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अगर आप एन.एल.पी. अंग्रेजी में सीख रहे हों, तो आप आपका पैसा और समय दोनों बरबाद कर रहे हों।

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If You Are Learning Meta Model & Milton Model of NLP in English, You Are Wasting Your Time & Money! Part - 1

 - भाग १

जो कुछ भी हम आनंदपूर्ण मनस्थिती में सीखते हैं, वह हम कभी भी भूल नहीं पाते । - अलफ्रेड मेरसियर

आपको शायद पता होगा कि एन.एल.पी. की शुरूवात हुई मेटा मॉडल से जो व्हरजीनिया सटायर और फ्रिटस् पर्ल्स् के भाषा कौशल पर आधारीत थी । थेरपी के जगत में उस वक्त ये दोनों लोग बड़ी सहजता के साथ क्लांयट के अंतरजगत में बदलाहट लाते थें । अंतरजगत की जो चीजें बदलने में और जिंदगी को रूपांतरीत करने में जहाँ दुसरों को सालों लगते थें, वह काम ये दोनों कुछ पलों में कर देते थें । बहुत बार सिर्फ एक सेशन में निराशा, चिंता, दुख, क्रोध, नकारात्मकता दूर हो जाती थी । एक नई जिंदगी शुरू होती थी, लोग इनके पास रोते हुए आते थें और हँसते हुए जाते थे, निराश होकर आते थे और उत्साह लेकर जाते थे । यह एक जादू था, कुछ पलों में जिंदगी बदल जाती थी, सालों की समस्या मिनिटों में दूर हो जाती थी । अब सवाल यह है कि सटायर और पर्ल्स् यह जादू करते कैसे थे?

जब बॅन्डलर और ग्राइंडर, एन.एल.पी.संस्थापक, जब दोनों ने निरीक्षण किया तो पता चला कि व्हरजिनीया सटायर और फ्रिटस् पर्ल्स् दोनों ही भाषा का इस्तेमाल इतने सटीकता से और सहजता से कर रहे हैं कि उनकी भाषा के इस्तेमाल से वह क्लायंट के जीवन में बदलाहट ला रहे हैं । उनकि इस जादूई भाषा के गहन अध्ययन के बाद उनके भाषा के उपयोग में कुछ पॅटर्नस् या प्रतिरूप देखे गये । उन पॅटर्नस् को इकठ्ठा कर जब एन.एल.पी.संस्थापकों ने उनका इस्तेमाल करना शुरू किया, तब उन्हें भी आश्चर्यजनक परिणाम हासिल होने लगे । एन.एल.पी.संस्थापक भी सटायर और पर्ल्स् दोनों के समान थेरपी में परिणाम लाने लगे । बदलाहट इतनी जल्दी हो सकती है, इसपर विश्वास करना कठीन था, पर जीवन रूपांतरीत होने के सेंकडो प्रमाण सामने थें । परिणामस्वरूप उन लॅन्ग्वेज पॅटर्नस् को अधार बनाकर पहली किताब लिखी गई, जिसका नाम था ‘दि स्ट्रक्चर ऑफ मॅजिक’, जो पूरी तरह से भाषा और उसके उपयोग पर आधारीत थी । किस प्रकार हम भाषा का इस्तेमाल करते हुए खुद के और दुसरों के जीवन को रूपांतरीत कर सकते हैं, यह किताब में बताया गया था ।

मेटा मॉडेल हमें भाषा का इस्तेमाल करते हुए भाषा पर ही किसप्रकार सवाल खड़े कीये जा सकते हैं, जिससे खुदके और दूसरों के अंतरजगत को पूरी तरह से बदला जा सकता है इसका मार्गदर्शन करता है ।

उदाहरण के तौर पर, जब कोई आपसे यह कहता है, या आपका क्लायंट यह कहता है कि ......

