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NLP Coaching Certification in India

थिन स्लाइसिंग और एनएलपी पार्ट 1

Thin Slicing Part 1 04

यह आपकी ‘निर्णय प्रक्रिया’ को पूरी तरह से बदल कर रख देगा

थिन स्लाइसिंग: निर्णय लेने की अंतर्मन की ताकदवर प्रक्रिया

हमें कितना समय लगता है, किसी से पहली बार मिलने के बाद वह हमें कैसा लगा यह जानने के लिए ? (एक ऐसे इंन्सान के बारे में सोचे जिसे हाल ही में आप पहली बार मिले - उसे परखने में आपको कितना समय लगा?)

किसी नई कल्पना पर प्रतिक्रिया करने के लिए । (थोड़ा इस कल्पना के बारे में सोचे - अगर इस दुनिया में आर्मी ही ना हो...... कितना समय लगा इस कल्पना का स्वीकार या अस्वीकार करने में ।)

जब भी हमें कुछ ही पलों में निर्णय लेना अनिवार्य हो । (आपको किसी भी हालत में कम से कम समय में घर पहुँचना है और ट्रेन स्टेशन पर आने के बाद पता चला की आखरी ट्रेन छुटने में सिर्फ एक मिनट बचा है और आपके पास टिकट लेने का समय भी नहीं है........ आपको कितना समय लगेगा निर्णय लेने में ।)

लेक्चर में बैठकर शिक्षक कैसा है, यह जानने के लिए ? (कॉलेज का पहला दिन और पहला लेक्चर, शिक्षक सामने आकर खड़े होते हैं  और सिखाना शुरू होता है - कितना समय लगा था, अगले दिन से इस लेक्चर को बैठना है या नहीं यह तय करने में?)

शायद सिर्फ और सिर्फ पहले दो सेकंद पर्याप्त है । शायद सिर्फ एक नजर में हम निर्णय तक पहूँच जाते हैं । शायद सिर्फ एक पलक झपकाना और तय करना काफी होता है ।

क्या आपको पता है, हमारा दिमाग किसी भी निर्णय तक पहुँचने  के लिए दो भिन्न प्रकार की रणनीतियाँ अपनाता है ।

पहली रणनीति जिससे हम सब अच्छी तरह से वाकीफ हैं । निर्णय तक पहुँचने  से पूर्व हम सोचविचार करते हैं, हमारे तर्क या लॉजिक का इस्तेमाल करते हैं, ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकठ्ठा करते हैं, अलग अलग लोगों से चर्चा करते हैं और आखिरकार हम अंतिम निर्णय तक पहुँचते हैं । यहीं तो वह प्रक्रिया है, जिसे मॅनेजमेंट की भाषा में स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट या रणनीतिक प्रबंधन कहा जाता है । जिसमें ढेर सारे जटील डेटा या जानकारी का विश्लेषण किया जाता है, घंटों तक मिटींग्स् होती है, तरह तरह के प्रेझेंटेशन होते हैं और आखिरकार ‘क्या करना है’ इस सवाल का जवाब ढूंढा जाता है । 

दुसरी रणनीति है ‘थिन स्लाइसिंग की’, जिसे आम भाषा में ‘स्नॅप जजमेंट’ या ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ भी कहा जाता है । इस में हम पलक झपकते ही निर्णय तक पहुँच जाते हैं । हमारे सामने समस्या खड़ी होती है, हमारा दिमाग तुरंत उसपर विचार करता है और पलभर में हम किसी जवाब तक पहुँच जाते हैं । याने ‘थिन स्लाइसिंग’ में कुछ ही पलों में हमारा दिमाग निर्णय लेता है ।

