ibhnlp blog

NLP Coaching Certification in India

थिन स्लाइसिंग और एनएलपी पार्ट 2

Thin Slicing Part 2 04

यह आपकी ‘निर्णय प्रक्रिया’ को पूरी तरह से बदल कर रख देगा

पिछले ब्लॉग में हमने थिन स्लाइसिंग क्या है, यह जानने की कोशिश की । हमने थिन स्लाइसिंग की व्याख्या भी देखी । अब इस ब्लॉग की शुरूवात हम एक बुनियादी सवाल के साथ करते हैं, आखिरकार हमारा दिमाग थिन स्लाइसिंग को किसप्रकार से अंजाम देता है? या हमारा अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस काम कैसे करता है? या स्नॅप जजमेंट या फर्स्ट इम्प्रेशन की प्रक्रिया में दिमाग में होता क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, सही निर्णय लेने के लिए क्या थिन स्लाइसिंग पर भरवसा किया जा सकता है ।

इस सवाल के जवाब में अॅमबड़ी और रोझेन्थल नामक शोधकर्ताओं व्दारा किया गया एक शोध प्रस्तुत करता हूँ । इन शोधकर्ताओं को यह जानना था, कि क्या ‘थिन स्लाइसिंग’ के जरिए पलभर में हम जिस निर्णय तक पहूँचे हैं, इसके विपरीत अगर ज्यादा समय दिया जाए, गहन सोचविचार किया जाए, तो क्या कोई अलग निर्णय होगा ? अगर सोचविचार करने के बाद, समय देने के बाद भी निर्णय नहीं बदलता है, तो इसका साफ साफ मतलब यह हुआ कि ‘थिन स्लाइसिंग’ या ‘स्नॅप जजमेंट’ या ‘र्फस्ट इम्प्रेशन’ पर भरवसा किया जा सकता है ।

इसके लिए अॅमबड़ी और रोझेन्थल ने कुछ शिक्षकों के सिखाते वक्त के व्हिडीयोज् बनाए । इन घंटे भर के व्हिडीयोज् के छोटे छोटे क्लिप्स् बनाए । कुछ क्लिप्स् दो सेकंद के थें, कुछ पांच और कुछ दस सेकंद के । सारे क्लिप्स् नॉन व्हर्बल बिहेव्हीयर के थे, याने ना बातें थी, ना ही आवाज । इन छोटी क्लिप्स् को कॉलेज में आए, नए विद्यार्थियों को दिखाया गया । क्लिप्स् बहुत ही ज्यादा छोटी थी, सिर्फ दो सेकंद की । इतनी छोटी क्लिप देखने के बाद विद्यार्थियों का उनका अवलोकन या राय पूछी गयी । विद्यार्थियों का एक छोटासा इंटरव्यू लिया गया । उनसे पूछा गया, कि सिर्फ दो सेकंद की क्लिप देखने के बाद उनको शिक्षक कैसे लगे ? उनके जवाब रेकॉर्ड किए गए ।

इसके दो से तीन महीनों बाद जब कि विद्यार्थियों ने उन्हीं शिक्षकों के बहुत सारे सेशन अटेंड किए थे, फिरसे इंटरव्यू लिए गए । फिसरे पूछा गया, कि अब तीन महीनों बाद उनकी उन शिक्षकों के प्रति क्या राय है ? और आखिरकार दो सेकंद के क्लिप के बाद की राय और तीन महीनों बाद की राय की तूलना की गयी । अॅमबड़ी और रोझेन्थल को इस तूलना पर यकिन करना असंभव था क्योंकि थिन स्लाइसिंग से आया हुआ निर्णय और तीन महीनों बाद की सोच लगभग समान थी । याने कुछ ही पलों में विद्यार्थी जिस निर्णय तक पहूँचे थे, तीन महीनों बाद भी उसी निर्णय की सत्यता प्रस्थापित हुई थी ।

अब सवाल यह था, कि थिन स्लाइसिंग करते वक्त विद्यार्थियों ने ऐसा क्या देखा था, जिसपर ‘शिक्षक कैसा है?’ इसपर उन्होंने उनकी राय बनायी थी । इसपर विद्यार्थियों से पूछा गया, कि आपने उस क्लिप में ऐसा क्या देखा था, जिससे शिक्षक आपको अच्छा लगेगा या नहीं, यह आपने तय किया? इसपर लगभग सारे विद्यार्थियों का एक ही जवाब था, कि हमें तो सिर्फ दो सेकंद की क्लिप दिखायी गयी और वह भी बिना किसी आवाज के, इसलिए ज्यादा सोच विचार करने का मौका भी नहीं था । पर इन दो सेकंद में हमने कुछ महसूस किया, जिसपर हमने यह तय किया, कि इस शिक्षक की क्लास कैसी होगी, याने ‘थिन स्लाइसिंग’ हुई थी, पलभर में निर्णय हुआ था, पर किसप्रकार से हुआ, इसका जवाब विद्यार्थियों के पास नहीं था । एक बात तो तय थी, कि उन दो सेकंद में विद्यार्थियों का ‘अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस’ काम कर रहा था । उनके ‘थिन स्लाइसिंग’ या ‘स्नॅप जजमेंट’ या ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ ने उनको निर्णय तक पहुँचाया था और निर्णय भी सटीक था ।

