उन में जीत की भूख थी, उन्हें आशा थी कि एक दिन उनके सारे सपने साकार होंगे । वे समस्याओं से घिरे थें, पर फिर भी नजर समाधान पर थी । वे संघर्षों से मुकाबला करते हुए थके नहीं, उलटा उनका हर दिन नए उत्साह और जोश के साथ शुरू होता था । उन्हें उनकी खामियाँ पता थी, पर उन्होंने सारी ताक़त स्वयं को विकसित करने के लिए झोंक दी, इसीलिए समस्या और संघर्ष उन्हें कभी हरा ना सकें ।
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क्या आपको भी स्वयं के व्यक्तित्व का ऐसा निर्माण करना है, जिस में आप जिंदगी के प्रति विलक्षण उत्सुकता से भरे हो, आपका हर दिन पूरे जोश के साथ शुरू हो, आपके सपनों से आप बेइंतेहा मोहब्बत करें, आप हर दिन कुछ नया सीखे, स्वयं के प्रति आत्मसन्मान हो, दूसरों के उपर प्यार हो, आप के पास लड़ने का ज़ज्बा हो, कभी हार न मानने की मनोदृष्टि हो? क्या आपको जिंदगी में सही मायने में ऊँचा उठना है? क्या आपको अपने भीतर छिपी ताक़त को जगाना है? क्या आपको ‘कभी हार न मानने’ के जज्बे को निर्मित करना है? अगर ‘हाँ’ तो एन.एल.पी. आपके लिए है । यहाँ से अनंत संभावनाओं के द्वार खुलते हैं । यहाँ पर सटीक रणनीति और ठोस कौशल सीखाए जाते हैं । यहाँ पर लड़ने के जज्बे को जगाया जाता है और यहीं हमारे लिए एन.एल.पी. का मतलब है ।

एन.एल.पी. - जीवन रूपांतरण की किमया
कुछ साल पहले मैंने मिल्खा सिंग का एक साक्षात्कार (इंटरव्यू) देखा था । उसके कुछ अंश आज मैं आपके साथ शेअर करना चाहूँगा ।
इंटरव्यूअर - रनिंग जैसे खेल में आप का आर्मी से नॅशनल लेवल और नॅशनल लेवल से इंटरनॅशनल लेवल तक के प्रवास के बारे में क्या कहेंगे?
मिल्खा सिंग – पहले मैं अपने सेंटर के अंदर फर्स्ट आया, फिर ब्रिगेड की गेम्स होती हैं, वहाँ मैं फर्स्ट आया, फिर डिफेन्स सर्विसेस् की प्रतियोगिताएँ होती हैं, जिन में आर्मी, एअरफोर्स और नेव्ही, सब फोर्सेस् पार्टिसिपेट करते हैं, उसमें भी मैं फर्स्ट आया । फिर मेरा सिलेक्शन हुआ नॅशनल गेम्स के लिए, तो नॅशनल गेम्स खेलने चला गया, नॅशनल गेम गेम्स में बहुत पसीना बहाया और वहाँ पर मैं चौथे स्थान पर रहा । किन्तु वहाँ पर मेरा प्रदर्शन देखने के बाद कॅम्प के लिए चयन किया गया । तो वहाँ पर मैं बहुत हार्ड प्रॅक्टीस करता था, मेरी जी तोड़ मेहनत देखकर मेंरे साथी खिलाड़ी कोच से कहते थे कि यह लड़का इतनी हार्ड प्रॅक्टीस से मर जाएगा, हम से इतनी प्रॅक्टीस नहीं होगी । तो कोच मुझसे कहता था कि आप चैम्पियन बनोगे और ये पीछे रह जाएँगे ।
इंटरव्यूअर- लेकिन सर आप इतना ट्रेनिंग कैसे करते थे?