पहले प्रकार की रणनीति में दिमाग काफी समय और ऊर्जा इस्तेमाल करता है, पर थिन स्लाइसिंग में सिर्फ दो सेकंद में हमारा दिमाग निर्णय तक पहुँच जाता है, इसीलिए बोलचाल की भाषा में हम इसे ‘स्नॅप जजमेंट’ या ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ कहते हैं । इस थिन स्लाइसिंग के लिए हमारी जो दिमागी प्रक्रिया होती है, जिससे कुछ ही पलों में हम निर्णय तक पहुँचने में सक्षम होते हैं, इसे हमारा ‘अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस’ अंजाम देता है । आज सायकोलॉजी के क्षेत्र में हमारी निर्णय प्रक्रिया को बेहतर करने के लिए हम किस प्रकार से इस अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस का बेहतर बना सकते हैं, इसपर गहन अध्ययन चल रहा है ।

इस अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस की कल्पना आप एक बहुत बड़े, तेज और बेहरीन कम्प्युटर जैसी कर सकते हैं । एक ऐसा कंम्प्युटर जो ढेर सारी जटिल जानकारी पर कुछ ही पलों में प्रक्रिया करने में सक्षम होता है । किसी भी निर्णय तक पहुँचने के लिए इस अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस को सिर्फ कुछ पल काफी है । एक उदाहरण के साथ समझाता हूँ, जैसे कि आप कुछ सामान खरीदने के लिए बाजार के लिए निकले हैं और एक संकरी गली से आगे बढ़ रहे हैं । उसी वक्त जब आप सामने देखते हैं, तब पता चलता है कि आगे से कोई कार तेजी से आपकी तरफ आ रही है शायद जिसके ब्रेक फेल हुए हैं । अब आप क्या करेंगे ? गहन सोच विचार करेंगे ? आपके पास कितने सारे विकल्प है, इसके बारे में सोचेंगे? या दुसरे लोगों से विचार विमर्श करते हुए कोई बेहतर रणनीति बनाएंगे ? बिलकूल नहीं । इस डरानेवाली परिस्थिती में आपका अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया का अंगीकार करेंगा और पलभर में बहुत ही कम जानकारी की मदद से जरूरी निर्णय लेगा । आपको यकीन नहीं होगा, पर यहीं वह अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस की ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया है, जिसके बूते हम पलभर में निर्णय ले सकते हैं और यहीं कारण है, कि दुसरी प्रजातियों की तुलना में मनुष्य इस पृथ्वी पर स्वयं को बेहतर तरीके से ढाल सका है ।

अब थोड़ी कल्पना करें, आपका जीवन कितना बेहतर होगा, जब आप सिर्फ कुछ ही पलों में आपके जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय सटिकता से लेने के लिए सक्षम होंगे । थोड़ा सोचे, जो निर्णय लेने के लिए जिंदगी के अनमोल घंटे, दिन या साल बरबाद होते हैं, वे निर्णय सिर्फ दो सेकंद में पुरे विश्वास के साथ आप लेने लगे । क्या आपको नहीं लगता कि जादू हो जाएगा, अगर कामकाजी जीवन में कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पूर्व हर कोई आपसे सलाह मशवरा करें, क्योंकि सबको पता हैं, कि आप एक बेहतरीन डिसीजन मेकर है । कितना बढ़िया होगा, अगर आपके परिवार के संदर्भ में आप झटसे निर्णय लेने के काबील हो, शायद वे बच्चों के पढाई का सवाल हो, या घर खरीदने का निर्णय हो । संक्षेप में आपको नहीं लगता, कि आपका पूरा जीवन ही परिवर्तित हो जाएगा, अगर आप ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया में माहीर बनें, आपके अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस को पलभर में निर्णय लेने के लिए ट्रेन कर दे ।

तो अगले कुछ ब्लॉग में हम इसी ‘थिन स्लाइसिंग’ या ‘स्नॅप जजमेंट’ या ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ की दिमागी प्रक्रिया को समझने की कोशिश करेंगे । साथ ही साथ यह प्रक्रिया जहाँ घटती है, याने हमारे अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस में, उसपर भी थोड़ा सोचविचार करेंगे । साथ ही साथ इस प्रक्रिया को बेहतर करने की कुछ ढोस तकनीक भी सीखेंगे ।

अब थोड़ा इन सवालों पर सोचे...