पर अॅमबड़ी और रोझेन्थल को यह जानना था, कि उन दो सेकंद में हुई ‘थिन स्लाइसिंग’ की प्रक्रिया में विद्यार्थियों ने ऐसा क्या देखा था जिससे उनका दिमाग निर्णय लेने की अवस्था तक पहुँच पाया । जैसे रिचर्स आगे बढ़ा इन दो सेकंद की बारीकियां स्पष्ट होने लगी । कुछ बहुत ही सुक्ष्म बातें थी, जिनके बूते दिमाग ने पलभर में निर्णय लिया था । उन दो सेकंद की क्लिप में विद्यार्थियों के दिमाग ने कुछ सुक्ष्म चीजों का निरीक्षण किया था और शायद उसके बारे में उन्हें भी अंदाजा नहीं था । क्योंकि यह सब पलभर में हुआ था, इसीलिए विद्यार्थियों ने सिर्फ इतना कहा कि ‘उन्हें कुछ महसूस हुआ’। पर इन दो सेकंद में हुआ क्या था? इन दो सेकंदों में विद्यार्थियों के दिमाग ने कुछ सुक्ष्म बातों का बड़ी सटीकता से अवलोकन किया था, जैसे कि शिक्षक के चेहरे के बदलते हुए भाव, आय कॉन्टॅक्ट, खुले हाथ, मुस्कुराहट, खड़े होने का ढंग, आयब्रो की हलचल, नीचे देखना, हाथ में जो चीज है जैसे कि किताब उसके साथ उनका बर्ताव, इ. और यह निरीक्षण दिमाग ने इतने झट से किया कि विद्यार्थियों को भी समझ में नहीं आया, कि उनके दिमाग ने निर्णय लेने के लिए क्या किया था? पलभर में दिमाग ने ढेर सारे निरीक्षणों को थिन स्लाइस किया था । याने ‘स्नॅप जजमेंट’ या ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ के कुछ ही पलों में दिमाग ने इतनी सारी जटील बातों का बेहतरीन तरीके से निरीक्षण किया था और उसके बूते एक सटीक निर्णय लिया था ।

इसका मतलब ही यह हुआ, कि हमारे दिमाग के पास एक अद्भूत शक्ति है, हमारा दिमाग कुछ पलों में, बहुत ही कम जानकारी होते हुए भी सटीक निर्णय ले सकता है । याने ‘थिन स्लाइसिंग’ की प्रक्रिया के तहत जो निर्णय पलभर में होते है, वे भी सही होते हैं । बहुत बार तो ढेर सारी जानकारी के विश्लेषण के बाद, बहुत ज्यादा समय सोचविचार करने के बाद, हम जो निर्णय लेते हैं, उन निर्णयों के मुकाबले ज्यादातर बार थिन स्लाइसिंग से हुए निर्णय ज्यादा सटीक और बेहतर साबित होते हैं । इसका मतलब ही यह हुआ, कि ‘थिन स्लाइसिंग’ पर भरवसा किया जा सकता है ।

अब सवाल यह है कि बेहतर क्या है? ‘स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट’ या ‘थिन स्लाइसिंग’ का इस्तेमाल करना? ‘स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट’ या ‘थिन स्लाइसिंग’ के इस्तेमाल का सही समय कौनसा है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, ‘थिन स्लाइसिंग’ अगर बेहतर प्रक्रिया है, तो बहुत बार हमारे पलभर में लिए हुए फैसले गलत क्यों साबित होते हैं?

अब उपर लिखा हुआ आखरी सवाल फिरसे पढ़े । आखरी सवाल का एक जवाब यह है कि बहुत बार ज्यादातर लोग गलत तरीके से और गलत बिंदूओं पर ‘थिन स्लाइसिंग’ करते हैं । अगर दिमाग गलत आधारपर थिन स्लाइसिंग करेंगा, तो पलभर में लिए हुए निर्णय गलत साबित हो सकते है । जैसे कि कुछ कार सेल्समन इन्सान दिखने में कैसा है और उसने क्या पहना है, इन बिंदूओं पर ‘थिन स्लाइसिंग’ करते हैं, जिससे बहुत बार ‘कौन खरीद सकता है और कौन नहीं’ इस विषय में उनके निर्णय गलत साबित होते हैं । क्योंकि अगर कोई गांव का किसान कार खरीदने के लिए शोरूम आता है, तो उसके कपड़ों के उपर से आप यह तय नहीं कर सकते, कि उसके पास कितनी जमीन होगी, कितना पैसा होगा और उसमे कार खरीदने की क्षमता है या नहीं । अगर आपने उसके कपड़ों के उपर से ‘स्नॅप जजमेंट’ या ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ बना लिया और वह गलत साबित होता है और आप उस ग्राहक को गवांते हो, तो आपका कमसे कम पाच से दस लाख का घाटा होगा । याने अगर हमारा दिमाग गलत बिंदूओं पर ‘थिन स्लाइसिंग’ कर रहा है, तो पलभर में लिए हुए फैसले गलत साबित हो सकते हैं और शायद बहुत बार यहीं होता है । अगर कार बेचते वक्त ‘थिन स्लाइसिंग’ करनी है, तो वह ग्राहक कितना आत्मविश्वास से भरा है या डांवाडौल है, उसे कारों के बारे में कितना पता है या वह पूरी तरह से अनुभवहीन है, क्या उसे कंपनीपर भरवसा है या उसे संशय है, अगर इन बातों पर दिमाग ‘थिन स्लाइसिंग’ करता है, तो सेल्समन ग्राहक को बेहतर तरीके से प्रभावित कर सकता है । याने ‘थिन स्लाइसिंग’ सफल हो यह आपकी इच्छा है, तो किन बिंदूओं पर ‘थिन स्लाइसिंग’ करनी है, उसकी ट्रेनिंग दिमाग को देना जरूरी होता है । फिरसे दोहराता हूँ, याने ‘थिन स्लाइसिंग’ सफल हो यह आपकी इच्छा है, तो किन बिंदूओं पर ‘थिन स्लाइसिंग’ करनी है, उसकी ट्रेनिंग दिमाग को देना जरूरी होता है ।