"मैं कभी कभी अलग थलग महसूस करता हूँ...... " अब इस वाक्य के बारे में जरा सोचते हैं ।

यह वाक्य हमें उसके अंतरजगत के बारे में बाहोत कुछ बता रहा है पर बहुत कुछ छुपा भी रहा है जिसे हम एन.एल.पी.में डिलीशन कहते हैं । यह वाक्य सुनने के बाद हमें लगता है कि हमें समझ में आ गया कि उसे क्या कहना है । पर मेटा मॉडल कहता है कि आपको जो समझ में आया यह वाक्य सुनने के बाद वह आपका भ्रम है । अब सवाल यह हैं कि जो डिलीट किया गया है उसे किस प्रकार से खोंजे? तो मेटा मॉडल कहता है कि इस वाक्य को सवाल पुछे, इस प्रकार से सवाल पुछे जिससे जो डिलीट किया है वह सामने आए । जैसे कि,

मैं कभी कभी अलग थलग महसूस करता हूँ ।

पहला सवाल - किससे?

दुसरा सवाल - ऐसा क्या है, जिससे आपको अलग थलग महसूस होता है?   

ये दोनों सवाल हमें और ज्यादा जानकारी देंगे । इससे सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जो इस प्रकार से बात कर रहा है, उसे उसके अंतरजगत की और गहन जानकारी मिलेगी, शायद उसका टूटा हुआ अंतरजगत सिर्फ एक सवाल से फिरसे बुना जा सकता है ।

हमारी भाषा हमारे सोच को गहरे में प्रभावित करती हैं । - स्टिव्हन पिंकर

....और एक उदाहरण लेते हैं ।

"तुम मेरी कभी चिंता या केअर नहीं करते । ..... " अब इस वाक्य के बारे में जरा सोचते हैं ।

अब हमें लगेगा कि बात समझ में आ गयी । पर क्या सही में हमें समझ में आया है, या समझ का सिर्फ भ्रम है। अब इस वाक्य में जो क्रिया है ‘चिंता करना या केअर करना’ क्या हमें इसका सही अर्थ पता है? शायद नहीं।‘तुम मेरी कभी चिंता नहीं करते’ यह वाक्य कहनेवाले के अंतरजगत के बारे में कुछ कह रहा है, शायद कहने वाले को भी ठीक ठीक अंदाजा नहीं है कि वह क्या कह रहा है? अब मेटा मॉडल कहता है कि सवाल करे, ‘पर कैसे?’

वाक्य - तुम मेरी कभी चिंता या केअर नहीं करते ।

पहला सवाल - किस विशेष रूप से मैं तुम्हारी चिंता या केअर नहीं करता?

दुसरा सवाल - मैं ऐसा क्या नहीं करता, जिससे तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारी चिंता या केअर नहीं करता?

तिसरा सवाल -मैं ऐसा क्या करता हूँ, जिससे तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारी चिंता या केअर नहीं करता?

हर सवाल पर जरा गौर करे, क्या उत्तर आ सकेंगे इसके बारे में थोड़ा सोचे ।

जैसे ही आप इस प्रकार इस वाक्य को सवाल करते हो बोलनेवाला सोचने लगता है, सही में चिंता करने का मेरा मतलब क्या है? क्या चिंता करने की मेरी व्याख्या सामने वाले को पता है? या चिंता करने की मैं ने जो व्याख्या बनाई है, वह बुनयादी ढंग से गलत है? इस प्रकार के सवालों से हम दुसरे का टूटा हुआ, अंतरजगत फिरसे बुनने में उसकी मदद कर सकते हैं । यह सवाल कहनेवाले को उसके अंतरजगत के बारे और सटीक जानकारी देंगे और इसप्रकार भाषा इस्तेमाल करते हुए हम अंतरजगत में बदलाहट ला सकते हैं ।

जब आप यह मेटा मॉडेल जो बुनयादी निंव है, एन.एल.पी. की, उसे अंग्रेजी में सीखते हो और रोजमर्रा के जीवन में आप दुसरी भाषा इस्तेमाल करते हो, तो आप कभी भी मेटा मॉडल इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे । मेटा मॉडल के चालीस से ज्यादा पॅटर्न हिंदी या दुसरी भाषा में भाषांतरित करना किसी भी प्रतिभागी जो एन.एल.पी.सीख रहा है, उसके लिए लगभग नामुमकिन है । इससे होता यह है कि एन.एल.पी. सीखने के बाद भी कोई भी एन.एल.पी. प्रॅक्टीशनर रोजमर्रा की जिंदगी में उसका इस्तेमाल नहीं कर पाता है । इससे इन लँग्वेज पॅटर्नस्  का इस्तेमाल करते हुए ना वह खुदके जीवन को रूपांतरीत कर पाता है और ना दुसरों के ।