क्या इस अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस की ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया को वैज्ञानिक तरीके से समझा जा सकता है?

क्या थिन स्लाइसिंग प्रक्रिया का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है?

क्या थिन स्लाइसिंग प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सकता है?

इन सवालों के जवाब ढुंढने से पूर्व हम थोड़ा ‘थिन स्लाइसिंग’ को समझने का प्रयास करते हैं । ‘थिन स्लाइसिंग’ इस शब्द का प्रयोग सायकोलॉजी और फिलॉसफी के क्षेत्र में हाल ही के दिनों में ज्यादा प्रचलित हुआ है । ‘थिन’ याने ‘पतला’ या ‘छोटा’ और ‘स्लाइसिंग’ याने ‘टुकडे करने की प्रकिया’ । संक्षेप में ‘थिन स्लाइसिंग’ का शब्दशः मतलब हुआ ‘छोटे छोटे टुकडे करने की प्रकिया’ । यह तो हुआ शब्द का अर्थ! अब थोड़ा सायकोलॉजी के नजरिए से इस शब्द को जानने की कोशिश करते हैं । ‘थिन स्लाइसिंग’ एक दिमागी प्रक्रिया है, जिसके तहत हमारा ‘अन्कॉन्शस माइंड’ या ‘अचेतन मन’ किसी परिस्थिति या वर्तन को समझने के लिए उसमें लिप्त पर अदृश्य पॅटर्न ढूंढने का काम करता है, जिसके लिए किसी दिमागी अनुभूती के बहुत छोटे छोटे टुकडे किए जाते हैं । अगर इसे समझने में थोड़ी कठिनाई हो रही है, तो थोड़ा इसप्रकार से समझने की कोशिश करते हैं, ‘थिन स्लाइसिंग’ हमारे अन्कॉन्शस माइंड की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे हमारे सामने जो परिस्थिती या समस्या है, उस परिस्थिती या समस्या को समझने के लिए हमारा अन्कॉन्शस जो ढेर सारी अप्रासंगिक जानकारी है, उसे छोड़कर या उसे तोड़कर सिर्फ और सिर्फ सबसे महत्वपूर्ण जानकारी पर फोकस करता है । जिससे पलभर में हम किसी निर्णय या जवाब तक पहुँच सकते हैं और आपको यह जानकर हैरानी होगी, कि हमारा अन्कॉन्शस इस प्रक्रिया में माहीर होता है ।

पर समस्या तब खड़ी होती है, जब हमारा समाज हमें इस प्रकार से शिक्षित करता है, कि ज्यादातर बार किसी भी निर्णय तक पहुँचने की प्रक्रिया में हम गहन विचार विमर्श करना बेहतर समझने लगते हैं । हम सामान्यतः सोचने लगते हैं कि बेहतर निर्णय सिर्फ और सिर्फ बहुत सोचविचार करने के बाद ही हो सकता है । हमें लगने लगता है कि पलभर में निर्णय लेना जोखिम भरा हो सकता है और विनाशकारी भी । हमारा मन यह मानने को राजी नहीं हो पाता, कि जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण और जटील निर्णय पल भर में ‘थिन स्लाइसिंग’ से करना बेहतर हो सकता है ।

पर सच बात यह है, कि थिन स्लाइसिंग हमें कम समय में बेहतर जवाब दे सकता है और बेहतर निर्णय तक पहुँचा सकता है और बहुत बार गहन सोच विचार, दिनों की मेहनत, जटील जानकारी का विश्लेषण करने के बाद होनेवाले निर्णय से पलभर में लिया हुआ निर्णय ज्यादा बेहतर और सटिक साबित हो सकता है । पर इसके लिए हमें हमारे ‘अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस’ पर भरवसा होना चाहिए । हमारे दिमाग की ‘थिन स्लाइसिंग’ प्रक्रिया में यकिन होना जरूरी है ।