अब एक सवाल पूछता हूँ, थोड़ा थिन स्लाइसिंग करें, स्नॅप जजमेंट ले, ज्यादा सोचविचार मत करें । क्या आप सवाल के लिए तैयार है? तो सवाल है, क्या मेट्रो सिटीज् को छोड़कर मर्सिडीज बेंझ किसी जिले के छोटे से शहर के बाजार में अपना शोरूम खोल सकती है? सवाल दोहराता हूँ, क्या मेट्रो सिटीज् को छोड़कर मर्सिडीज बेंझ किसी जिले के छोटे से शहर के बाजार में अपना शोरूम खोल सकती है? शायद झटसे जवाब आएगा कि नहीं, बिलकूल नहीं, असंभव है । इतनी मंहगी कार गांव में रहनेवाले लोग क्यों खरीदेंगे? गांव में जहाँ सडके ठिक नहीं है, खेतीबाडी होती है, वहाँ मर्सिडीज बेंझ का क्या काम? शायद यहीं सोचा होगा आपने । अगर आपने इस प्रकार से स्नॅप जजमेंट लिया है, तो आप पिछले उदाहरण का कार सेल्समन कपड़ों के पहनावे के आधार पर जो ‘थिन स्लाइसिंग’ की गलती कर रहा है, वही गलती आप यहाँ दोहरा रहे हैं, क्योंकि महाराष्ट्र का एक छोटासा शहर कोल्हापूर में मर्सिडीज बेंझ का शोरूम है । शायद आपको यकिन नहीं होगा, पर यह शोरूम खुला 2004 में और 2006 आते आते कोल्हापूर और उसके आसपास के गांवो में 65 मर्सिडीज बेंझ बेची जा चुकी थी ।

इसका मतलब यह हुआ, कि आपने गलत बिंदूओं के आधार पर थिन स्लाइसिंग की, तो ‘थिन स्लाइसिंग’ गलत जा सकती है और बहुत बार जाती भी है । इसीलिए थिन स्लाइसिंग करते वक्त थोड़ा सजग होना जरूरी है, क्योंकि ‘थिन स्लाइसिंग’ कुछ ही पलों में होती है, इसीलिए ‘थिन स्लाइसिंग’ पर आधारित निर्णय लेने के बाद थोड़ा सोचविचार करना, थोड़ा समय देना, याने स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट भी जरूरी होता है । अब सबसे महत्वपूर्ण बात, बेहतर निर्णय लेने के लिए स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट और थिन स्लाइसिंग का संतूलन होना जरूरी है । फिरसे एक बार इस वाक्य पर गौर करें, बेहतर निर्णय लेने के लिए स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट और थिन स्लाइसिंग का संतूलन होना जरूरी है । साथ ही साथ ‘थिन स्लाइसिंग’ सही हो इससे ज्यादा वह गलत ना हो, इसपर विचार होना बेहद जरूरी है ।

अब गलत जानेवाले थिन स्लाइसिंग पर कुछ सवालों के साथ आपको छोड़  जाता हूँ, थिन स्लाइसिंग अगर बेहतर प्रक्रिया है, तो बहुत बार हमारे पलभर में लिए हुए फैसले गलत क्यों साबित होते हैं? जब थिन स्लाइसिंग गलत जाती है, तो क्या होता है? किस आधारपर हमारा दिमाग ‘थिन स्लाइसिंग’ करता है?

अगले ब्लॉग में इन सवालों के जवाब ढुंढते है । तब तक के लए ‘एन्जॉय युवर लाईफ अॅन्ड लिव्ह विथ पॅशन ’ ।

Sandip Shirsat NLP Master Trainer
Sandip Shirsat

CEO & Founder of Indian Board of Hypnosis & Neuro Linguistic Programming

Downloaded Over
30,000 Times

Learn 6 secrets to make your NLP Training succeed?

This will save your money & Valuable time.
Get it absolutely FREE.

*Mandatory