जब में एन.एल.पी. सीख रहा था, तो मैंने मेरे ट्रेनर से पुछा कि आपने तो यह ढेर सारे लँग्वेज पॅर्टनस् अंग्रेजी में सिखा दिए पर अब मेरी रोजमर्रा कि भाषा तो हिंदी और मराठी है, तो मैं इन लँग्वेज पॅर्टनस् का किस प्रकार से इस्तेमाल करूँ? तो मुझे जवाब मिला कि वह आपकी समस्या है, आप ही उसे हल करें । मेरे साथ और भी पच्चीस लोग थें, उन पच्चीस में से आज एक भी एन.एल.पी. प्रॅक्टीशनर रोजमर्रा के जीवन में इन लँग्वेज पॅर्टनस् का इस्तेमाल नहीं कर रहा है । क्योंकि बुनयादी भूल हुई है, इन लँग्वेज पॅर्टनस् को हमें रोजमर्रा की भाषा में सीखना होगा, तभी हम उन्हें इस्तेमाल कर सकेंगे ।

अगर आप एन.एल.पी. अंग्रेजी में सीख रहे हों, तो आप आपका पैसा और समय दोनों बरबाद कर रहे हों।

 - भाग २

मेटा मॉडल बनाने के बाद एन.एल.पी. फांउडर और एक भाषा के जादुगर से मिले, यह जादुगर इतना शक्तिशाली था कि आपके समझ में आए बिना आपको बदलने की ताकद रखता था । उसका नाम था मिल्टन इरिक्सन । मिल्टन इरिक्सन को हिप्नोसिस में महारत हासिल थी । जिंदगी की बहुत सी जटील समस्याएँ जैसे चिंता, निराशा, निरूत्साह, तणाव, विस्मरण, इ. को इरिक्सन पलभर में हिप्नोसिस के इस्तेमाल से बदल देता था । उसने लाखों लोगों को जिंदगीभर की समस्याओं से निजाद दिला दी और वह भी उनके समझ में आए बिना कि बदलाहट कैसे हुई । वह इसप्रकार से बातें करता था कि चेतन मन रूक जाता था और सूचनाएँ अवचेतन मन में स्थिर हो जाती थी । जैसे ही सूचनाएँ अवचेतन मन में स्थिर हो जाती, वैसे जिंदगी बदल जाती थी । वह सीधे हमारे अवचेतन मन से संवाद करता था । क्योंकि जिंदगी कि कोई भी बदलाहट प्रथम अवचेतन मन में होती है और अगर बदलाहट अवचेतन मन में हो तो ही बदलाहट होती है, अन्यथा वह होती ही नहीं है । वह जिस प्रकार से बातें करता था और जिंदगी में बदलाहट हो जाती थी उन लँग्वेज पॅटर्नस् को एन.एल.पी. फांउडर्स ने इकठ्ठा कर मिल्टन मॉडल बनाया, जो एन.एल.पी. की और एक महत्वपूर्ण नींव है ।

पत्तों के खेल में हमारे पास कौन से पत्ते होने चाहिए, यह हम तय नहीं कर सकते पर जो पत्ते हमारे पास है उनसे किस प्रकार से खेला जा सकता है यह हम जरूर तय कर सकते हैं । - मिल्टन इरिक्सन