अब यहाँ पर एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहूँगा, ‘थिन स्लाइसिंग’ कोई जादूई प्रक्रिया नहीं है, यह हमारे दिमाग की एक स्वाभाविक विधी है और हम आमतौर पर बहुत बार हमारा दिमाग इस ‘थिन स्लाइसिंग’ की प्रक्रिया को अपनाता है, जैसे कि जब भी हम किसी अपरिचित इंन्सान से मिलते हैं, तब हम ‘थिन स्लाइसिंग’ का इस्तेमाल करते हुए झट से इस निष्कर्ष तक पहुँच जाते हैं, कि यह इन्सान कैसा होगा? साथ ही जब भी किसी नई परिस्थिती में जब हमें जल्द से जल्द किसी निष्कर्ष तक पहुँचना होता है, हम ‘थिन स्लाइसिंग’ का इस्तेमाल करते हैं ।

पर इस संदर्भ में कुछ सवाल खड़े होते हैं, जिनके जबाब हमें ढुंढने होंगे, जैसे कि

  1. हमारा दिमाग थिन स्लाइसिंग को किसप्रकार से अंजाम देता है? या हमारा अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस काम कैसे करता है? या स्नॅप जजमेंट या फर्स्ट इम्प्रेशन की प्रक्रिया में दिमाग में होता क्या है? और मूल बात यह है कि क्या थिन स्लाइसिंग पर भरवसा किया जा सकता है?   ( इन सवालों के जबाब पाने के लिए पढ़े - थिन स्लाइसिंग और एनएलपी पार्ट 2 )
  2. बेहतर क्या है, स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट या थिन स्लाइसिंग का इस्तेमाल करना? स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट या थिन स्लाइसिंग के इस्तेमाल का सही समय कौनसा है? ( इन सवालों के जबाब पाने के लिए पढ़े - थिन स्लाइसिंग और एनएलपी पार्ट 2 )
  3. थिन स्लाइसिंग अगर बेहतर प्रक्रिया है, तो बहुत बार हमारे पलभर में लिए हुए फैसले गलत क्यों साबित होते हैं? जब थिन स्लाइसिंग गलत जाती है तो क्या होता है? किस आधार पर हमारा दिमाग थिन स्लाइसिंग करता है? जब थिन स्लाइसिंग गलत जाती है, तो क्या होता है?  ( इन सवालों के जबाब पाने के लिए पढ़े - थिन स्लाइसिंग और एनएलपी पार्ट 2 और 3 )
  4. अगर थिन स्लाइसिंग बेहतर है, तो क्या हम स्वयं को ‘थिन स्लाइसिंग’ में ट्रेन कर सकते हैं, जैसे स्टॅट्रेजिक मॅनेजमेंट में लोगों को ट्रेन किया जाता है? क्या हम अडॅप्टीव्ह अन्कॉन्शस की थिन स्लाइसिंग प्रक्रिया को नियंत्रित कर उसे दिशा दे सकते हैं? ( इन सवालों के जबाब पाने के लिए पढ़े - थिन स्लाइसिंग और एनएलपी पार्ट 4 )
  5. और सबसे महत्वपूर्ण बात क्या एनएलपी और एनएलपी के टुल्स थिन स्लाइसिंग प्रक्रिया को विकसित करने में हमारी मदद कर सकते हैं? ( इन सवालों के जबाब पाने के लिए पढ़े - थिन स्लाइसिंग और एनएलपी पार्ट 5 )

अगले ब्लॉग में इन सवालों के जवाब ढुंढते हैं । तब तक के लए ‘एन्जॉय युवर लाईफ अॅन्ड लिव्ह विथ पॅशन’ ।

Sandip Shirsat NLP Master Trainer
Sandip Shirsat

CEO & Founder of Indian Board of Hypnosis & Neuro Linguistic Programming

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