मिल्खा सिंग - बात उस समय की है, जब मेलबर्न में हुए दौड़ प्रतियोगिता के लिए भारत की ओर से दौड़ने के लिए मेरा चयन हुआ था, वहाँ पर एक प्रतिभागी चार सौ मीटर की रेस में फर्स्ट आया, मैं तो पहले ही राउंड में बाहर हो गया था, जब मैं प्रतियोगिता से बाहर हुआ, उसी समय मैने धरती माँ की कसम खाई, ‘जब तक कि मैं वर्ल्ड रिकॉर्ड नहीं तोड़ता, तब तक मैं आराम से नहीं बैठूँगा ।’ मैं इतनी प्रॅक्टीस किया करता था कि लगभग एक बकेट पसीना मेंरे शरीर से निकलता था, कितनी बार खुन की उल्टियाँ होती थीं, कभी-कभी तो पेशाब के जरिये भी खुन निकलता था, लेकिन मेरा इरादा मज़बूत था कि चाहे मैं मर जाऊँ, पर अपना सपना पूरा होने के बाद ही रूकूंगा । बहुत तकलीफ होती थी पर मेरा इरादा मज़बूत था, मैं यह करके रहूँगा चाहे कुछ भी हो जाए ।
अब सवाल यह है कि यह ‘मज़बूत इरादा’ क्या है? आप किसे ‘मज़बूत इरादा’ कहेंगे? जिससे कामयाबी मिलती है? क्या हम यह मज़बूत इरादा सीख सकते हैं? जिंदगी में कामयाबी हासील करने के लिए मज़बूत इरादा चाहिए, यह तो हम सब जानते हैं, पर कितने लोगों में यह मज़बूत इरादा दिखता है ? किस प्रकार से इस मज़बूत इरादे को मैं अपने जीवन में खड़ा कर सकता हूँ? इसकी दिमागी प्रकिया या प्रोसेस क्या है? कैसे??? हाउ???
हम सभी जानते हैं कि कामयाबी के लिए जिंदगी में करना क्या है, सभी मोटिवेशनल स्पीकर्स भी हमेशा यही समझाते हुए पाए जाते हैं । उनके अभिभाषण में से आप कुछ सर्वमान्य उपदेश आसानी से ढूंढ पाएँगे, जैसे कि सकारत्मक रहे, स्वयं का दृष्टिकोन बदलें, आगे बढ़ने का प्रयास करें, उच्च लक्ष्यों स्थापना करें, समय का उचित प्रबंधन करें, स्वयं पर पूर्ण विश्वास करे, सातत्य रखे, आनंदी रहे, खुश रहे, उत्साही रहे, इ. याने कि जिंदगी में ‘क्या करना है?’ यही हमेशा सीखाया जाता रहा है और वे ही बातें हम भी दूसरों को सिखाते आये हैं । पर इससे कुछ भी तो नहीं होता । ‘जीवन में क्या करना है?’ सिर्फ यह समझ आने से कोई परिवर्तन नहीं आता, हमें वह ‘किस प्रकार से करना है?’ यह समझने से ही परिवर्तन आएगा । ‘क्या करना है?’ इससे ज्यादा ‘कैसे करना है?’ यह समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है ।

एन.एल.पी. में हम ‘क्या?’ नहीं, तो ‘कैसे?’ का जवाब ढूंढते हैं । जब कोई भावना या विचार हमारे दिमाग में निर्मित होता है, तब सही में हमारे दिमाग में होता क्या है, यह हम एन.एल.पी. में सीखते हैं । जब कोई मोटीवेट होता है, तो उसके दिमाग में क्या होता है? जब कोई निराशा से घिर जाता है, तो उस पल उसके दिमाग में होता क्या है? इसके बारे में एन.एल.पी. हमें सटीक जानकारी देता है ।
एन.एल.पी. में हम दिमागी प्रक्रियाएँ सीखते हैं । मज़बूत इरादा क्या है? जब भी यह मज़बूत इरादा खड़ा होता है, तब हमारे दिमाग क्या घटता है? जो कुछ घटता है, उसे हम एन.एल.पी.में सीखते हैं । एक बार मज़बूत इरादे की ‘दिमागी प्रकिया’ हमें समझ में आ जाएँ, तो हम यह मज़बूत इरादा स्वयं में और दूसरों में भी खड़ा कर सकते हैं । एन.एल.पी. में इसे मॉडलिंग कहा जाता है । इसीलिए एन.एल.पी. अलग है, क्योंकि यह हमें ‘कैसे?’ या ‘How?’ का जवाब ढूंढने में मदद करता है, जिससे हम अपने जीवन को परावर्तित कर सकें ।