अब एक उदाहरण देखते हैं, थोड़ा ध्यान से पढ़िए ।

‘‘मुझे जरूर आश्चर्य होगा, अगर आपको अभी तक यह एहसास हुआ होगा कि जिंदगी में सही माइने में सफल होने के लिए लक्ष्य की स्थापना करना कितना जरूरी है । और आपको यह अभी करने की कोई जरूरत नहीं है, जब तक कि आपके दिल में यह करने का भाव ना उठे । और कोई भी इन्सान, आपको तो पता ही होगा कि आराम से उसके जीवन में लक्ष्य की स्थापना कर सकता है, जिससे उसका मन नया सीखने के लिए खुल जाता है, आनंद से भर जाता है, उत्साह से सराबोर होता है । और आपको सही में इतनी आतुरता से लक्ष्य की स्थापना करने की जरूरत नहीं है, इससे अच्छा आप उस लक्ष्य प्राप्ती के बाद मिलने वाले अपार आनंद और आत्मविश्वास के बोध को जगाए । क्या आपने कभी भी किसी भी छोटे या बड़े लक्ष्य की प्राप्ती की है, बचपन में या बड़ा होने के बाद जिससे आपको उस लक्ष्य की प्राप्ती के बाद मिलने वाली कामयाबी का एहसास हुआ हो । ऐसा एहसास जो आपके दिल को छू गया हो, क्योंकि हर बार जब भी आपको लक्ष्य प्राप्ती के बाद कामयाबी का एहसास होता है, आपका मन भविष्य में और दूसरे लक्ष्यों की प्राप्ती के लिए आतुर हो उठता है । लक्ष्य प्राप्ती की चाहत पैदा होती है ।’’

क्या आपने भाषा के इस्तेमाल पर गौर किया? अगर नहीं तो फिरसे पढ़िए । यहाँ पर मैंने हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् का इस्तेमाल किया है । ये लँग्वेज पॅटर्नस् हमारे अवचेतन मन से जुड़ने में मदद करते हैं । ये पॅटर्नस् हमारे चेतन मन को किनारे कर देते हैं और अवचेतन से संवाद प्रस्थापित करने में मदद करते हैं । जैसे कि..........

  1. मुझे आश्चर्य होगा अगर आपको अभी तक यह एहसास हुआ होगा कि .......... आसान, सरल, सुलभ,आरामदेह, संतोषजनक, आनंददायक, सहज, इ. ।

  2. और.......... जरूरत नहीं है तब तक जब तक कि आपको यह अंदरूनी एहसास ..........

  3. और कोई भी इंन्सान, आपको तो पता ही होगा.......

  4. और आपको सही में इतनी आतुरता से.......... बोध को जगाएँ ।

  5. क्या आपने कभी भी .......... जिससे ...........?

  6. क्योंकि हर बार जब भी .......... आपका मन / शरीर

मैंने इन छह लँग्वेज पॅटर्नस् की मदद से उदाहरण लिखा है । इस प्रकार से लगभग एक सौ चौदह हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् हैं, जिससे हम बातों बातों में हिप्नोसिस का इस्तेमाल कर सकते हैं और हमारा मॅसेज पूरी ताकद से दूसरों के सामने रख सकते हैं । अब थोड़ा सोचिए, इस प्रकार अगर आपने एक सौ चौदह हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् अंग्रेजी में सिख लिए और अगर रोजमर्रा की जिंदगी में आप हिंदी इस्तेमाल कर रहे हो, तो यकिन मानिए आप कभी भी ये हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे । जिस क्षण आप ये हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् आपकी रोजमर्रा की भाषा में सिख लेते हो तो अंग्रेजी में इनको इस्तेमाल करना आसान हो जाता है । इसीलिए इन हिप्नोटिक लँग्वेज पॅटर्नस् को हमें रोजमर्रा की भाषा में सीखना होगा, तभी हम उन्हें इस्तेमाल कर सकेंगे ।

इसीलिए एन.एल.पी. सीखे, तो हिंदी में । और दूसरे कई महत्वपूर्ण कारण है, जिससे आपको एन.एल.पी. हिंदी में सीखना होगा, उनके बारे में अगले ब्लॉग में बात करेंगे । तब तक के लिए ......

‘एन्जॉय यूवर लाईफ अॅन्ड लिव्ह विथ पॅशन !’

- संदिप शिरसाट

(लेखक इंडियन बोर्ड ऑफ़ हिप्नोसिस अॅन्ड न्यूरो लिंगविस्टिक प्रोग्रॅमिंग के संस्थापक अध्यक्ष तथा एन.एल.पी. मास्टर ट्रेनर है ।)

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Sandip Shirsat NLP Blogger
संदिप शिरसाट

लेखक इंडियन बोर्ड ऑफ़ हिप्नोसिस अॅन्ड न्यूरो लिंगविस्टिक प्रोग्रामिंग के संस्थापक अध्यक्ष तथा एन एल पी मास्टर ट्रेनर है ।

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