साथ ही साथ एन.एल.पी. में हमें ब्रेन कंडीशनिंग के टूल्स् सीखाये जाते हैं । सिर्फ उच्च लक्ष्य की स्थापना से कुछ नहीं होता । दुनिया में बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपना लक्ष्य सालों से पता है, पर उन्होंने कभी एक्शन ही नहीं ली है । लक्ष्य की स्थापना के साथ लक्ष्य की ब्रेन कंडीशनिंग होना भी बेहद जरूरी है । लोग गोल सेटिंग तो करते हैं, पर गोल कंडीशनिंग नहीं । हमारा लक्ष्य या सपना हमारे लिए इतना आकर्षक होना चाहिए कि उसके लिए कार्य किए बिना हमें चैन नहीं आना चाहिए । हमें एक आकर्षक भविष्य का निर्माण करना होगा, जिसकी हमारे दिलों दिमाग पर गहरी छाप हो । इसे कहते हैं ‘कंडीशनिंग’ । एन.एल.पी. में हम कंडीशनिंग सीखते हैं, जिससे हमारे सपनें साकार होते हैं । साथ ही साथ यदि हमारी निगेटिव्ह कंडीशनिंग हुई है, तो उससे हम सहजता से निजाद पा सकते हैं । कंडीशनिंग के क्षेत्र में एन.एल.पी. को महारत हासील है । एन.एल.पी. में हम कंडीशनिंग के बहुत सारे जादुई और ताकदवर टूल्स् और एवं टेक्निक्स् सीखते हैं ।
साथ ही साथ एन.एल.पी. में हम अलग-अलग पॅटर्नस् भी सीखते हैं । ये पॅटर्नस् हमें सोचने का एक अलग ढंग सिखाते हैं, या कहो अलग ढंग से सोचना सिखाते हैं । जिससे हम अंतर्मन में दृढ़ हुई बूरी सूचनाएँ, हमारे भय, हमारे फोबिया, बूरी यादें, दु:ख, बूरे संबंध, जिंदगी के गलत फैसले और उनकी स्मृतियों से आजाद हो सकते हैं । साथ ही साथ हम अपनी सालों पूरानी नकारात्मक आदतें पलभर में बदल सकते हैं । अच्छे आरोग्य की प्राप्ति, नकारात्मक भावनाओं से छुटकारा और सकारात्मक भावनाओं का अंगिकार कर सकते हैं । सबसे महत्वपूर्ण हम जिंदगी का ज्यादा मजा लेने लगते हैं । प्यार करना, दूसरों से अच्छे संबध बनाना, बिना हिचकिचाहट बड़े फैसले करना तथा उन पर अडिग रहते हुए अमल करना, ज्यादा पैसे कमाना आदि सब कुछ बहुत सरलता से सीख सकते हैं ।
इसी संदर्भ में कुछ नया सीखने के लिए अब अगले ब्लॉग में मिलते हैं,
तब तक के लिए ....
‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’

क्या आपकी ‘जीवन रूपांतरण की इच्छा’ बहुत सतही तो नहीं है?
क्या आपकी ‘जीवन रूपांतरण की इच्छा’ बहुत सतही तो नहीं है?
एक लड़का जो बचपन में हमेशा सर्वसामान्य छात्र रहा, पढ़ाई में ज्यादा होशियार भी नहीं था, स्कूल में एक बार फेल भी हुआ था, जैसे-तैसे उसने अपनी लॉ की पढ़ाई पूरी की, मुंबई में लॉयर बनने की पुरजोर कोशिश भी की, पर हाथ में निराशा के सिवाय कुछ भी नहीं लगा । साउथ अफ्रिका में उसकी थोड़ी बहुत पहचान थी और उस वक्त साउथ अफ्रिका में रहनेवाले भारतीयों को एक लॉयर की जरूरत थी और भारत में भी उसके लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं था । तो यह महाशय साउथ अफ्रिका चले गये । फिर एक दिन साउथ अफ्रिका में ट्रेन से सफ़र कर रहे थे, रंग से काले थे, तो टी.सी. ने उन्हें प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठने से मना किया, वे भी आपनी ज़िद पर अड़े रहे कि मेंरे पास मेरे पास प्रथम श्रेणी का टिकट है, तो मैं प्रथम श्रेणी में ही बैठुंगा, विवाद के चलते उस टी.सी. ने अगले स्टेशन पर उन महाशय को उनके सामान के साथ बाहर फेंक दिया ।
उस वक्त कुछ बदला । जिंदगी ने करवट ली । सामान्य से असामान्य की तरफ यात्रा शुरू हुई । जिंदगी ने एक नया एवं अलग रास्ता इक्तीयार कर लिया और हम सभी जानते हैं कि आगे जाकर यह सामान्य लॉयर ‘महात्मा गांधी’ बने । उस वक्त उनके भीतर कुछ तो बदला । पर क्या? किसप्रकार से? पलभर में जिंदगी बदली । पर कैसे?
१३ जुलाई १९७८ अमरिका के अखबारों में एक खबर छपी । यह खबर इतनी चौकानेवाली थी कि कारोबारी जगत का हर एक इंन्सान उसी खबर के बारे में बात कर रहा था । यह खबर जिस कंपनी के बारे में थी, उस कंपनी में तो मानो जैसे भूचाल आ गया । कंपनी के कर्मचारियों को उस खबर पर भरोसा करना असंभव था । खबर यह थी कि ली आयाकोका को फोर्ड के सीईओ पद से हटाया गया है । पर क्यों? अमरिका के सबसे ताकदवर एवं अमीर सीईओ को अपने पद से क्यों हटाया गया? यहीं सवाल ली आयाकोका ने हेन्री फोर्ड, जो कि फोर्ड कंपनी के मालिक थे, उनसे पूछा, “आप मुझे कंपनी से क्यों निकाल रहे हो?” फोर्ड ने जवाब दिया, “तुम मुझे पसंद नहीं हो ।” यह सुनने के बाद ली को बहुत दुःख हुआ । जिस कंपनी का प्रॉफिट बढ़ाने के लिए उन्होंने दिन रात एक की थी, अपने पसीने से उन्होंने कंपनी को सीचा था, उस कंपनी का मालिक अचानक एक दिन उनसे कहता है कि तुम मुझे पसंद नहीं हो, इसलिए तुम्हें निकाला जा रहा है ! आप भी सोच सकते हैं कि क्या बीती होगी उस इन्सान पर, जिसने ताउम्र कंपनी के विकास और विस्तार के अलावा कुछ भी नहीं सोचा था?
उस वक्त ली आयाकोका की उम्र थी ५८ साल । आयाकोका अपने जिंदगी के सबसे बूरे दौर से गुजर रहे थे । किसी समय कारोबारी जगत का सबसे ताकदवर इंसान आज घर में खाली बैठने के लिए मजबूर था । तकलीफ भरे दिन, एक के बाद एक कट रहे थे । आगे का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था । जिंदगी में घना अंधेरा छाया हुआ था । ऐसे ही एक साल निकल गया । उस वक्त अमरिका में एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी थी जिसका दिवाला निकला था, वह बंद होने की कगार पर पहुँच गयी थी । कंपनी का नाम था क्रिझलर कॉर्पोरेशनस् । क्रिझलर कॉर्पोरेशनस् के बोर्ड ऑफ डिरेक्टर्स आयाकोका से मिले, कंपनी के नेतृत्व की धुरा संभालने का अनुरोध आयाकोका से किया गया और इस तरह आयाकोका क्रिझलर कॉर्पोरेशनस् के नए सीईओ बन गए । सिर्फ दो सालों में चमत्कार हुआ । आयाकोका के नेतृत्व में कंपनी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए २.१ बिलीयन डॉलर की कमाई की थी । अचानक से एक साल तक जो आयाकोका गुमनामी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर थे, वह अमरिका के नेशनल सेलिब्रिटी बन गये । पोर्टफोलिओ मॅगझीन ने अमरिका के सबसे सफल और ताकदवर पहले पचास सीईओज् की एक लिस्ट बनाई है, जिस में आयाकोका को १८ वां स्थान दिया गया है । यह परिवर्तन कैसे आया? एक साल की निराशा, आशा में किस प्रकार से परावर्तित हुई? एक नए और सुनहरे भविष्य का निर्माण आयाकोका किसप्रकार कर पाए? ढलती उम्र मैं एक नई ताकद किस प्रकार से पैदा हुई? वह फिर से लढ़ने के लिए किस प्रकार खड़े हुए? शायद उनके भीतर कुछ तो बदला? पर क्या? किसप्रकार से? पर जो कुछ हुआ वह पलभर में हुआ । पर कैसे?
जब मैं छोटा था, तब हमारे पड़ोस में एक फॅमिली रहा करती थी । पति-पत्नी और दो बच्चें । पति हर रोज़ शाम घर आने के बाद छोटी-छोटी बातों पर पत्नी से झगड़ा शुरू कर देता था । हर रोज़ झगड़ा और झगड़े का अंत पति द्वारा पत्नी को पीटने में होता था । हर रोज़ किसी ना किसी कारणवश झगड़े के बाद वह पति अपनी पत्नी को पीटता था । वह रोती थी, चिल्लाती थी, दया की भीख मांगती थी, पर जब तक उसका गुस्सा ठंडा नहीं होता था, तब तक वह उसे पीटता था । कभी खरोंच आती, कभी शरीर पर सुजन हुआ करती, कभी सिर फुटता, तो कभी हाथ टुटता । यह सब कई सालों तक चला । बाद में वह फॅमिली घर छोड़कर चली गयी और आगे के दस साल हम कभी नहीं मिले ।
एक दिन मैं पूना आया हुआ था, कुछ काम से बैंक जाना हुआ । दोपहर का वक़्त होने से बैंक में ज्यादा भीड़ न थी । मैं बैंक के अफसर से बात कर रहा था कि अचानक कॅश काउंटर संभालने वाली एक महिला ने मुझे नाम से पुकारा, मैंने कुतूहलवश अपनी नजर उनकी ओर घुमाई, चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा । थोड़ी देर सोचने के बाद याद आया, वह पड़ोसवाली फॅमिली । अपना काम पूरा कर में उन महोदया से मिलने गया । बातें शुरू हुई, मैंने उनसे पूछा, “यहाँ कैसे?” उन्होंने कहा, “वह पुराना घर छोड़ने के दो साल बाद मैंने अपने पति को तलाक दे दिया, बैंक की परीक्षा पास की और पिछले सात साल से पूना में इसी बैंक में जॉब कर रही हूँ, लड़का इंजिनीयरींग की पढ़ाई रहा है और लड़की की शादी हो चुकी है, वह अमरिका में है ।
मैं तो उसकी कहानी सुनकर दंग रह गया । दस सालों तक वह महिला अपने पति के अत्याचार सहन करती रही और एक दिन अचानक भीतर कुछ बदला । पलभर में निर्णय हुआ, जिंदगी में आगे बढ़ने का । कुछ तो बदला? पर क्या? किसप्रकार से? पर जो कुछ हुआ, वह पलभर में हुआ । पर कैसे?
जब भी बदलाहट होती है, वह एक पल में होती है । वह पल हमारे भविष्य का निर्माण करता है । जिंदगी जब भी बदलती है, एक पल में बदलती है । पर वह पल कब आता है? कैसे आता है? क्यों आता है? कहाँ से आता है?
इन्हीं कुछ सवालों पर थोड़ा विस्तार पूर्वक सोचते हैं, क्योंकि जीवन के मूलभूत परिवर्तन बहुत बार हमारे अनजाने घटित होते हैं । पर क्या हम इस जीवन परिवर्तन की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को समझ सकते हैं? एन.एल.पी. हमें इसका उत्तर देता है ।

जब भी जीवन में कुछ बदलता है, तो दिमाग में चार बातें घटना जरूरी होता है ।
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सबसे पहले जो कुछ भी आपको बदलना है, उसके बारे में सटीक जानकारी होनी चाहिए । अगर मुझे यह पता ही नहीं है कि मुझे बदलना क्या है, तो बदलाहट नहीं होगी । बहुत बार जिंदगी नींद में कट जाती है । हमें अपनी नकारात्मक आदतों और भावनाओं की इतनी आदत हो जाती है कि इनकी वजह से जिंदगी खराब हो रही है, यह भी देखना हम बंद कर देते हैं । अतः ‘क्या बदलना है?’ इसकी सही जानकारी होना आवश्यक है । इसी लिए सबसे पहले जागरूकता, अवेरनेस होना चाहिए । बहुत बार बदलाहट का भ्रम होता है, साफ-साफ कुछ भी नहीं होता । बहुत लोग आम तौर पर यह कहते हैं कि जिंदगी में कुछ तो मिसिंग है । पर इससे क्या कोई बदलाहट हो सकती है? बिलकुल नहीं । आपको आपके जीवन में क्या बदलना है? क्या आपको उसकी ‘स्पष्ट और सटिक’ जानकारी है?
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दूसरी बात, जिंदगी में कुछ भी बदलने के लिए ‘यह किसी भी हालत में बदलना ही है ।’ यह मन:स्थिति होनी चाहिए । कुनकुना प्रयास कुछ भी नहीं बदल पाता । पानी सिर्फ १०० डिग्री पर ही भांप बनता है । बदलाहट तभी होती है, जब हम उस बिंदू तक पहुँचते हैं, जहाँ से बिना बदले पीछे नहीं हटना चाहते । जब हमें भीतर से लगेगा, ‘अब बस, बहुत हो गया, इनफ इज इनफ’, तभी बदलाहट होगी ।‘यह किसी भी हालत में बदलना ही है’ इस मन:स्थिति तक आप पहुँचे हो?
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तिसरी बात, जो भी बदलाहट करनी है वह मुझे ही करनी है, मैं बदलने की ज़िम्मेदारी लेता हूँ, यह भाव होना चाहिए । जहाँ पर भी बदलाहट विफल जाती है, वहाँ पर ज़िम्मेदारी का भाव नहीं होता । लोग बदलते नहीं हैं, क्योंकि हर बार वे अपनी ज़िम्मेदारी दूसरों पर ढकेल देते हैं । वे हर बार न बदल पाने की वजह देते हैं । इसी लिए तर्क मत देना, बदलने की ज़िम्मेदारी लेना जरूरी होता है । क्या आपने पूरी तरह से बदलने की ज़िम्मेदारी उठायी है?
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आखरी बात, मैं बदल सकता हूँ, मैं कर सकता हूँ, मैं बन सकता हूँ, मैं बना सकता हूँ, इस पर विश्वास स्वयं में जगाना होगा । बहुत लोग समस्या में इतना उलझ जाते हैं और इतने समय तक उलझ जाते हैं कि धीरे-धीरे मैं यह बदल सकता हूँ, यह भाव ही खोने लगता है । वे उस समस्या, तकलिफ, दुःख के साथ तालमेल बिठा लेते हैं । मैं बदलाहट ला सकता हूँ, यह बात दिमाग में होना बहुत जरूरी है । क्या ‘मैं बदल सकता हूँ ।’ इस विचार पर आपका विश्वास है?
अब ऊपर दिए तीन उदाहरण देखें, उनके बारें में थोड़ा सोचे । जाने-अनजाने जब भी ये चार बातें दिमाग में घटती हैं, तो पल भर में बदलाहट होती है । अगर आपको जीवन रूपांतरीत करना है, या जीवन का कोई हिस्सा बदलना है, तो क्या ऊपर बताई गई चार बातें आपके दिमाग में घट रही है? क्या जानते हुए हम इन चार बातों को अपने दिमाग में घटने दे सकते हैं?
चार सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न फिर से दोहराता हूँ ।
01. आपको आपके जीवन में क्या बदलना है? क्या आपको उसकी ‘स्पष्ट और सटीक’ जानकारी है?
02. ‘यह किसी भी हालत में बदलना ही है ।’ इस मन:स्थिति तक आप पहुँचे हो?
03. क्या आपने पूरी तरह से बदलने की ज़िम्मेदारी उठाई है?
04. ‘मैं बदल सकता हूँ ।’ क्या इस पर आपका विश्वास है?
फिर मिलेंगे, तब तक के लिए ......
‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’

क्या एन.एल.पी. हमारे पारिवारिक जीवन को भी रूपांतरीत कर सकता है ?
एक दिन हम अपने किसी रिश्तेदार के घर उनसे मिलने गये थे । कुछ ही देर में उनका छोटा लड़का स्कूल से घर आया । घर आते ही स्कूल बैग सोफ़े पर पटककर रोने लगा । सब लोग इकठ्ठा हुए और उसे पूछने लगे कि वह क्यों रो रहा है? रोते-रोते ही उसने कहा कि मुझे स्कूल नहीं जाना, गणित विषय मेरे लिए बहुत कठिन है, मुझे यह विषय बिल्कुल भी समझ नहीं आता । इस पर उसके पापा ने कहा, “तो इसमें कौनसी रोने वाली बात है, गणित तो मेरे लिए भी कठिन था, और वैसे भी गणित विषय है ही ऐसा और ज्यादातर लोगों के लिए कठिन ही होता है । चलो! अब यह रोना-धोना छोड़ो, कल मैं स्कूल में आकर आपकी मॅम से मिलता हूँ ।”
अब जरा इस संवाद पर गौर करो ।
थोड़ी देर बाद मैं उसके साथ बातें करने लगा । मैंने उससे कहा, “रोते-रोते तुम क्या कह रहे थे, मुझे कुछ समझ में नहीं आया । क्या तुम फिर से बता सकते हो?” यह सुनते ही वह थोड़ा असहज हो गया । उसने कहा, “गणित विषय मेरे लिए बहुत कठिन है, मुझे स्कूल नहीं जाना ।” यह सुनने के बाद मैंने उससे पूछा कि पूरा गणित विषय ही कठिन है या गणित का कुछ हिस्सा कठिन है? वह सोचने लगा । मैंने फिर से पूछा, “पूरा गणित विषय ही कठिन है या गणित विषय का कुछ हिस्सा कठिन है?” उसने कहा, “वैसे तो कुछ-कुछ लेसन अच्छे से आते हैं, पर कुछ हिस्सा बिल्कुल समझ में नहीं आता ।” अब मैंने उससे पूछा कि कुछ हिस्सा याने क्या? गणित में कितने लेसन हैं? उसने सोचते हुए कहा, “इस साल हमें ग्यारह लेसन हैं ।” फिर मैंने उससे पूछा कि ग्यारह में से कितने लेसन समझ में नहीं आतें? वह फिर सोचने लगा और उसने कहा, “तीन ।” फिर मैंने उससे सवाल किया, “क्या इन तीन लेसन में तुम्हें कुछ भी समझ में नहीं आया है?” तो उसने कहा कि वैसा तो नहीं है । कुछ समझा है और कुछ नहीं समझा है । मैंने कहा, “चलो, किताब लाओ और मुझे बताओ कि क्या कुछ भी नहीं समझ में आया?” झटसे उसका मूड बदल गया । वह दौड़ते हुए गया और किताब लेकर आया । मुझे बताने लगा कि उसे क्या समझ में नहीं आया है । हम दोनों ने जब गौर किया, तो समझ में आया कि तीन लेसन में सिर्फ दो समीकरण ऐसे थे, जो उसे समझ में नहीं आए थे । यह जानने के बाद मैंने उससे पूछा कि क्या सच में उसके लिए गणित कठिन है, या सिर्फ गणित के ये दो समीकरण उसके समझ में नहीं आ रहे हैं? उसने कहा कि गणित विषय के सिर्फ दो समीकरण, और वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगा ।
एन.एल.पी. कहता है कि हमारा आंतरिक जगत कहीं बार टूट जाता है और इस टूटे हुए जगत को हम अपनी टूटी हुई भाषा में व्यक्त करते हैं । अगर हमें कोई ऐसा इन्सान मिल जाए, जो भाषा का सही इस्तेमाल करना जानता हो, तो वह उसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए, हमारे टूटे हुए जगत को फिरसे पूर्ववत बना सकता है । अगर हम भाषा का सही इस्तेमाल करें, तो हम भी यह काम कर सकते हैं, हम भी स्वयं के बिखरे हुए जगत को संजो सकते हैं ।
एन.एल.पी. प्रैक्टिशनर ट्रेनिंग में हम ये सब स्किल्स् मेटा मॉडल और मिल्टन मॉडल के जरिए सीखते हैं, जिससे हम सही में एक मास्टर कम्युनिकेटर बनते हैं । एन.एल.पी. के जरिए हम हमारे परिवार को भी रूपांतरीत कर सकते हैं ।

बहुत बार एन.एल.पी. सीखने के लिए माता पिता भी आते हैं । आप कहेंगे, “माता पिता को एन.एल.पी. सीखने से क्या मिलेगा?” आप ही जरा सोचे अगर आप का भी बच्चा है, तो मुझे पता है कि आप भी दिल से यही चाहेंगे कि आप अपने बच्चों की भावनाओं को समझे और आप क्या सोचते हैं यह भी उन तक सुचारू ढंग से पहुँचा पाए और वह भी बिना आपा खोये । आपको शायद यह महसूस हुआ होगा कि बहुत बार आप अपने बच्चों के सामने स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर पाते और बच्चें भी आपके सामने अभिव्यक्त होने में हिचकिचाते हैं । मुझे पता है कि आपको आश्चर्य हुआ होगा यह जानते हुए कि लगभग हर माता पिता की यह दिक्कत है कि किस प्रकार वे अपने बच्चों के साथ संवाद प्रस्थापित करें । एन.एल.पी. में हम यहीं सीखते हैं । क्या आप कल्पना कर सकते हो स्वयं के ऐसे व्यक्तित्व की, कि जो बड़े ही सरलता और सहजता से बच्चों के अंतर्जगत के साथ जुड़ जाता हो, ऐसा व्यक्ति जो उनके साथ होता हो तो सिर्फ उनके ही साथ हो, जब वह बच्चों के साथ हो तो आनंद से भरा हो । क्या आप कल्पना कर सकते हो स्वयं की कि जो बच्चों के साथ बच्चा बन जाता हो, उनके उत्सव में स्वयं को सम्मिलित करता हो? क्या आप कल्पना कर सकते हो स्वयं की कि जो बच्चों के अंतर्जगत को जानता हो और स्वयं उस अंतर्जगत से जुड़ जाता हो । आपको यकिन नहीं होगा कि एन.एल.पी. में हम यहीं सब सीखते हैं और यह बहुत आश्वासन पूर्ण है कि यह करने की आपकी इच्छा है और इसी लिए शायद आप यह ब्लॉग भी पढ़ रहे हैं । याद रखना ये सब कौशल सीखना बिल्कुल भी कठिन नहीं है, सिर्फ आपके पास यह सीखने की तीव्र इच्छा और थोड़ा समय चाहिए, क्योंकि जागृत अवस्था में जब हम किसी कौशल को सीखना शुरू कर देते हैं, तब अर्धजागृत या अचेतन तल पर कोई शक्ति जागृत होने लगती है, जिससे सीखना सहज और आनंददायक बनता है । सीखने की प्रक्रिया में जब हमारा अचेतन गहनता से सम्मिलित हो जाता है, तो सीखने की प्रक्रिया ज्यादा तेज होने लगती है । यह बिल्कुल ही जरूरी नहीं है कि आपके जागृत मन को सटिकता से जानकारी हो कि आपको सीखना क्या है? अगर आपका अचेतन या अर्धजागृत मन सीखने में उत्सुक हो जाता है, तो सीखना उत्सव बन जाता है । शायद आप स्वयं ही पाएँगे, कि आप परिवार में अपने बच्चों के साथ किसी गहरे तलपर जुड़ाव, आनंद की भावदशा और सहजता को महासूस कर रहे हो । जैसे ही आप एन.एल.पी. ट्रेनिंग कोर्स में यह सब सीखेंगे, आपको यकिन से यह एहसास होगा कि आप सही माइने में एक आदर्श माता पिता बन रहे हो, एक प्रेमपूर्ण माता पिता बन रहे हो, एक अच्छे इंसान बन रहे हो, क्योंकि एन.एल.पी. के द्वारा आप बड़े ही सरलता से आपके परिवार के साथ एक जुड़ाव महसूस करेंगे । जैसे ही आपको यह अंदरूनी एहसास होगा, वैसे ही आपका वर्तन बदल जाएगा, आपकी सोच बदलेगी और आपकी जिंदगी एक नई राह पर चल पड़ेगी ।
और बहुत सी बातें हैं, अगले ब्लॉग में मिलते हैं ।
तब तक के लिए ‘एन्जॉय यूवर लाईफ एंड लिव्ह विथ पॅशन !’
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